
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई है। लेख में दावा किया गया है कि लगातार जनदबाव और विरोध प्रदर्शनों ने सरकार की रणनीति, मोदी की छवि और विपक्ष की राजनीति पर असर डाला।
25 जुलाई की दोपहर 2 बजे के बाद धर्मेंद्र प्रधान 'पूर्व शिक्षा मंत्री' बन गए। माना जा रहा है कि यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सहमति से लिया गया। इस घटनाक्रम ने यह संकेत दिया कि लगातार बन रहे जनमत, सार्वजनिक दबाव और लंबे विरोध प्रदर्शनों के आगे सबसे शक्तिशाली नेता भी आखिरकार झुक सकते हैं।
कई हफ्तों तक आक्रामक रुख अपनाने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री मोदी को एहसास हुआ कि उनकी टकराव वाली रणनीति न केवल असरदार नहीं रही, बल्कि संभवतः उल्टा नुकसान पहुंचा रही थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी सार्वजनिक छवि और 'ब्रांड मोदी' को बड़ा झटका लग रहा था और उनकी लोकप्रियता लगातार प्रभावित हो रही थी।
प्रधानमंत्री ने मानी हार?
प्रधानमंत्री के रूप में अपने 12 वर्षों के कार्यकाल में नरेंद्र मोदी बहुत कम मौकों पर जनता के दबाव और आंदोलनों के सामने झुके हैं। लेकिन उन सभी मौकों पर उन्होंने फैसला अपने समय और अपनी शर्तों पर लिया था।इसके उलट इस बार 15 से 30 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं के एक बड़े आंदोलन ने न केवल प्रधानमंत्री पर लगातार दबाव बनाए रखा, बल्कि उनके व्यक्तित्व और राजनीतिक छवि को भी खुली चुनौती दी।
हालांकि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद यह संकट पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। यह जरूर है कि दिल्ली के जंतर-मंतर और देश के करीब 100 शहरों में प्रदर्शन कर रहे हजारों लोग अब अपने घर लौटेंगे, लेकिन वे अपने साथ जीत का आत्मविश्वास और नई राजनीतिक ऊर्जा लेकर लौट रहे हैं।
अब प्रधानमंत्री मोदी को भविष्य में अपने विरोधियों से निपटते समय अपनी स्वाभाविक आक्रामकता और व्यंग्यपूर्ण शैली पर पहले से अधिक नियंत्रण रखना पड़ सकता है।अब तक उनकी राजनीति की सबसे बड़ी ताकत यह रही थी कि वह खुद को ऐसे मजबूत नेता के रूप में पेश करते थे जो किसी भी सार्वजनिक दबाव से अप्रभावित रहता है। आम धारणा यही थी कि यदि उन पर दबाव बनाया जाए, तो उनकी पहली प्रतिक्रिया संवाद नहीं बल्कि चुप्पी होती है।उन्हें अब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता अभिजीत दीपके के उस बयान को भी ध्यान में रखना होगा, जिसमें उन्होंने कहा था— "यह सिर्फ पहला विकेट है। हम यहां नहीं रुकेंगे। यह तो केवल शुरुआत है।"
मजबूत नेता की छवि को झटका
इस दौर में मिली यह राजनीतिक हार केवल एक घटना तक सीमित नहीं रहेगी। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की घोषणा के तुरंत बाद यह स्पष्ट होने लगा कि भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हुआ है।प्रधान का इस्तीफा आगे चलकर एक ऐसी मिसाल बन सकता है, जो यह बताएगा कि यदि जनता का दबाव लगातार बना रहे और आंदोलन अहिंसक हो, तो प्रधानमंत्री जैसा शक्तिशाली नेता भी पीछे हटने के लिए मजबूर हो सकता है।
जब से नरेंद्र मोदी ने खुद को एक "मजबूत नेता" (Strongman) के रूप में स्थापित किया, उनकी राजनीति का बड़ा आधार यही रहा कि वे सार्वजनिक दबाव से अप्रभावित दिखाई दें। यह आम धारणा बन गई थी कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान वह प्रदर्शनकारियों से संवाद करने के बजाय अपने समर्थकों के बीच "56 इंच के सीने वाले नेता" की छवि को और मजबूत करने की कोशिश करते हैं, जिनका फैसला अंतिम माना जाता है।लेकिन जिस सोशल मीडिया रणनीति को कभी मोदी सरकार की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था, उसी सोशल मीडिया पर अब उन्हें लगातार आलोचना, व्यंग्य और विरोध का सामना करना पड़ा।
20 जुलाई को जब दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस के गोले छोड़े गए और पुलिस कार्रवाई तेज हुई, तब ऐसा लगा कि सरकार किसी भी कीमत पर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार नहीं करना चाहती, ताकि प्रधानमंत्री मोदी की छवि पर आंच न आए।
क्या CJP अब आंदोलन को आगे बढ़ाएगी?
मोदी सरकार द्वारा आखिरकार CJP की प्रमुख मांग—धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे—को स्वीकार कर लेने से इस संगठन को राजनीतिक वैधता भी मिली है।सरकार के इस फैसले के बाद CJP को अब बड़े मुद्दों पर संघर्ष करने का आत्मविश्वास मिल सकता है। संगठन भविष्य में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई व्यापक सवाल उठा सकता है।
इन मुद्दों में वर्ष 2014 के बाद शिक्षा बजट में कटौती, विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों पर बढ़ता संस्थागत नियंत्रण, कुलपतियों और निदेशकों की नियुक्तियों को लेकर उठे सवाल, तथा पाठ्यक्रम में वैचारिक बदलाव जैसे विषय शामिल हो सकते हैं।अब प्रधानमंत्री मोदी के सामने केवल प्रदर्शनकारियों से किए गए वादे पूरे करने की चुनौती नहीं है, बल्कि उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आंदोलन दोबारा न भड़के।इसके साथ ही उन्हें विरोध प्रदर्शन से निकले आत्मविश्वास, व्यंग्य और राजनीतिक चुनौती का भी सामना करना होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या CJP और विपक्षी दल इस जीत से उत्साहित होकर मोदी सरकार की शिक्षा नीति से जुड़े अन्य फैसलों को भी नए सिरे से चुनौती देंगे।प्रधानमंत्री मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि एक दशक से अधिक समय बाद भारत में विरोध-प्रदर्शन की भाषा, संस्कृति और राजनीतिक ऊर्जा एक बार फिर लौटती दिखाई दे रही है।
'ब्रांड मोदी' को गहरा झटका
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा प्रधानमंत्री मोदी की वर्षों में तैयार हुई राजनीतिक छवि और व्यक्तित्व पर गंभीर असर डालता दिखाई दे रहा है।पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो और मीम्स की बाढ़ आ गई, जिनमें प्रधानमंत्री मोदी का पहले की तुलना में कहीं अधिक खुलकर मजाक उड़ाया गया। कुछ समय पहले तक ऐसी स्थिति की कल्पना करना भी मुश्किल माना जाता था।
अब प्रधानमंत्री मोदी के सामने दोहरी चुनौती है—एक ओर उन्हें प्रदर्शनकारियों से किए गए वादे पूरे करने होंगे, वहीं दूसरी ओर उन्हें विरोध की इस नई राजनीतिक ऊर्जा का भी सामना करना होगा। उधर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों का आत्मविश्वास भी बढ़ा हुआ दिखाई दे रहा है। CJP के नेताओं और समर्थकों की भविष्य की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी आने वाले चुनावों और देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
आगे की राह कितनी कठिन?
समय के साथ राजनीतिक स्थिति सामान्य हो सकती है और संसद का कामकाज फिर अपनी रफ्तार पकड़ सकता है। लेकिन उसके बाद यह सवाल उठना तय है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी फिर से परिसीमन (Delimitation), महिला आरक्षण और लोकसभा व विधानसभाओं के विस्तार से जुड़े तीन महत्वपूर्ण विधेयकों पर संसद का समर्थन हासिल करने की कोशिश करेंगे।
चूंकि प्रधानमंत्री मोदी को अब तक अपने राजनीतिक जीवन में शायद ही कभी इस तरह की सार्वजनिक राजनीतिक असहजता का सामना करना पड़ा हो, इसलिए आगे बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या वे पहले की तरह अपनी राजनीतिक पकड़ और आक्रामकता दोबारा स्थापित कर पाते हैं।
हालांकि उनके कार्यकाल का शेष समय पहले जितना सहज नहीं रहने वाला। आने वाले महीनों में भारतीय राजनीति पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी, टकरावपूर्ण और चुनौतीपूर्ण दिखाई दे सकती है।
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