T K Arun

चुनाव परिणाम 2026 : भाजपा की जीत के बजाय, विपक्ष की कमज़ोरी ही मुख्य संदेश है


चुनाव परिणाम 2026 : भाजपा की जीत के बजाय, विपक्ष की कमज़ोरी ही मुख्य संदेश है
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कुछ लोगों का दावा है कि वर्तमान राज्य विधानसभा चुनाव के नतीजे मोदी और शाह ब्रांड की राजनीति की एक बड़ी जीत हैं। लेकिन यहाँ एक बुनियादी सवाल उठता है कि क्या यह वास्तव में हिंदुत्व की कोई लहर है? अगर हम राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो विधानसभा चुनाव परिणामों से भारतीय जनता पार्टी निश्चित रूप से लाभ में रही है। भाजपा ने पहली बार पश्चिम बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्य में अपनी सत्ता स्थापित की है और साथ ही असम और पुडुचेरी में अपनी सरकार बरकरार रखने में सफल रही है।


वहीं दूसरी ओर, राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष स्पष्ट रूप से घाटे में नजर आ रहा है। भले ही केरल में कांग्रेस को जीत मिली हो, लेकिन उसने तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्य खो दिए हैं। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि इंडिया गठबंधन पूरी तरह बिखर चुका है। यदि कांग्रेस तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए फिल्म स्टार विजय की पार्टी टीवीके के साथ हाथ मिला लेती है, तो यह गठबंधन पूरी तरह से ध्वस्त माना जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा समर्थकों का मानना है कि यह मोदी-शाह ब्रांड की राजनीति की ही विजय है, लेकिन क्या वास्तव में धरातल पर सच्चाई यही है?

सत्ता विरोधी लहर और चुनावी आंकड़ों का खेल

तमिलनाडु और केरल के चुनावी नतीजों को देखें तो वहां तीव्र सत्ता विरोधी लहर पूरी तरह दिखाई दे रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि तमिलनाडु के निवर्तमान मुख्यमंत्री एमके स्टालिन अपनी खुद की विधानसभा सीट तक हार गए हैं। ऐसी स्थिति में जनता के पास अपने गुस्से को प्रकट करने के लिए भाजपा और उसके सहयोगियों को एक माध्यम के रूप में चुनने का अवसर था। लेकिन दोनों ही राज्यों में जहाँ भी भाजपा के अलावा कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध था, लोगों ने मोदी और शाह की पार्टी के बजाय उस विकल्प को चुना।

यह इस बात का सबूत है कि यहाँ कोई आधुनिक युग का अश्वमेध यज्ञ काम नहीं कर रहा है, जिसमें भाजपा का कोई अजेय घोड़ा नए क्षेत्रों को जीतने के लिए निकल पड़ा हो और वहां के शासकों के पास केवल दो ही विकल्प हों या तो वे अधीनता स्वीकार करें या फिर युद्ध करें। हकीकत इससे कहीं अधिक जटिल है। पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों में इस बात की भी चर्चा है कि वहां मतदाता सूची में किए गए अधूरे और संभवतः पक्षपाती संशोधनों ने कितनी भूमिका निभाई। हालांकि इस बारे में कोई भी दावे के साथ कुछ नहीं कह सकता, लेकिन असम में भाजपा नेतृत्व द्वारा चलाए गए खुले सांप्रदायिक अभियान पर बहुत कम संदेह है। सवाल यह है कि क्या मोदी और शाह असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की इस आक्रामक राजनीति को अपनी चाणक्य रणनीति के रूप में पेश करना चाहते हैं?

ममता बनर्जी का शासन और भाजपा का उदय

ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल पर लगातार 15 वर्षों तक शासन किया, लेकिन अन्य गरीब राज्यों की तुलना में बंगाल के लोगों के जीवन स्तर में कोई विशेष सुधार देखने को नहीं मिला। उनकी राजनीति का मुख्य केंद्र कम्युनिस्टों और कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं और उनके समर्थन आधार को अपनी ओर खींचना रहा। उन्होंने इन पारंपरिक दलों को बंगाल की राजनीति में हाशिए पर धकेल दिया, जिससे भाजपा को वहां मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरने के लिए खाली जगह मिल गई।

तृणमूल कांग्रेस की राजनीति एक और क्षेत्र में माहिर रही और वह था धार्मिक अल्पसंख्यकों को संरक्षण देना। उन्होंने बाहरी लोगों यानी भाजपा के खिलाफ बंगाली पहचान की रक्षा करने का भावनात्मक कार्ड खेला। हालांकि आम बंगालियों के लिए यह स्वीकार करना कठिन है कि उनकी पहचान को भाजपा से कोई खतरा है। तुष्टिकरण की इस राजनीति ने जहाँ एक तरफ अल्पसंख्यकों को एकजुट किया, वहीं दूसरी तरफ इसने बहुसंख्यकों के बीच एक जवाबी ध्रुवीकरण भी पैदा कर दिया, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिला।

विपक्ष के लिए बड़े सबक और भविष्य की राह

केरल में कांग्रेस की जीत ने फिलहाल मुस्लिमों और ईसाइयों के कांग्रेस के साथ गठबंधन को टूटने से बचा लिया है। यह न केवल राज्य के लिए बल्कि पूरे भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के लिए अच्छा संकेत है। यदि मुस्लिमों को यह महसूस होता कि कांग्रेस के साथ उनका गठबंधन उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी नहीं दिला पा रहा है, तो इससे इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग जैसी पार्टियां कमजोर हो जातीं। केरल में यह लीग एक समुदाय आधारित पार्टी है जो सांप्रदायिक राजनीति से बचती है क्योंकि वह शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता साझा करने में विश्वास रखती है। यदि ऐसी ताकतें कमजोर होती हैं, तो कट्टरपंथी विचारधाराएं उस जगह को भरने की कोशिश कर सकती हैं, जो देश के लिए खतरनाक होगा।

क्या इसका मतलब यह है कि केरल में वामपंथ अब खत्म हो गया है? इसका जवाब है बिल्कुल नहीं। केरल में वामपंथ ने हमेशा एक लोकतंत्रीकरण की शक्ति के रूप में काम किया है। राज्य की अन्य पार्टियां भी खुद को वामपंथ के उसी लोकतांत्रिक ढांचे में ढालने की कोशिश करती हैं। वामपंथ की भावना आज भी वहां जीवित है और वह भविष्य में कांग्रेस सरकार की विफलताओं का लाभ उठाने के लिए तैयार रहेगी। राष्ट्रीय विपक्ष के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि उसे केवल भाजपा की कमियों का फायदा उठाने के बजाय विकास और लोकतंत्रीकरण पर केंद्रित एक सकारात्मक विजन जनता के सामने रखना होगा।

एक ठोस विकल्प की तलाश

वर्तमान में कांग्रेस के पास राष्ट्रीय स्तर पर वापसी का कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है। पार्टी का नेतृत्व एक ऐसे वंशज के हाथ में है जो अपनी बार-बार की विफलताओं के लिए कोई जवाबदेही स्वीकार नहीं करता। वहीं वामपंथियों के पास भी खुद को पुनर्जीवित करने का एक अवसर है, बशर्ते वे पुरानी और अप्रासंगिक हो चुकी विचारधाराओं के बजाय आधुनिक लोकतंत्र और भागीदारी वाले विकास पर ध्यान दें।

इन चुनाव परिणामों का असली संदेश यह है कि जनता ने भ्रष्टाचार और वंशवाद को नकार दिया है। उन्हें भाजपा की ध्रुवीकरण वाली राजनीति के मुकाबले एक स्वस्थ और मजबूत विकल्प चाहिए। यह हिंदुत्व की कोई अजेय लहर नहीं है, बल्कि एक बेहतर विकल्प की तलाश में जनता द्वारा दिया गया जनादेश है।

(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)


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