Subir Bhaumik

सामरिक परियोजना या बड़ा जोखिम? ग्रेट निकोबार पर बहस तेज


सामरिक परियोजना या बड़ा जोखिम? ग्रेट निकोबार पर बहस तेज
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ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट को लेकर वैज्ञानिकों ने भूकंप, सुनामी, जंगल कटाई और पर्यावरणीय नुकसान का खतरा जताया है।

भारत सरकार के महत्वाकांक्षी ग्रेट निकोबार द्वीप (Great Nicobar Island) मेगा प्रोजेक्ट को लेकर वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने गंभीर चिंताएं जताई हैं। उनका कहना है कि यह इलाका दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में आता है, जहां बड़े भूकंप, समुद्री तूफान और सुनामी का लगातार खतरा बना रहता है। ऐसे में अरबों डॉलर का यह निवेश भारी जोखिम से भरा हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस परियोजना से बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई होगी, जिसमें संवेदनशील गैलेथिया नेशनल पार्क (Galathea National Park) भी शामिल है। इससे क्षेत्र की जैव विविधता और यहां रहने वाले आदिवासी समुदायों पर गंभीर असर पड़ सकता है।

166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैलेगा प्रोजेक्ट

करीब एक लाख करोड़ रुपये (10 अरब डॉलर) की लागत वाले इस प्रोजेक्ट के तहत द्वीप के लगभग 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का विकास किया जाएगा। इसमें अकेले 130.75 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र का डायवर्जन प्रस्तावित है।सरकारी आंकड़ों के अनुसार, परियोजना शुरू करने के लिए चरणबद्ध तरीके से लगभग 18.65 लाख पेड़ों में से 7.11 लाख पेड़ काटे जाएंगे।

मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर की योजना

इस परियोजना के तहत एक गहरे समुद्री बंदरगाह (Deep-Draft Port) का निर्माण किया जाएगा, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सामरिक ताकत बढ़ाने की उम्मीद है। इस बंदरगाह को अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (ICTP) के रूप में विकसित किया जाएगा, ताकि भारत की लॉजिस्टिक निर्भरता सिंगापुर और कोलंबो जैसे बंदरगाहों पर कम हो सके।इसके अलावा यहां एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, पावर प्लांट और 160 वर्ग किलोमीटर का टाउनशिप भी विकसित किया जाएगा।

हालांकि कुछ रणनीतिक विशेषज्ञ इसे भारत के लिए डूब न सकने वाला प्राकृतिक एयरक्राफ्ट कैरियर बता रहे हैं, वहीं कई पूर्व नौसेना और खुफिया अधिकारियों ने इस पर सवाल उठाए हैं।

सामरिक परियोजना या व्यावसायिक विस्तार?

आलोचकों का कहना है कि इतनी बड़ी व्यावसायिक और पर्यटन परियोजना के साथ नौसैनिक अड्डा और समुद्री निगरानी केंद्र स्थापित करना सुरक्षा की दृष्टि से जोखिम भरा हो सकता है। भू-राजनीतिक विश्लेषक Sushant Singh ने हाल ही में लिखा कि सरकार इस परियोजना को राष्ट्रीय सुरक्षा और समुद्री प्रतिस्पर्धा की भाषा में पेश कर रही है, जबकि वास्तव में इसमें बंदरगाह, एयरपोर्ट, टाउनशिप और ऊर्जा ढांचे के जरिए बड़े व्यावसायिक अवसर छिपे हुए हैं।उनका कहना है कि भारत में कई मेगा प्रोजेक्ट्स को सामरिक बताकर आलोचना और जांच से बचाने की कोशिश की जाती है।

सबसे बड़ा खतरा: भूकंप और सुनामी

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस परियोजना को लेकर सबसे बड़ी चिंता इसका भूगर्भीय जोखिम है। ग्रेट निकोबार उस इलाके के बेहद करीब स्थित है, जहां 2004 में इंडोनेशिया के बांदा आचे क्षेत्र में 9.2 तीव्रता का विनाशकारी भूकंप आया था। इस भूकंप ने इतिहास की सबसे भीषण सुनामी में से एक को जन्म दिया था।

यह वही क्षेत्र है जहां भारतीय टेक्टोनिक प्लेट दक्षिण-पूर्व एशिया के नीचे खिसकती है। 2004 के भूकंप के दौरान समुद्र के भीतर भारी भू-स्खलन हुआ था, जिससे विशाल सुनामी उत्पन्न हुई।ग्रेट निकोबार उस आपदा के केंद्र के काफी करीब था और वहां जमीन अचानक 3 से 4 मीटर तक धंस गई थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह इलाका आज भी लगातार सूक्ष्म भूकंपों और भूगर्भीय हलचलों से प्रभावित रहता है।

वैज्ञानिकों ने जताई बड़ी आशंका

भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि जहां सिंगापुर और हांगकांग जैसे बंदरगाह स्थिर भूगर्भीय क्षेत्रों में स्थित हैं, वहीं ग्रेट निकोबार लगातार धीरे-धीरे ऊपर उठने और अचानक धंसने वाली भूगर्भीय प्रक्रिया से गुजरता है। वैज्ञानिक सी पी राजेंद्रन (CP Rajendran) ने चेतावनी दी कि ऐसे अस्थिर क्षेत्र में विशाल और स्थायी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना प्लेट टेक्टोनिक्स को मात देने की इंजीनियरिंग की भ्रमपूर्ण कोशिश जैसा है। उन्होंने GPS और ज्वार मापने वाले आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि इलाके में लगातार टेक्टोनिक दबाव बनता रहता है, जो किसी बड़े भूकंप के दौरान अचानक भारी धंसाव में बदल सकता है।

हालांकि केंद्र सरकार का दावा है कि परियोजना को मंजूरी देने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव और भूमि की क्षमता का विस्तृत अध्ययन किया गया है, लेकिन कई वैज्ञानिकों का मानना है कि भूगर्भीय जोखिमों का पर्याप्त आकलन नहीं किया गया।

ऊर्जा सुरक्षा की उम्मीद भी जुड़ी

ग्रेट निकोबार परियोजना के पीछे एक बड़ा कारण अंडमान-निकोबार क्षेत्र में हाइड्रोकार्बन यानी तेल और गैस की संभावनाएं भी मानी जा रही हैं।हालांकि अभी यहां बड़े स्तर पर व्यावसायिक उत्पादन शुरू नहीं हुआ है, लेकिन खोजी अभियानों में प्राकृतिक गैस के महत्वपूर्ण भंडार मिलने के संकेत मिले हैं। विजयपुरम-2 जैसे कुओं में प्राकृतिक गैस की मौजूदगी की पुष्टि हो चुकी है।

भारत के हाइड्रोकार्बन रिसोर्स असेसमेंट स्टडी के अनुसार, अंडमान बेसिन में करीब 371 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट (MMTOE) संसाधन मौजूद हो सकते हैं।लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इन संसाधनों के दोहन की लागत बहुत अधिक होगी और भूगर्भीय जोखिम इस दिशा में भी बड़ी चुनौती बन सकते हैं।

(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)

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