Parul Chandra

नेपाल में बदले सत्ता समीकरण, भारत के सामने नई कूटनीतिक चुनौती


नेपाल में बदले सत्ता समीकरण, भारत के सामने नई कूटनीतिक चुनौती
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नेपाल की बालेन शाह सरकार के राष्ट्रवादी रुख और सीमा विवादों ने भारत-नेपाल संबंधों को नई कूटनीतिक चुनौती के दौर में पहुंचा दिया है।

नेपाल की नई सरकार के साथ संबंधों को लेकर भारत एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती का सामना कर रहा है। सत्ता में आने के महज दो महीने के भीतर ही बलेंद्र ‘बालेन’ शाह के नेतृत्व वाली सरकार ने नई दिल्ली को खुश होने का कोई खास मौका नहीं दिया है। इसके उलट, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) की सरकार के तहत द्विपक्षीय संबंधों की भविष्य की दिशा को लेकर भारत की चिंताएं और बढ़ गई हैं। मार्च में भारी बहुमत से सत्ता में आई इस पार्टी के साथ पारंपरिक और पुराने ढर्रे की कूटनीति असरदार साबित नहीं हो रही है, इसलिए नई दिल्ली अब अपनी कूटनीतिक रणनीति को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश कर रही है।

नई नेतृत्व व्यवस्था से जुड़ाव बढ़ाने के प्रयास में भारत कथित तौर पर RSP अध्यक्ष रवि लामिछाने को 1 जून से शुरू होने वाली यात्रा पर आमंत्रित करने जा रहा है। हालांकि, अगर भारत वास्तव में इस रिश्ते को महत्व देना चाहता है, तो उसे उच्च-स्तरीय राजनीतिक पहल करनी होगी, जैसे विदेश मंत्री एस. जयशंकर का काठमांडू दौरा।

सिंहदरबार में बैठी नई सरकार के भारत की मांगों के आगे आसानी से झुकने की संभावना नहीं है, क्योंकि उसके कंधों पर नेपाल की जेन-ज़ी पीढ़ी की उम्मीदें और आकांक्षाएं टिकी हैं। इसी युवा वर्ग ने पिछले वर्ष ओली सरकार को सत्ता से बाहर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

रणनीतिक जरूरतें और प्रतिद्वंद्विता

नेपाल को अपने रणनीतिक दायरे में बनाए रखना भारत की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है, क्योंकि दोनों देशों के बीच लंबी और खुली सीमा है। दूसरी ओर, नेपाल में चीन की बढ़ती पैठ भारत की सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा रही है। इसके साथ ही, हिमालयी राष्ट्र में अमेरिका और चीन के बीच चल रहे ‘ग्रेट गेम’ पर भी नई दिल्ली को नजर रखनी पड़ रही है, जबकि वह स्वयं अपने रणनीतिक प्रभाव को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है।

नेपाल में लंबे समय तक मजबूत प्रभाव बनाए रखने वाला भारत अब धीरे-धीरे अपने प्रभाव में कमी देख रहा है, जबकि उसकी ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति की काफी चर्चा होती रही है। अब तक बलेंद्र शाह — जो पहले रैपर थे और बाद में राजनीतिज्ञ बने, तथा काठमांडू के मेयर रहने के बाद 35 वर्ष की आयु में नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने — ने भारत के करीबी संबंधों के प्रयासों को खास महत्व नहीं दिया है।

भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री इस महीने की शुरुआत में काठमांडू जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से शाह को भारत आने का निमंत्रण देने वाले थे, लेकिन उन्हें मुलाकात का समय नहीं मिला। परिणामस्वरूप यह यात्रा, जिसकी औपचारिक घोषणा भी नहीं हुई थी, रद्द कर दी गई।

नई दिल्ली को ठंडा रवैया

नेपाल के प्रधानमंत्री ने काठमांडू स्थित भारतीय राजदूत से अलग से मुलाकात करने से भी परहेज किया है, जबकि नई सरकार बनने पर भारत को यह परंपरागत शिष्टाचार हमेशा मिलता रहा है। इसके बजाय शाह ने विदेशी राजनयिकों से सामूहिक रूप से मुलाकात की, जो इस बात का संकेत है कि अब नेपाल में भारत को पहले जैसा विशेष महत्व नहीं दिया जा रहा।

हालांकि शाह का यह फैसला उनकी उस नीति के अनुरूप है जिसमें वे निचले स्तर के राजनयिक अधिकारियों या नेताओं से अलग से मुलाकात नहीं करते, लेकिन फिर भी यह भारत के लिए एक कूटनीतिक झटका माना गया।

दिलचस्प बात यह भी है कि अप्रैल में काठमांडू आए दो अमेरिकी राजनयिकों से भी शाह ने मुलाकात नहीं की। इनमें सर्जियो गोर भी शामिल थे, जो भारत और नेपाल में अमेरिकी राजदूत होने के साथ-साथ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दक्षिण और मध्य एशिया के विशेष दूत भी हैं।

इसके अलावा शाह ने यह घोषणा भी कर दी कि वे अपने कार्यकाल के पहले वर्ष में कोई विदेशी यात्रा नहीं करेंगे। इससे भारत की यह उम्मीद भी टूट गई कि वह शाह की पहली विदेश यात्रा की मेजबानी करेगा। परंपरागत रूप से नेपाल के प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद सबसे पहले भारत आते रहे हैं, हालांकि 2008 में कम्युनिस्ट नेता पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने इस परंपरा को तोड़ते हुए पहले चीन का दौरा किया था।

भारत की कूटनीति की परीक्षा

रवि लामिछाने की मेजबानी करके भारत उम्मीद कर रहा है कि वह नई सरकार के साथ मजबूत संबंध बना सकेगा और अपने रणनीतिक हितों की रक्षा कर पाएगा। यह जुड़ाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि RSP के नेतृत्व वाली सरकार संसद में लगभग दो-तिहाई बहुमत रखती है और उससे पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा करने की उम्मीद की जा रही है। यह स्थिति 1990 के दशक के मध्य से नेपाल में लगातार बनी अस्थिर गठबंधन सरकारों से बिल्कुल अलग है।

भारत के लिए यह स्थिति नई और चुनौतीपूर्ण है। RSP मात्र चार साल पुरानी पार्टी है, पहली बार सत्ता में आई है और उसमें मजबूत राष्ट्रवादी भावना दिखाई देती है। हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने भी भारत विरोधी राष्ट्रवाद का इस्तेमाल किया था, लेकिन अंततः वे अपनी आंतरिक राजनीतिक चालों और सत्ता में बने रहने की लालसा के कारण कमजोर पड़ गए।

बालेन सरकार के साथ भारत के लिए रास्ता आसान नहीं होगा। लंबे समय से चला आ रहा लिपुलेख दर्रे का सीमा विवाद फिर से सामने आ चुका है। भारत और चीन द्वारा लिपुलेख मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा दोबारा शुरू करने की घोषणा के बाद नेपाल ने दोनों देशों को कूटनीतिक नोट भेजकर विरोध दर्ज कराया, क्योंकि नेपाल इस क्षेत्र को अपना हिस्सा मानता है।

सीमा विवाद का मुद्दा

भारत और नेपाल के बीच कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्रों को लेकर विवाद है। लगभग 335 वर्ग किलोमीटर का यह इलाका भारत, नेपाल और तिब्बत के त्रि-जंक्शन पर स्थित है और दोनों देश इस पर दावा करते हैं। यह विवाद दोनों देशों के संबंधों में लंबे समय से तनाव का कारण रहा है। ओली के प्रधानमंत्रित्व काल में नेपाल ने अपना आधिकारिक नक्शा भी बदल दिया था, जिसमें इन विवादित क्षेत्रों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया।

RSP की राष्ट्रवादी नीति के साथ यह सीमा विवाद भारत की कूटनीतिक कोशिशों को और कठिन बना सकता है तथा दोनों देशों के रिश्तों में लगातार तनाव बनाए रख सकता है।

इस तनाव को कम करने के लिए भारत को कम-से-कम इस मुद्दे पर विदेश सचिव स्तर की बातचीत के लिए सहमत होना चाहिए, जिसकी मांग नेपाल लंबे समय से करता आ रहा है।

नई सरकार भारत के दबाव में आसानी से आने वाली नहीं है, क्योंकि उसके पीछे नेपाल की नई युवा पीढ़ी का मजबूत समर्थन है, जिसने ओली सरकार को हटाने में अहम भूमिका निभाई थी।

आगे की राह

शाह की भारत से दूरी बनाए रखने की नीति उनकी सरकार की घोषित “गुटनिरपेक्ष” विदेश नीति से प्रेरित है। उनकी सरकार चाहती है कि नेपाल भारत और चीन जैसे क्षेत्रीय शक्तियों के बीच एक “सक्रिय पुल” बने, न कि केवल एक भू-राजनीतिक “बफर ज़ोन”। साथ ही, वह “विकास कूटनीति” और संतुलित विदेश नीति पर जोर दे रही है।

आगे बढ़ते हुए भारत को नेपाल के प्रति अपने प्रयासों को और मजबूत करना होगा, लेकिन इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि वह नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता हुआ या उसकी संप्रभुता पर असर डालता हुआ न दिखाई दे।

नेपाल में जिन विकास परियोजनाओं का वादा भारत ने किया है, उन्हें समय पर पूरा करना बेहद जरूरी होगा। इससे न केवल नेपाल सरकार बल्कि वहां की जनता का भी विश्वास जीता जा सकेगा। नई सरकार दशकों की उपेक्षा के बाद नेपाल में विकास और आर्थिक प्रगति लाना चाहती है।

भारत को नेपाल में अधिक सक्रिय और भरोसेमंद साझेदार बनना होगा, ताकि वह चीन या अमेरिका को वहां अधिक जगह न दे। साथ ही, नई दिल्ली को यह भी स्पष्ट रूप से काठमांडू को बताना होगा कि भारत के रणनीतिक हितों से समझौता स्वीकार्य नहीं होगा।

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