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ट्रंप की बयानबाजी बनाम ईरान की सधी रणनीति, मिडिल ईस्ट में अब नए समीकरण


ट्रंप की बयानबाजी बनाम ईरान की सधी रणनीति, मिडिल ईस्ट में अब नए समीकरण
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उत्तरी तेहरान, ईरान के वनाक स्क्वायर में बिलबोर्ड पर एक ग्राफ़िक बना है जिसमें एक सैनिक का हाथ स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को अपनी मुट्ठी में थामे हुए दिखाया गया है, और उस पर फ़ारसी भाषा में ये संदेश लिखे हैं: "हमेशा के लिए ईरान के हाथों में," "ट्रंप कुछ भी नहीं कर पाए," और "स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ पर नियंत्रण हमेशा ईरान का ही रहेगा।" AP/PTI

ईरान के बयान ने होर्मुज़, अमेरिका और क्षेत्रीय राजनीति में नए संतुलन का संकेत दिया है। मध्य पूर्व संघर्ष में कूटनीति, दबाव और रणनीति सब कुछ साथ-साथ चल रहे हैं।

शुक्रवार (17 अप्रैल) को ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची द्वारा की गई एक संक्षिप्त और संयत घोषणा वैश्विक भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत दे सकती है। उन्होंने कहा, “लेबनान में युद्धविराम के अनुरूप, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन द्वारा पहले से घोषित समन्वित मार्ग के माध्यम से सभी वाणिज्यिक जहाजों के आवागमन की अनुमति दी जाती है।”

इस साधारण प्रतीत होने वाले वक्तव्य के पीछे एक गहरा बदलाव छिपा है। ग्लोबल साउथ के कई देशों के अनुसार, पिछले छह सप्ताहों में अमेरिका-इज़राइल धुरी द्वारा चलाए गए एक क्रूर, बिना उकसावे के और अवैध युद्ध के बाद, तेहरान का यह बयान किसी झुकाव की बजाय रणनीतिक धैर्य की घोषणा अधिक लगता है। बिना आत्मसमर्पण किए और अपनी गरिमा को बनाए रखते हुए, ईरान ने यह संकेत दिया है कि प्रभुत्ववादी दबाव का प्रतिरोध न केवल संभव है, बल्कि प्रभावी भी हो सकता है। यह केवल एक जलमार्ग का मुद्दा नहीं है, बल्कि शक्ति संतुलन के पुनर्संयोजन का संकेत है।

पाकिस्तान की भूमिका

यह घोषणा वाशिंगटन की कठोर नीति में कुछ महत्वपूर्ण, हालांकि अभी अस्पष्ट, बदलावों की ओर इशारा करती है—ऐसे बदलाव जो आने वाले दिनों में और स्पष्ट होंगे। उल्लेखनीय रूप से, तेहरान ने 52 किलोमीटर लंबे होर्मुज़ जलडमरूमध्य के प्रबंधन में अपनी भूमिका नहीं छोड़ी है, जिस पर उसकी ओमान के साथ साझा संप्रभुता है। नियंत्रण, चाहे सूक्ष्म रूप से ही क्यों न हो, अभी भी एक महत्वपूर्ण रणनीतिक दबाव का साधन बना हुआ है।

इस उच्च दांव वाले टकराव के बीच, पाकिस्तान एक अप्रत्याशित लेकिन महत्वपूर्ण कूटनीतिक भूमिका में उभरकर सामने आया है। पर्दे के पीछे शांतिपूर्वक कार्य करते हुए, उसने दोनों पक्षों को कठोर रुख से हटाकर एक नाजुक समझौते की ओर बढ़ाने में योगदान दिया है। अमेरिका की ओर से इस प्रयास की स्वीकृति नाटकीय अंदाज़ में आई, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, “पाकिस्तान और उसके महान प्रधानमंत्री तथा फील्ड मार्शल का धन्यवाद—दो शानदार लोग!!!”

ट्रंप की बयानबाज़ी

यदि अराघची का बयान संयमित था, तो ट्रंप की प्रतिक्रिया इसके बिल्कुल विपरीत थी। उन्होंने घोषणा की, “ईरान ने अभी घोषणा की है कि उसका जलडमरूमध्य पूरी तरह खुला है और पूर्ण आवागमन के लिए तैयार है,” और आगे कहा, “होर्मुज़ जलडमरूमध्य पूरी तरह खुला है और व्यापार के लिए तैयार है, लेकिन नौसैनिक नाकेबंदी ईरान के संदर्भ में तब तक जारी रहेगी जब तक हमारा समझौता पूरी तरह पूरा नहीं हो जाता।”

उनकी बयानबाज़ी यहीं नहीं रुकी। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने B-2 बमवर्षकों द्वारा उत्पन्न सभी “न्यूक्लियर डस्ट” प्राप्त करेगा और इस प्रक्रिया में कोई धन का लेन-देन नहीं होगा। साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि इज़राइल अब लेबनान पर बमबारी नहीं करेगा और ऐसा करने से उसे अमेरिका द्वारा रोका गया है।

अनसुलझे सवाल

ट्रंप के इन दावों पर संदेह स्वाभाविक है। उनकी आक्रामक भाषा कई महत्वपूर्ण सवालों को छिपा देती है। क्या अमेरिका ने वास्तव में लेबनान में इज़राइल की विनाशकारी बमबारी को रोकने पर सहमति जताई है, जिसमें कथित तौर पर 2,000 से अधिक नागरिक मारे गए? क्या तेहरान की लंबे समय से चली आ रही मांगपश्चिमी बैंकों में जमे अरबों डॉलर की वापसी—पर कोई प्रगति हुई है? क्या किसी प्रकार का मुआवजा भी चर्चा में है?

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से वैश्विक नौवहन को बाधित करने की अपनी क्षमता को सीमित करने पर सहमति दी है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर फिलहाल अस्पष्ट हैं। आने वाले दौर की वार्ताएं, जो संभवतः इस्लामाबाद में होंगी, इन पर कुछ स्पष्टता ला सकती हैं।

बदलता क्षेत्रीय परिदृश्य

इस बीच, इज़राइल की भूमिका अपेक्षाकृत हाशिये पर जाती हुई दिखाई दे रही है, जबकि ट्रंप के निर्देश उसके कार्यों को अप्रत्यक्ष रूप से सीमित करते हैं। तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन द्वारा इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को दिया गया उपनाम “गाज़ा का कसाई” इस बात को दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर इज़राइल की भूमिका कितनी विवादास्पद बन चुकी है।

जटिल वार्ताओं का भविष्य

ईरान का व्यापक वार्ताओं पर जोर है जिसमें उसका परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय तनाव शामिल हैं जो स्थिति को और जटिल बनाता है। यह स्पष्ट है कि इन मुद्दों का समाधान त्वरित या नाटकीय घोषणाओं के माध्यम से संभव नहीं है।अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों पर उसकी अस्पष्टता भी चिंता का विषय है। एक अध्ययन के अनुसार, इन प्रतिबंधों का वैश्विक स्तर पर करोड़ों लोगों की मृत्यु से संबंध बताया गया है। ऐसे में किसी भी स्थायी समझौते के लिए प्रतिबंधों में राहत के विश्वसनीय और लागू किए जा सकने वाले आश्वासन आवश्यक होंगे।

ट्रंप द्वारा कतर, यूएई और सऊदी अरब को सार्वजनिक धन्यवाद देना भी एक नई जटिलता पैदा करता है। तेहरान इसे इस रूप में देख सकता है कि ये देश अमेरिकी प्रयासों का समर्थन कर रहे थे, जिससे क्षेत्रीय अविश्वास और बढ़ सकता है।

ट्रंप की आक्रामक शैली अधिकतर घरेलू दर्शकों को प्रभावित करने के लिए प्रतीत होती है, जबकि कई अमेरिकी इस युद्ध को बेंजामिन नेतन्याहू का संघर्ष मानते हैं, जो अमेरिकी हितों की कीमत पर लड़ा जा रहा है।जहां अराघची ने केवल एक वाक्य दिया, वहीं उसके परिणामस्वरूप एक व्यापक परिवर्तन की संभावना उत्पन्न हो गई है। असली कहानी उस घोषणा में नहीं, बल्कि उन समझौतों में छिपी है जो अभी सामने आने बाकी हैं।

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