Subir Bhaumik

बांग्लादेश संकट और बंगाल चुनाव, जानें- कैसे बदली दोनों तरफ की राजनीति


बांग्लादेश संकट और बंगाल चुनाव, जानें- कैसे बदली दोनों तरफ की राजनीति
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बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरता बढ़ने और हसीना सरकार गिरने का असर बंगाल चुनावों पर दिखा, जहां भाजपा ने हिंदू ध्रुवीकरण से बड़ी जीत दर्ज की।

दिवंगत ज्योति बसु यह बात किसी और से बेहतर समझते थे। हालांकि उनकी पार्टी CPI(M) ने 1996 में उन्हें प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया था, जब गैर-कांग्रेस और गैर-भाजपा दलों के गठबंधन ने उन्हें यह पद देने की पेशकश की थी, फिर भी भारत-बांग्लादेश संबंधों के मुद्दों में उनकी गहरी रुचि बनी रही। गंगा जल बंटवारा संधि और बांग्लादेश के अशांत चिटगांव हिल ट्रैक्ट्स में शांति समझौते को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका उन लोगों को भलीभांति ज्ञात है जो भारत और उसके पूर्वी पड़ोसी के संबंधों पर नजर रखते हैं।

एक BBC इंटरव्यू के दौरान जब मैंने उनसे बांग्लादेश के प्रति उनकी असाधारण दिलचस्पी का कारण पूछा, तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के अपने खास अंदाज में जवाब दिया: “अगर वहां हसीना इस्लामी कट्टरपंथियों से हार गईं, तो क्या आपको लगता है कि यहां हम हिंदुत्व ब्रिगेड को रोक पाएंगे?” इस एक वाक्य से बसु ने साफ कर दिया था कि उनके फैसलों के पीछे केवल ढाका के पास स्थित अपने पैतृक घर की यादें या शेख हसीना के साथ व्यक्तिगत संबंध नहीं थे, बल्कि कठोर राजनीतिक वास्तविकताएं थीं।

यह उस दौर की बात है जब भाजपा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में अपना खाता भी नहीं खोला था और न ही राज्य से कोई लोकसभा सीट जीती थी। इसके बावजूद बसु आत्मसंतुष्ट नहीं थे, क्योंकि उन्हें डर था कि बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल की राजनीतिक घटनाएं एक-दूसरे को गहराई से प्रभावित कर सकती हैं।जब उनसे उस समय ममता बनर्जी द्वारा कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाने के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा “यह उनका मामला है, लेकिन वह उन्हें (भाजपा को) यहां क्यों ला रही हैं?”

ममता बनर्जी के भाजपा के साथ गठबंधन करने और वाजपेयी सरकार में मंत्री बनने से बसु बेहद नाराज थे। उन्हें आशंका थी कि भगवा राजनीति तृणमूल कांग्रेस के सहारे पश्चिम बंगाल में अपना आधार मजबूत कर लेगी।

बसु की आशंकाएं सच साबित हुईं

आज ज्योति बसु इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन पिछले दो वर्षों में उनकी सबसे बड़ी आशंकाएं लगभग भविष्यवाणी की तरह सच साबित होती दिखाई दी हैं।अगस्त 2024 में बड़े जनआंदोलन के बाद शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ में तेज उछाल आया है। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के समर्थन से पाकिस्तान समर्थक जमात-ए-इस्लामी ने अपना प्रभाव तेजी से बढ़ाया।

हिंदू और बौद्ध अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ गए। दर्जनों सूफी मजारों को ध्वस्त कर दिया गया, जबकि सेना और पुलिस मूकदर्शक बनी रही। 1971 के मुक्ति संग्राम से जुड़ी विरासतों को भी नहीं छोड़ा गया। बांग्लादेश के संस्थापक माने जाने वाले शेख मुजीबुर रहमान के घर सहित कई ऐतिहासिक स्थलों और मुक्ति युद्ध संग्रहालयों को बुलडोजर से मिटा दिया गया।

शेख हसीना की अवामी लीग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिए जाने के बाद फरवरी में हुए संसदीय चुनाव BNP और जमात-ए-इस्लामी के बीच सीधा मुकाबला बन गए। अवामी लीग समर्थकों ने जमात को सत्ता से दूर रखने के लिए रणनीतिक रूप से BNP को वोट दिया, जिससे BNP को दो-तिहाई बहुमत मिला।

फिर भी, 1971 में पाकिस्तान सेना का समर्थन करने वाली और बांग्लादेश की स्वतंत्रता का विरोध करने वाली जमात-ए-इस्लामी ने रिकॉर्ड 68 सीटें जीत लीं, जबकि उसका पिछला सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन केवल 18 सीटों का था। ढाका विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनावों सहित कई प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में भी जमात समर्थित उम्मीदवारों ने जीत हासिल की।

पश्चिम बंगाल चुनावों पर असर

बांग्लादेश चुनावों के केवल दो महीने बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव हुए, इसलिए सीमापार प्रभाव की आशंका पहले से थी। भाजपा ने बांग्लादेश को अपना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना लिया और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए आक्रामक अभियान चलाया। “घुसपैठ” और बांग्लादेश से अवैध प्रवासन के कारण जनसांख्यिकीय बदलाव का मुद्दा चुनाव के केंद्र में रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर गृह मंत्री अमित शाह और स्थानीय उम्मीदवारों तक, भाजपा नेताओं ने ममता सरकार पर वोट बैंक राजनीति के लिए अवैध प्रवासन और मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।इस बार भाजपा की भारी जीत के पीछे हिंदू मतों का अभूतपूर्व ध्रुवीकरण प्रमुख कारण रहा, और इसमें बांग्लादेश की स्थिति का बड़ा योगदान माना जा रहा है।

जब तक शेख हसीना सत्ता में थीं और मुक्ति संग्राम समर्थक ताकतें प्रभावी थीं, तब तक पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश को भाषा और संस्कृति से जुड़ा एक मित्रवत पड़ोसी माना जाता था। लेकिन हसीना के पतन और हजारों अवामी लीग समर्थकों के भारत, खासकर पश्चिम बंगाल, में शरण लेने के बाद 1946-47 के विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा की यादें फिर उभरने लगीं।

भारत सीमा से लगे क्षेत्रों में जमात-ए-इस्लामी के शानदार प्रदर्शन का सीधा असर पश्चिम बंगाल पर पड़ा। जमात द्वारा जीती गई 68 सीटों में से 51 सीटें भारतीय सीमा से सटे इलाकों में थीं, जिनमें अधिकांश पश्चिम बंगाल से लगती थीं।इससे भाजपा उम्मीदवारों को यह कहने का अवसर मिला कि एक “छिद्रयुक्त सीमा” के उस पार इस्लामी उभार तेजी से बढ़ रहा है। “हिंदू खतरे में हैं” का उनका नारा मतदाताओं के बीच प्रभावी साबित हुआ।परिणामस्वरूप भाजपा ने बांग्लादेश सीमा से लगी 44 सीटों और आसपास की 50 से अधिक सीटों पर जीत हासिल की। यहां तक कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी भाजपा को लाभ मिला।

अब आगे क्या?

पश्चिम बंगाल में भाजपा के सत्ता में आने के बाद “दो बंगालों” के बीच सोशल मीडिया युद्ध और तेज हो गया है।बांग्लादेश के कट्टरपंथी इस्लामी समूह पश्चिम बंगाल में मुसलमानों पर “अत्याचार” के आरोप लगा रहे हैं। वे मतदाता सूची से नाम हटाने, सड़कों पर नमाज पर प्रतिबंध और गोहत्या संबंधी नियंत्रणों को मुद्दा बना रहे हैं। कुछ लोग नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की तुलना असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से कर रहे हैं।

दूसरी ओर, शेख हसीना को “वैध प्रधानमंत्री” बताने और उन्हें सम्मान के साथ वापस लाने की मांग करने वाले सुवेंदु अधिकारी के पुराने चुनावी भाषण सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं।

BNP के वरिष्ठ नेता जमात-ए-इस्लामी और उसके सहयोगियों की उग्र भाषा से दूरी बनाए हुए हैं, लेकिन वे भारत-बांग्लादेश संबंधों पर बढ़ते तनाव को लेकर चिंतित दिखाई देते हैं। उनका मानना है कि इससे भारत के साथ संबंध सुधारने की संभावनाएं सीमित हो सकती हैं।

पानी को लेकर बढ़ता विवाद

सबसे बड़ा विवाद अब नदी जल बंटवारे को लेकर उभर रहा है।BNP नेताओं के अनुसार, तारीक रहमान को अब तक यह स्पष्ट संकेत नहीं मिला है कि भारत नवंबर में समाप्त हो रही गंगा जल बंटवारा संधि को आगे बढ़ाएगा या नहीं। भारतीय विदेश मंत्रालय भी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है।

भारतीय राजनयिकों का कहना है कि भारत बांग्लादेश की हालिया गतिविधियों पर नजर रख रहा है, खासकर तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना में चीन की बढ़ती भूमिका पर।बांग्लादेश का तर्क है कि 2009 से तीस्ता जल समझौते पर भारत की असफलता ने उसे चीनी सहायता लेने के लिए मजबूर किया। यह भी सर्वविदित है कि पिछले दशक की शुरुआत में ममता बनर्जी ने मनमोहन सिंह सरकार द्वारा प्रस्तावित तीस्ता समझौते का विरोध किया था।

इसी कारण अवामी लीग समर्थकों ने ममता की हालिया हार पर खुशी जताई और सुवेंदु अधिकारी के हसीना समर्थक रुख का स्वागत किया। लेकिन इससे तारीक रहमान के नेतृत्व वाली सरकार के साथ संबंध बेहतर होंगे, इसकी संभावना कम दिखती है, क्योंकि अवामी लीग पर प्रतिबंध को औपचारिक रूप दे दिया गया है।

सीमा सुरक्षा और पाकिस्तान का बढ़ता प्रभाव

नई भाजपा सरकार द्वारा पश्चिम बंगाल में सीमा बाड़बंदी को तेज करना भी तनाव बढ़ाने वाला एक और कारण बन सकता है।उधर, बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ते सैन्य और खुफिया सहयोग ने दिल्ली की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। पाकिस्तान के कट्टरपंथी संगठनों से जुड़े माने जाने वाले व्यक्तियों के बांग्लादेश दौरों और जमात-ए-इस्लामी तथा कट्टरपंथी अहल-ए-हदीस के बीच बढ़ती नजदीकियों ने भारतीय खुफिया एजेंसियों को सतर्क कर दिया है।

इन घटनाओं ने दक्षिण एशिया की राजनीति को एक नए और अधिक तनावपूर्ण मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की राजनीति अब पहले से कहीं अधिक गहराई से एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई दे रही है।

(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)

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