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NEET आंदोलन पर तीनों दलों का संयम, क्या बदली तमिल राजनीति?


NEET आंदोलन पर तीनों दलों का संयम, क्या बदली तमिल राजनीति?
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NEET आंदोलन पर DMK, AIADMK और TVK की संयमित प्रतिक्रिया ने संकेत दिया कि तमिलनाडु में अब विचारधारा से ज्यादा चुनावी रणनीति और राजनीतिक गणित असर डाल रहे हैं।

नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा NEET विरोधी आंदोलन अब केवल राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन भर नहीं रह गया है। यह आंदोलन तमिलनाडु की राजनीति के लिए भी एक बड़ी परीक्षा बन गया है। दशकों तक राज्य की राजनीति सामाजिक न्याय, संघवाद, भाषा, धर्मनिरपेक्षता और राज्यों की स्वायत्तता जैसे वैचारिक मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही। लेकिन हालिया घटनाक्रम यह संकेत देता है कि अब राजनीतिक दलों के फैसलों में विचारधारा से ज्यादा चुनावी रणनीति और राजनीतिक गणित हावी होने लगे हैं।

यह सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK), अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (AIADMK) और तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) ने NEET आंदोलन पर कैसी प्रतिक्रिया दी, बल्कि यह भी है कि क्या अब भी विचारधारा उनके राजनीतिक फैसलों का मुख्य आधार है।

NEET का सबसे मुखर विरोध करने वाली DMK भी रही संयमित

DMK लंबे समय से NEET का सबसे मुखर विरोध करती रही है। पार्टी लगातार इस परीक्षा को खत्म करने की मांग उठाती रही है। उसने विधानसभा में कई प्रस्ताव पारित किए और न्यायमूर्ति ए.के. राजन समिति का गठन किया, जिसकी रिपोर्ट में कहा गया था कि NEET ग्रामीण इलाकों, सरकारी स्कूलों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के साथ असमान व्यवहार करती है।

इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर DMK ने वर्षों तक NEET के खिलाफ राजनीतिक अभियान चलाया। ऐसे में उम्मीद थी कि जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन का नेतृत्व भी वही करेगी।पार्टी ने आंदोलन के प्रति समर्थन जरूर जताया। उसके सांसद ए. राजा ने जंतर-मंतर पहुंचकर अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक और छात्र प्रतिनिधियों से मुलाकात भी की। लेकिन इसके आगे पार्टी की सक्रियता सीमित रही। उसके छात्र और युवा संगठनों को बड़े स्तर पर आंदोलन में नहीं उतारा गया। संसद में भी पार्टी ने NEET के बजाय मेकेदातु परियोजना के मुद्दे पर ज्यादा जोर दिया।

DMK का यह सतर्क रवैया इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अतीत में यही पार्टी वैचारिक मुद्दों को बड़े जनांदोलन में बदलने के लिए जानी जाती रही है।

बदली राजनीतिक प्राथमिकताओं का असर

विश्लेषकों का मानना है कि DMK के संयम के पीछे उसकी बदलती राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के साथ उसके संबंध पहले जैसे मजबूत नहीं रहे हैं। वहीं तमिलनाडु में TVK के उभरने से नया राजनीतिक मुकाबला पैदा हुआ है।हाल के दिनों में पार्टी के कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि DMK अब केवल उन्हीं मुद्दों पर केंद्र सरकार का विरोध करेगी, जो सीधे तमिलनाडु के हितों से जुड़े होंगे। यह रणनीति राजनीतिक रूप से व्यावहारिक हो सकती है, लेकिन इससे बीजेपी के खिलाफ राष्ट्रीय वैचारिक विपक्ष की उसकी पुरानी छवि कमजोर होती दिख रही है।

संगठनात्मक कमजोरी और बीजेपी गठबंधन से घिरी AIADMK

AIADMK भी लंबे समय से तमिलनाडु को NEET से छूट देने की मांग करती रही है। इसके बावजूद उसने भी आंदोलन को लेकर बेहद सीमित प्रतिक्रिया दी।हालांकि DMK और TVK की तरह यह संयम पूरी तरह राजनीतिक रणनीति का परिणाम नहीं माना जा रहा। पार्टी लंबे समय से आंतरिक गुटबाजी, चुनावी हार और कमजोर संगठनात्मक ढांचे से जूझ रही है। इससे उसकी बड़े स्तर पर आंदोलन खड़ा करने की क्षमता कम हो गई है।इसके अलावा बीजेपी के साथ उसका गठबंधन भी उसे केंद्र सरकार की नीति के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाने से रोकता है। ऐसे में उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता पर राजनीतिक मजबूरियां भारी पड़ती दिखाई दीं।

सत्ता में आने के बाद बदला TVK का रुख

TVK ने सत्ता में आने से पहले NEET का जोरदार विरोध किया था। पार्टी ने DMK और AIADMK दोनों पर आरोप लगाया था कि वे परीक्षा खत्म कराने में विफल रहे। उसने तमिलनाडु के हितों की रक्षा करने और बीजेपी का मजबूती से मुकाबला करने का भी वादा किया था।लेकिन सरकार बनने के बाद उसका रवैया बदलता नजर आया।कई स्थानों पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई, प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया और यहां तक कि उसके कुछ सहयोगी दलों ने भी सरकार के रुख पर सवाल उठाए।

कानून-व्यवस्था बनाए रखना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी होती है, लेकिन जिस मुद्दे का सरकार खुद आधिकारिक तौर पर विरोध करती हो, उसी मुद्दे पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई कई सवाल खड़े करती है।

प्रशासनिक जिम्मेदारियों ने बदली राजनीति

TVK का मौजूदा रवैया यह भी दिखाता है कि सत्ता में आने के बाद प्रशासनिक जिम्मेदारियां राजनीतिक व्यवहार को बदल देती हैं। विपक्ष में रहते हुए जो आक्रामक रुख अपनाया जाता है, सरकार बनने के बाद वही रवैया व्यावहारिक सीमाओं में बंध जाता है।मुख्यमंत्री विजय कई बार संकेत दे चुके हैं कि उनकी सरकार राज्यपाल और केंद्र सरकार के साथ अनावश्यक टकराव से बचना चाहती है।यह तमिलनाडु की उस पारंपरिक राजनीति से अलग है, जहां राज्य के हितों की रक्षा के लिए केंद्र से टकराव को सामान्य और आवश्यक माना जाता था।

तीनों दलों की प्रतिक्रिया में दिखा एक समान पैटर्न

अगर DMK, AIADMK और TVK की प्रतिक्रियाओं को साथ रखकर देखा जाए तो एक समान प्रवृत्ति सामने आती है। तीनों दलों ने आधिकारिक तौर पर NEET के खिलाफ अपना रुख नहीं बदला, लेकिन आंदोलन के दौरान उनके राजनीतिक कदम तत्कालीन परिस्थितियों और चुनावी समीकरणों से प्रभावित दिखे।

DMK ने लंबे वैचारिक अभियान के बावजूद सीमित सक्रियता दिखाई।

AIADMK संगठनात्मक कमजोरी और गठबंधन की बाधाओं के कारण प्रभावी भूमिका नहीं निभा सकी।

TVK ने सत्ता में आने के बाद वही प्रशासनिक सतर्कता दिखाई, जिसकी वह विपक्ष में आलोचना करती थी।

तमिलनाडु की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत

इन तीनों दलों की अलग-अलग परिस्थितियों के बावजूद एक बात समान रही—वैचारिक प्रतिबद्धताओं की तुलना में तत्काल राजनीतिक और चुनावी हित ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हुए।यह बदलाव संकेत देता है कि तमिलनाडु की राजनीति अब केवल विचारधारा से संचालित नहीं हो रही है। सामाजिक न्याय, संघवाद, धर्मनिरपेक्षता और केंद्र-राज्य संबंध जैसे मुद्दे आज भी राजनीतिक भाषणों का हिस्सा हैं, लेकिन वास्तविक राजनीतिक फैसलों पर चुनावी गणित, गठबंधन की मजबूरियां, प्रशासनिक जिम्मेदारियां और नई राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का असर लगातार बढ़ रहा है।

इसका अर्थ यह नहीं कि विचारधारा पूरी तरह समाप्त हो गई है, बल्कि अब वह राजनीतिक निर्णयों का एकमात्र आधार नहीं रह गई है। तमिलनाडु की राजनीति में वैचारिक विमर्श के साथ-साथ व्यावहारिक राजनीति और चुनावी रणनीति की भूमिका पहले से कहीं अधिक मजबूत होती दिखाई दे रही है।

(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)

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