KS Dakshina Murthy

पासपोर्ट विवाद: क्या नागरिकता की परिभाषा बदलने की हो रही है कोशिश?


पासपोर्ट विवाद: क्या नागरिकता की परिभाषा बदलने की हो रही है कोशिश?
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पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण नहीं बताने वाले सरकारी दावे पर विवाद बढ़ गया है। 2013 के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश की नई व्याख्या पर सवाल उठ रहे हैं।

पत्रकारिता में एक प्रचलित कहावत है—"फ्लाइंग ए बैलून"। इसका मतलब होता है किसी विचार या प्रस्ताव को औपचारिक घोषणा से पहले सार्वजनिक रूप से उछालना, ताकि यह देखा जा सके कि जनता की प्रतिक्रिया कैसी रहती है। विदेश मंत्रालय (MEA) के एक अज्ञात अधिकारी के हवाले से हाल ही में दिया गया यह बयान कि "पासपोर्ट केवल यात्रा का दस्तावेज है, नागरिकता का प्रमाण नहीं", इसी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।

इस बयान के सामने आने के बाद सोशल मीडिया और मीडिया में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। लोगों ने इसका मजाक उड़ाया, नाराजगी जताई, हैरानी व्यक्त की और बड़ी संख्या में मीम्स भी साझा किए। लेकिन असली सवाल यह है कि सरकार ने ऐसा बयान सार्वजनिक क्यों होने दिया, जो पहली नजर में पासपोर्ट की विश्वसनीयता को कमजोर करता दिखाई देता है?

2013 के अदालत के आदेश का हवाला

जब इस बयान पर विवाद बढ़ा तो भाजपा और केंद्र सरकार की ओर से सफाई दी गई कि यह कोई नई नीति नहीं है। उनका कहना था कि 2013 में बॉम्बे हाईकोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है।सरकार का तर्क था कि यदि अदालत 13 साल पहले यह बात कह चुकी थी, तो अब इस पर इतना विवाद क्यों हो रहा है? हालांकि सवाल यह भी उठता है कि यदि वास्तव में ऐसा आदेश 2013 में दिया गया था, तो उस समय या उसके बाद कभी इस पर व्यापक सार्वजनिक बहस क्यों नहीं हुई?

अदालत के आदेश में वास्तव में क्या कहा गया था?

दिलचस्प बात यह है कि कई मीडिया संस्थानों ने भाजपा और सरकार की व्याख्या तो प्रकाशित की, लेकिन अदालत के आदेश का वास्तविक अंश सामने नहीं रखा।बाद में सामाजिक संस्था सबरंग ने 26 जुलाई 2013 के अनवर हुसैन अब्दुल कादर शेख बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले का मूल आदेश सार्वजनिक किया। आदेश का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि अदालत ने कहीं भी यह नहीं कहा कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है।दरअसल, इस मामले में अपीलकर्ता द्वारा जो पासपोर्ट प्रस्तुत किया गया था, वह समाप्त (Terminated) हो चुका था। इसलिए अदालत ने उसे प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया।

फैसले के तीसरे पैराग्राफ में स्पष्ट रूप से लिखा गया है:"जिस पासपोर्ट का उल्लेख किया गया है, वह पहले ही समाप्त हो चुका है। इसलिए उस पर कानूनी रूप से भरोसा नहीं किया जा सकता।"यानी अदालत ने केवल समाप्त हो चुके पासपोर्ट को साक्ष्य मानने से इनकार किया था, न कि पासपोर्ट की वैधता या उसकी नागरिकता सिद्ध करने की क्षमता पर कोई सामान्य टिप्पणी की थी।

सरकार की व्याख्या पर सवाल

इस संदर्भ में सरकार और भाजपा द्वारा किया गया दावा अदालत के मूल आदेश से मेल नहीं खाता। अदालत ने यह नहीं कहा कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, बल्कि केवल यह कहा कि समाप्त हो चुके दस्तावेज पर भरोसा नहीं किया जा सकता।फिर भी, 13 साल पुराने इस आदेश को आज ऐसे प्रस्तुत किया जा रहा है मानो अदालत ने पासपोर्ट की कानूनी स्थिति को ही सीमित कर दिया हो।

नागरिकता पर बढ़ता विवाद

यदि इसे केवल एक सामान्य गलती माना जाए तो बात अलग होती, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में नागरिकता का मुद्दा पहले से ही विवादों के केंद्र में है।आलोचकों का कहना है कि यदि पासपोर्ट को केवल यात्रा दस्तावेज मान लिया जाए, तो भविष्य में किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाने या उसकी नागरिकता पर सवाल उठाने के लिए यह तर्क इस्तेमाल किया जा सकता है कि पासपोर्ट निर्णायक प्रमाण नहीं है।

मतदाता सूची और नागरिकता का सवाल

हाल के महीनों में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) अभियान के दौरान बिहार और बाद में पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटाए जाने को लेकर विवाद खड़ा हुआ।आलोचकों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर सवाल उठाया जाता है, तो केवल मतदान का अधिकार ही नहीं, बल्कि कई सरकारी योजनाओं और कल्याणकारी लाभों पर भी असर पड़ सकता है।

करोड़ों लोगों पर पड़ सकता है असर

विदेश मंत्रालय के अधिकारी का यह बयान, यदि भविष्य की नीति का आधार बनता है, तो इसके व्यापक परिणाम हो सकते हैं।हालांकि भारत में केवल लगभग 10 प्रतिशत आबादी के पास पासपोर्ट है, लेकिन संख्या के लिहाज से यह लगभग 10 करोड़ लोगों के बराबर है।

नागरिकता और पासपोर्ट का संबंध

कानूनी रूप से यह सही है कि हर भारतीय नागरिक के पास पासपोर्ट होना जरूरी नहीं है। नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत नागरिकता सिद्ध करने के कई अन्य आधार भी हैं।लेकिन व्यवहारिक रूप से यदि किसी व्यक्ति के पास वैध भारतीय पासपोर्ट है, तो लगभग हर स्थिति में वह भारतीय नागरिक ही माना जाता है। केवल बहुत सीमित परिस्थितियों, जैसे कुछ शरणार्थियों के मामलों में, गैर-नागरिकों को विशेष यात्रा दस्तावेज जारी किए जाते हैं। ऐसे मामले बेहद कम हैं और उन्हें आधार बनाकर सामान्य पासपोर्ट धारकों की नागरिकता पर संदेह नहीं किया जा सकता।

क्या एनआरसी की नई शक्ल है?

लेख में कहा गया है कि पासपोर्ट की भूमिका को लेकर उठी यह बहस पिछले एक दशक में नागरिकता से जुड़े विवादों की नई कड़ी है।2019 में असम के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लेकर देशभर में व्यापक विवाद हुआ था। इसके बाद नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) लागू किए जाने की घोषणा हुई, जिसे लेकर भी व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। सरकार पर आरोप लगा कि एनआरसी और सीएए के संयुक्त प्रभाव से बड़ी संख्या में लोगों, विशेषकर मुस्लिम समुदाय, में नागरिकता को लेकर असुरक्षा पैदा हुई।विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर एनआरसी लागू करने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई। अब आलोचकों का दावा है कि मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) को उसी प्रक्रिया का नया रूप माना जा रहा है।

पासपोर्ट को केवल यात्रा दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश ऐसे समय में सामने आई है, जब नागरिकता और मतदाता अधिकार पहले से ही राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं।आलोचकों का कहना है कि यदि नागरिकता से जुड़े स्थापित कानूनी सिद्धांतों की नई व्याख्या की जाती है, तो भविष्य में बड़ी संख्या में लोगों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। वहीं सरकार का पक्ष है कि वह केवल पहले से मौजूद कानूनी स्थिति को स्पष्ट कर रही है।इसी वजह से यह बहस केवल पासपोर्ट तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि नागरिकता, मताधिकार और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े बड़े सवालों का हिस्सा बन गई है।

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