
पासपोर्ट को लेकर SIR विवाद के बीच जानिए पासपोर्ट एक्ट, 1967 क्या कहता है, कब पासपोर्ट नागरिकता से जुड़ता है और धारा 6 व 20 का कानूनी महत्व क्या है।
पासपोर्ट एक्ट की जांच से पता चलता है कि पासपोर्ट कानूनी तौर पर यात्रा का एक दस्तावेज़ है, लेकिन लगभग सभी मामलों में इसे जारी करना भारतीय नागरिकता से सीधे तौर पर जुड़ा होता है।
24 जून को भारत के एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र ने विदेश मंत्रालय (MEA) के एक अज्ञात वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से कहा, "पासपोर्ट यात्रा का दस्तावेज़ है, नागरिकता का दस्तावेज़ नहीं। सैद्धांतिक रूप से यही बात पासपोर्ट को दूसरे दस्तावेज़ों से अलग करती है। भले ही विदेश यात्रा के दौरान पासपोर्ट आपकी राष्ट्रीयता की पुष्टि करता है, फिर भी यह आपकी नागरिकता का दस्तावेज़ नहीं है।" यह अधिकारी 14वें पासपोर्ट सेवा दिवस कार्यक्रम में शामिल हो रहे थे। अधिकारी ने राष्ट्रीयता और नागरिकता के बीच अंतर करने या उनके बीच के ज़रूरी संबंध पर ध्यान नहीं दिया।
इस संदर्भ में यह ध्यान देना दिलचस्प है कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 19 जून को वार्षिक क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा था, "...पासपोर्ट केवल पन्नों की एक पुस्तिका नहीं है। यह आर्थिक गतिशीलता, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और, मैं तो कहूंगा, राष्ट्रीय पहचान का भी एक शक्तिशाली और महत्वपूर्ण साधन है।" ज़्यादातर मामलों में पासपोर्ट स्पष्ट रूप से उसे रखने वाले व्यक्ति की राष्ट्रीय पहचान बताता है। इसलिए जयशंकर एक स्पष्ट बात कह रहे थे, लेकिन एक मंझे हुए राजनेता होने के नाते उन्होंने भी पासपोर्ट और नागरिकता के बीच के संबंध पर कोई टिप्पणी नहीं की।
SIR का MEA से कोई लेना-देना नहीं
अखबार ने स्पष्ट किया कि अधिकारी उनके पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रहे थे। रिपोर्ट के मुताबिक सवाल यह था कि, "क्या भारतीय पासपोर्ट का इस्तेमाल वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने को चुनौती देने के लिए किया जा सकता है? यह सूची 16 राज्यों में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया के तहत तैयार की जा रही है।"
यह स्पष्ट नहीं है और थोड़ा अजीब भी है कि अधिकारी SIR प्रक्रिया में दस्तावेज़ों की प्रकृति और वैधता के मामले में क्यों पड़े। वैसे भी अधिकारियों को विवादों से दूर रहना चाहिए, खासकर उन मामलों में जो उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। SIR का MEA से कोई लेना-देना नहीं है।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, MEA अधिकारियों ने उस अज्ञात वरिष्ठ अधिकारी की इस बात का समर्थन किया है कि पासपोर्ट नागरिकता का दस्तावेज़ नहीं है। उनका कहना है कि यह लंबे समय से चली आ रही व्याख्या है और बॉम्बे हाई कोर्ट के एक फैसले का भी इसे समर्थन प्राप्त है। उन्होंने इस दलील के समर्थन में पासपोर्ट एक्ट के नियम 20 का भी हवाला दिया है।
पासपोर्ट एक्ट, 1967
पासपोर्ट और अन्य यात्रा दस्तावेज़ों का मामला पासपोर्ट एक्ट, 1967 के तहत आता है। यह कानून तब बनाया गया था, जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भारतीय नागरिक को विदेश यात्रा करने का अधिकार है और इस अधिकार को केवल कानून बनाकर ही विनियमित (रेगुलेट) किया जा सकता है।
एक्ट की धारा 6 में सरकार के उस अधिकार का उल्लेख है, जिसके तहत वह विभिन्न कारणों से किसी भारतीय नागरिक को विदेश जाने के लिए पासपोर्ट देने से इनकार कर सकती है। यह याद रखना उचित होगा कि 1967 में भारतीयों को दक्षिण अफ्रीका जाने की अनुमति नहीं थी, क्योंकि वहां रंगभेद (अपार्थाइड) की नीति लागू थी। इसी तरह, इज़राइल जाने की भी अनुमति नहीं थी, क्योंकि भारत के उसके साथ राजनयिक संबंध नहीं थे और भारत उसकी फिलिस्तीनियों के प्रति नीतियों की आलोचना करता था। इसलिए एक्ट में सरकार के उस अधिकार का भी उल्लेख किया गया, जिसके तहत वह भारतीयों को किसी विशेष देश या देशों की यात्रा की अनुमति देने से इनकार कर सकती थी। आज ऐसी कोई पाबंदी नहीं है और भारतीय पासपोर्ट सभी देशों के लिए मान्य हैं।
एक्ट की धारा 6(2) में कहा गया है, "(2) इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों के अधीन, पासपोर्ट प्राधिकरण धारा 5 की उपधारा (2) के खंड (c) के तहत किसी विदेशी देश की यात्रा के लिए पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज़ जारी करने से इनकार कर सकता है, यदि निम्नलिखित में से एक या अधिक कारण मौजूद हों, और कोई अन्य कारण नहीं..."।
धारा 6(2)(a) में सबसे पहला कारण बताया गया है, "(a) कि आवेदक भारत का नागरिक नहीं है।" इस प्रकार स्पष्ट है कि इस धारा के तहत जब तक कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है, उसे पासपोर्ट प्राप्त करने का अधिकार नहीं है।
चूंकि अब पासपोर्ट सभी देशों के लिए मान्य हैं, इसलिए पासपोर्ट देने से इनकार करने का यह आधार हटाया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। वास्तव में, अब पासपोर्ट आवेदन पत्र में एक स्व-घोषणा (Self Declaration) देना अनिवार्य है, जिसमें आवेदक यह घोषित करता है "मैं भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता के प्रति निष्ठावान हूं। मैंने स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता या यात्रा दस्तावेज़ प्राप्त नहीं किया है। मैंने भारतीय नागरिकता न तो खोई है, न छोड़ी है और न ही मुझसे छीनी गई है। मैंने भारतीय पासपोर्ट रखने और उसके उपयोग से संबंधित किसी भी शर्त का उल्लंघन नहीं किया है।"
पासपोर्ट आवेदन जांच के अधीन
एक्ट की धारा 5 के तहत किए गए सभी पासपोर्ट आवेदनों—धारा 20 के तहत आने वाले कुछ अपवादों को छोड़कर जांच की जाती है। यह प्रावधान धारा 5(2) के तहत किया गया है।जांच पुलिस करती है। सामान्यतः आवेदन पत्र की एक प्रति पुलिस को भेजी जाती है। पुलिस यह सत्यापित करती है कि आवेदक द्वारा दिया गया पता सही है या नहीं और यह भी जांचती है कि उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला तो दर्ज नहीं है।
चूंकि पुलिस के पास पूरा आवेदन पत्र होता है, इसलिए उसे नागरिकता संबंधी स्व-घोषणा की भी जानकारी होती है। इसके अलावा, इस घोषणा में भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता के प्रति निष्ठा की भी बात कही जाती है।क्या किसी ऐसे व्यक्ति से ऐसी निष्ठा की घोषणा कराई जा सकती है, जो भारतीय नागरिक ही न हो?
यदि पुलिस के पास इसके विपरीत कोई जानकारी होती है, तो वह आवेदक के संबंध में प्रतिकूल (नेगेटिव) रिपोर्ट दे सकती है। ये सभी बातें स्पष्ट करती हैं कि धारा 5 और धारा 6 के तहत केवल वही व्यक्ति पासपोर्ट प्राप्त करते हैं, जो भारतीय नागरिक होने की शर्त पूरी करते हैं।
क्या है तर्क?
इसका एक और पहलू भी है।जहां तक इस लेखक की जानकारी है, ऐसा कोई एक दस्तावेज़ नहीं है जो जन्म से भारतीय नागरिक व्यक्ति की नागरिकता की औपचारिक पुष्टि करता हो।विडंबना यह है कि जिन लोगों ने आवेदन करके भारतीय नागरिकता प्राप्त की है, उनके पास कम-से-कम ऐसा दस्तावेज़ अवश्य होता है जो यह साबित करता है कि भारत सरकार ने उनकी नागरिकता स्वीकार कर ली है।इसलिए भारतीय नागरिकता संबंधी स्व-घोषणा को तब तक सही माना जाना चाहिए, जब तक कि उसे गलत साबित न कर दिया जाए।
इस तर्क के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि यद्यपि पासपोर्ट निश्चित रूप से एक यात्रा दस्तावेज़ है, लेकिन जिन लोगों को धारा 5 के तहत आवेदन करने और धारा 6(2)(a) की शर्त पूरी करने के बाद पासपोर्ट जारी किया गया है, उन्हें भारतीय नागरिक माना जाना चाहिए।यह पूरी तरह तार्किक है और विदेश मंत्रालय को यह स्वीकार करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए, क्योंकि धारा 20 केवल अपवाद स्वरूप स्थितियों के लिए है।
धारा 20
धारा 20 में कहा गया है कि "पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज़ जारी करने से संबंधित पूर्ववर्ती प्रावधानों में कुछ भी निहित होने के बावजूद, केंद्र सरकार किसी ऐसे व्यक्ति को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज़ जारी कर सकती है या जारी करवाने का निर्देश दे सकती है, जो भारत का नागरिक नहीं है, यदि सरकार की राय में जनहित में ऐसा करना आवश्यक हो।"
संवेदनशील और सुरक्षा संबंधी मामलों से जुड़े कई राजनयिक जानते हैं कि इस धारा के तहत बहुत सीमित संख्या में पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेज़ जारी किए जाते हैं तथा इनके लिए धारा 5 और 6 की सामान्य प्रक्रिया लागू नहीं होती।इनमें से कुछ दस्तावेज़ गैर-भारतीयों को भी जारी किए जा सकते हैं, लेकिन वे सीमित अवधि के लिए होते हैं और कुछ मामलों में उनमें राष्ट्रीयता का उल्लेख भी सामान्य तरीके से नहीं किया जाता।
ऐसे अपवादस्वरूप जारी किए गए पासपोर्ट का उदाहरण देकर यह कहना कि सभी भारतीय पासपोर्ट अपने धारक की नागरिकता नहीं बताते, पूरी तरह गलत और अनुचित होगा।यह तब भी सही है, जब इस विषय पर कुछ न्यायिक फैसले मौजूद हों। स्पष्ट है कि उन फैसलों में सभी परिस्थितियों पर विचार नहीं किया गया है।
भारतीय पासपोर्ट अपने धारक की भारतीय राष्ट्रीयता की पुष्टि करते हैं।SIR की प्रक्रिया विवादों में रही है। पासपोर्ट भले ही यात्रा दस्तावेज़ हों, लेकिन तार्किक निष्कर्ष यही है कि उनके धारक भारतीय नागरिक होते हैं। सरकार को SIR के संदर्भ में इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि धारा 20 के तहत जारी किए गए पासपोर्ट स्पष्ट रूप से अपवाद की श्रेणी में आते हैं।
आखिर में एक बात, भारतीय पासपोर्ट अपने धारक की भारतीय राष्ट्रीयता की पुष्टि करते हैं।अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में राष्ट्रीयता (Nationality) का अर्थ उस देश से होता है, जिससे कोई व्यक्ति संबंधित होता है, जबकि नागरिकता (Citizenship) का उपयोग भारतीय संविधान और घरेलू कानूनी संदर्भ में किया जाता है।एक तरह से यह किसी व्यक्ति और उसके देश के बीच कानूनी संबंध को दर्शाती है। हालांकि, भारत में जहां दोहरी नागरिकता को मान्यता नहीं है, वहां व्यावहारिक रूप से राष्ट्रीयता का आधार नागरिकता ही होती है।


