
राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामला बीजेपी, आरएसएस और विहिप के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। इस विवाद ने संगठनों की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं और राजनीतिक हलचल तेज कर दी है।
राम मंदिर चढ़ावा चोरी का मामला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूरे परिवार के लिए रोजाना नई-नई मुसीबतें खड़ी कर रहा है। पिछले 12 वर्षों में शायद यह पहला ऐसा मुद्दा है जिसने केंद्र और उत्तर प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इससे जुड़े विश्व हिंदू परिषद की साख पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
दरअसल, बीजेपी और संघ के नेताओं को शुरुआती दौर में यह लगा कि, यह मामला बहुत ज्यादा तूल नहीं पकड़ेगा। हालात का आकलन करने में यह सबसे बड़ी चूक थी। मामला सामने आने के बाद जिस तरह से चंपत राय ने इस पूरी ख़बर को नकार दिया था, अब उनका वही पहला बयान सरकार, बीजेपी संगठन और संघ तीनों पर भारी पड़ता हुआ नज़र आ रहा है।
चंपत राय का इस्तीफा और भाजपा का आंतरिक सर्वे
मामला सामने आने के कुछ दिनों तक तो संघ के नेता भी चंपत राय की इस राय से सहमत थे कि इस्तीफा देने का मतलब आरोप स्वीकार कर लेना है और फिर इसका असर विश्व हिंदू परिषद के साथ-साथ आरएसएस पर भी पड़ेगा। लेकिन बाद में एक सर्वे ने संघ और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को अपनी राय बदलने को मजबूर कर दिया और फिर आनन-फानन में चंपत राय को इस्तीफा देने का फरमान सुना दिया गया।
दरअसल, कुछ महीने बाद ही (फरवरी, 2027) में उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव होना है। देश की संसद- लोकसभा में सबसे ज्यादा 80 सांसद भेजने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में बीजेपी लगातार दो बार (2017 और 2022) जीत हासिल कर चुकी है और 2027 में हैट्रिक की तैयारी कर रही है। लेकिन राम मंदिर चढ़ावा चोरी कांड के बाद करवाए गए एक इंटरनल सर्वे ने बीजेपी के साथ-साथ संघ नेताओं की भी नींद उड़ा दी है।
इंटरनल सर्वे का चौंकाने वाला आंकड़ा और केंद्र पर असर
इस इंटरनल सर्वे में यह तथ्य निकल कर सामने आया है कि अगर इस हालत में चुनाव हुए तो बीजेपी को उत्तर प्रदेश में 180 सीटें ही हासिल हो पाएगी। जबकि उत्तर प्रदेश विधानसभा की कुल संख्या 403 है और राज्य में सरकार बनाने के लिए कम से कम 202 विधायकों का समर्थन हासिल करना जरूरी है। ऐसे में उत्तर प्रदेश की सत्ता से बीजेपी की विदाई केंद्र सरकार की स्थिरता पर भी असर डाल सकती है।
कांग्रेस की कर्नाटक सरकार के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे जिस अंदाज में आरएसएस के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है, उससे संघ के नेताओं को इस बात की आशंका सत्ता रही है कि अगर केंद्र से बीजेपी की विदाई होती है तो फिर नई सरकार उनके लिए कई तरह की समस्याएं खड़ी कर सकती है। इसलिए चंपत राय के इस्तीफे पर सब तैयार हो गए, हालांकि अयोध्या का ताजा माहौल यह बता रहा है कि सिर्फ इस्तीफे से बात नहीं बनेगी।
क्या यूपी में दोहराया जा रहा है 1993 का इतिहास?
इस इंटरनल सर्वे का सबसे दिलचस्प पहलू तो यह है कि बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ने के बावजूद उनकी सीटों की संख्या में कमी आ रही है। यह सर्वे अपने आप में यह बता रहा है कि उत्तर प्रदेश में एक बार फिर से 1993 का इतिहास दोहराया जा रहा है। जब भगवान श्री राम के नाम पर अपनी सरकार कुर्बान करने वाले कल्याण सिंह यूपी की जनता से जनादेश मांग रहे थे और जनता ने उन्हें पिछले चुनाव के मुकाबले वोट तो ज्यादा दिया लेकिन फिर भी कल्याण सिंह को विपक्ष में ही बैठना पड़ा।
यह बताया जा रहा है कि 1993 की तर्ज पर ही 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को वोट तो ज्यादा मिलेगा लेकिन उसके खिलाफ वोटों का ध्रुवीकरण होने के कारण बीजेपी सत्ता से बाहर हो जाएगी। इस हार में हिंदू मतदाता ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
1991 और 1993 के चुनावी समीकरणों का सबक
इस इंटरनल सर्वे ने बीजेपी के पुराने घावों को भी ताजा कर दिया है। सोशल इंजीनियरिंग की गदा के साथ राम रथ के लहर पर सवार होकर बीजेपी 1991 में पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता में आई थी और कल्याण सिंह राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। वर्ष 1991 में हुए विधानसभा चुनाव (उस समय उत्तराखंड भी उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा हुआ करता था) में राज्य की 425 सीटों पर 31 फीसदी से ज्यादा मत के साथ बीजेपी को 221 सीटों पर जीत हासिल हुई थी।
विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने उत्तर प्रदेश समेत बीजेपी की सभी 4 राज्य सरकारों को बर्खास्त कर, राष्ट्रपति शासन लगा दिया था। बीजेपी के धुरंधर नेताओं को लगा कि अगले चुनाव में इससे भी ज्यादा विधायकों के साथ वापसी होगी, लेकिन यूपी की जनता ने उनका सपना तोड़ दिया।
वर्ष 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 1991 के मुकाबले 2 प्रतिशत के लगभग ज्यादा मत मिले। लेकिन 33 फीसदी से ज्यादा मत हासिल करने के बावजूद बीजेपी के सीटों की संख्या 221 से घटकर 177 पर आ गई। उस चुनाव में मुलायम सिंह यादव (सपा) को 109 और कांशीराम (बसपा) को 67 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। हालांकि यह दोनों राजनीतिक दल मिलकर भी बीजेपी से एक सीट कम यानी 176 ही जीत पाए थे। लेकिन बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के नाम पर सभी दलों ने मुलायम सिंह को समर्थन दे दिया।
नाराज हिंदू वोटर और बीजेपी-संघ की नई रणनीति
बीजेपी और संघ के नेताओं को इस बात का अहसास हो गया है कि बूथ स्तर तक बनाई गई रणनीति के कारण पार्टी के मत प्रतिशत में तो बढ़ोतरी होगी लेकिन आम तौर पर जो हिंदू वोट करने से परहेज करते हैं, वो भी राम मंदिर चढ़ावा चोरी विवाद से आहत है और सिर्फ बीजेपी को सबक सिखाने के लिए वह ईवीएम का बटन दबाएगा।
यानी जहां जो उम्मीदवार उसे बीजेपी से ताकतवर दिखेगा, वह उसे ही वोट करेगा। इससे चिंतित होकर ही बीजेपी और संघ इस विवाद में एक पेज पर आने का हरसंभव प्रयास कर रहे हैं, ताकि चुनावी हार के खतरे को कम किया जा सके।


