Vivek Deshpande

SIR पर सियासी संग्राम, क्या मुस्लिम वोटरों पर है निशाना?


SIR पर सियासी संग्राम, क्या मुस्लिम वोटरों पर है निशाना?
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SIR प्रक्रिया को लेकर देश में विवाद गहरा गया है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि मुस्लिम मतदाताओं को सूची से हटाकर उनके अधिकार कमजोर किए जा रहे हैं।

देश के कई राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर गंभीर बहस छिड़ गई है। भारतीय संविधान की समावेशी भावना में विश्वास रखने वाले लोगों के बीच इस प्रक्रिया को लेकर चिंता और आशंका बढ़ती जा रही है। खासकर उन राज्यों में, जहां मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में है, वहां बड़ी तादाद में मतदाताओं के नाम हटाए जाने से केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनमें बड़ी संख्या मुसलमानों की बताई जा रही है। AltNews की एक जांच के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में हटाए गए मतदाताओं में लगभग 80 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय से हैं। यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में मुस्लिम मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं।

क्या सिर्फ चुनावी रणनीति है SIR?

इस पूरे विवाद के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या SIR केवल चुनावी लाभ हासिल करने की रणनीति है या फिर यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के उस बड़े वैचारिक एजेंडे का हिस्सा है, जिसमें “हिंदू राष्ट्र” की परिकल्पना की जाती रही है। आलोचकों का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए मुसलमानों को राजनीतिक रूप से कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।

एमजी वैद्य का 2016 का लेख फिर चर्चा में

RSS के दिवंगत विचारक एमजी वैद्य द्वारा वर्ष 2016 में लिखा गया एक लेख अब फिर चर्चा में है। उन्होंने उस लेख में कहा था कि जो लोग समान नागरिक संहिता (UCC) का विरोध करते हैं, उन्हें वोट देने के अधिकार से वंचित किया जा सकता है।उन्होंने लिखा था कि यदि कोई व्यक्ति UCC को मानने से इनकार करता है, तो उसे विधानसभा और संसद चुनावों में मतदान का अधिकार छोड़ना होगा। हालांकि, वे स्थानीय निकाय चुनावों में वोट दे सकते हैं। वैद्य का तर्क था कि संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में कदम उठाने का निर्देश देता है।

संविधान और नागरिक अधिकारों पर बहस

वैद्य ने अपने लेख में यह भी कहा था कि संविधान के प्रति “चयनात्मक रवैया” स्वीकार नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, जो लोग अनुच्छेद 44 को नहीं मानना चाहते, उन्हें मतदान का अधिकार नहीं मिलना चाहिए।आलोचकों का कहना है कि इस तरह के विचार लोकतांत्रिक मूल्यों और मौलिक अधिकारों के खिलाफ हैं। उनका आरोप है कि वर्तमान समय में SIR की प्रक्रिया के जरिए इन्हीं विचारों को व्यवहार में उतारने की कोशिश हो रही है।

मुस्लिम समुदाय में बढ़ी चिंता

कई मुस्लिम संगठनों और विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि SIR की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और बड़ी संख्या में लोगों को बिना पर्याप्त सुनवाई के मतदाता सूची से बाहर किया जा रहा है। उनका कहना है कि इससे लाखों लोग मतदान अधिकार खो सकते हैं।कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यदि बड़ी संख्या में मुसलमानों को मतदाता सूची से बाहर किया जाता है, तो इससे उनकी राजनीतिक भागीदारी कमजोर होगी और वे चुनावी रूप से अप्रासंगिक बन सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर भी सवाल

पश्चिम बंगाल में लाखों मतदाताओं के नाम हटाए जाने के बाद मामला अदालत तक पहुंचा, लेकिन आलोचकों का कहना है कि राहत देने की दिशा में पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए। इससे प्रभावित लोगों के बीच असुरक्षा और चिंता और बढ़ गई है।

राजनीतिक और सामाजिक असर

यह मुद्दा केवल मतदाता सूची तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब यह नागरिकता, संवैधानिक अधिकार और लोकतंत्र की निष्पक्षता से जुड़ी बड़ी बहस का रूप ले चुका है। आने वाले समय में यह विषय राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बना रह सकता है।

(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)

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