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बांग्लादेश में सत्ता के पीछे सुपरपावर की जंग? अमेरिका-चीन आमने-सामने


बांग्लादेश में सत्ता के पीछे सुपरपावर की जंग? अमेरिका-चीन आमने-सामने
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रिपोर्ट में दावा है कि बांग्लादेश में राष्ट्रपति चुप्पू की विदाई के पीछे अमेरिका का दबाव और चीन के CMEC विस्तार को रोकने की रणनीति अहम वजह हो सकती है।

बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। राष्ट्रपति शाहाबुद्दीन चुप्पू के इस्तीफे के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह केवल स्वास्थ्य कारणों से लिया गया फैसला था या इसके पीछे कोई बड़ी भू-राजनीतिक रणनीति काम कर रही है? राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि अमेरिका नहीं चाहता कि चीन का चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारा (China-Myanmar Economic Corridor - CMEC) बांग्लादेश तक विस्तारित हो, क्योंकि इससे हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की रणनीतिक पकड़ मजबूत हो सकती है और अमेरिका की अपनी क्षेत्रीय योजनाओं को झटका लग सकता है।

राष्ट्रपति चुप्पू के इस्तीफे से गरमाई बांग्लादेश की राजनीति

राष्ट्रपति शाहाबुद्दीन चुप्पू ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दिया, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उन पर पद छोड़ने का दबाव बनाया गया था। रिपोर्टों के अनुसार, प्रधानमंत्री तारिक रहमान पर इस्लामी दलों और बीएनपी के कट्टरपंथी नेताओं का दबाव था कि चुप्पू को हटाया जाए।यह दबाव उस समय और बढ़ गया जब पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, जो अगस्त 2024 से दिल्ली में रह रही हैं, ने बांग्लादेश लौटने की इच्छा जताई। उन्होंने कहा कि वह अपने खिलाफ चल रहे मामलों का सामना करने के लिए देश लौटना चाहती हैं। हालांकि, बांग्लादेश में कई लोगों का मानना है कि उनकी वापसी बड़े जन आंदोलन और अवामी लीग की सत्ता में वापसी की कोशिश का कारण बन सकती है।

क्यों माने जा रहे थे चुप्पू अहम?

राजनीतिक हलकों में यह आशंका थी कि यदि देश में बड़े पैमाने पर अशांति फैलती है, तो राष्ट्रपति चुप्पू अपने संवैधानिक आपातकालीन अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते थे। इससे मौजूदा सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती थी।इससे पहले चुप्पू यह भी कह चुके थे कि उन्हें शेख हसीना का कोई औपचारिक इस्तीफा पत्र नहीं मिला था। इस बयान को भी मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ संभावित संकेत के तौर पर देखा गया।

क्या अमेरिका के दबाव में हटाए गए चुप्पू?

बांग्लादेशी खुफिया सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि राष्ट्रपति चुप्पू की विदाई के पीछे केवल घरेलू राजनीति नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय दबाव भी काम कर रहा था।सूत्रों का कहना है कि हाल ही में लंदन में इलाज के दौरान चुप्पू और शेख हसीना के बीच कथित टेलीफोनिक बातचीत की अफवाहें फैलाई गईं। इसके बाद अमेरिका ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान पर चुप्पू को हटाने के लिए कूटनीतिक दबाव बढ़ाया।

रिपोर्ट के अनुसार, शेख हसीना की संभावित वापसी केवल एक बहाना थी, जबकि वास्तविक उद्देश्य राष्ट्रपति पद पर अमेरिका के करीबी माने जाने वाले किसी नेता—संभवतः नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस—को लाना था।

चीन के बढ़ते प्रभाव से अमेरिका की चिंता

रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधानमंत्री तारिक रहमान की हालिया चीन यात्रा ने वॉशिंगटन की चिंताएं बढ़ा दी हैं।बताया गया है कि इस यात्रा के दौरान चीन और बांग्लादेश के बीच कई अहम समझौते हुए, जिनमें बंदरगाह विकास और आधारभूत ढांचा परियोजनाओं में चीनी निवेश शामिल है। साथ ही बांग्लादेश ने चीन के प्रस्ताव पर चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे (CMEC) को अपने देश तक विस्तारित करने पर भी सहमति जताई।यदि यह परियोजना आगे बढ़ती है, तो चीन को बंगाल की खाड़ी तक स्थायी भू-संपर्क मिल जाएगा और हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी रणनीतिक स्थिति और मजबूत हो जाएगी।

'रखाइन कॉरिडोर' पर अमेरिका की नजर

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन की इस परियोजना से अमेरिका की उस रणनीति को झटका लग सकता है, जिसके तहत वह बांग्लादेश से म्यांमार के रखाइन राज्य तक एक कॉरिडोर विकसित करना चाहता है।बताया जाता है कि यह मार्ग म्यांमार में सक्रिय विद्रोही समूहों तक रसद और सहायता पहुंचाने की अमेरिकी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। वहीं, म्यांमार की सैन्य सरकार चीन की करीबी सहयोगी मानी जाती है और वह CMEC परियोजना को आगे बढ़ाने के पक्ष में है।

ढाका पहुंचे अमेरिकी अधिकारी

रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री रहमान की चीन यात्रा के तुरंत बाद अमेरिकी दबाव और बढ़ गया।बताया गया है कि जुलाई के अंत में पूर्व सीआईए अधिकारी जेराल्ड हैमिल्टन ढाका पहुंचे, जबकि दक्षिण एशिया मामलों के लिए अमेरिकी प्रतिनिधि सर्जियो गोर की भी बांग्लादेश यात्रा प्रस्तावित है।सूत्रों के अनुसार, इन अधिकारियों का उद्देश्य बांग्लादेश सरकार को चीन समर्थित गलियारा परियोजना से पीछे हटने और राष्ट्रपति पद के लिए मुहम्मद यूनुस के नाम पर सहमति बनाने के लिए राजी करना है।यदि बीएनपी यूनुस का समर्थन करती है, तो इस्लामी दलों का भी उन्हें समर्थन मिलने की संभावना जताई जा रही है।

BRICS में शामिल होने की इच्छा भी बनी चिंता

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका की चिंता केवल चीन तक सीमित नहीं है।प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने BRICS में शामिल होने की इच्छा भी जताई है और उन्हें सितंबर में नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया गया है।कहा जा रहा है कि भारत इस अवसर का उपयोग बांग्लादेश के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने और सीमा विवाद जैसे मुद्दों पर बातचीत के लिए कर सकता है। साथ ही भारत अवामी लीग पर लगे प्रतिबंध हटाने और बांग्लादेश में सामान्य लोकतांत्रिक माहौल बहाल करने की वकालत भी कर सकता है।

भारत के सामने संतुलन की चुनौती

भारत के लिए स्थिति काफी संवेदनशील मानी जा रही है।एक ओर भारत नहीं चाहता कि बांग्लादेश और म्यांमार में चीन का प्रभाव अत्यधिक बढ़े, वहीं दूसरी ओर वह क्षेत्र में अमेरिकी हस्तक्षेप को भी सीमित रखना चाहता है भारत की कलादान मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट परियोजना और भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी महत्वपूर्ण कनेक्टिविटी परियोजनाएं म्यांमार से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में म्यांमार में अस्थिरता भारत के रणनीतिक हितों को प्रभावित कर सकती है।

भारत-चीन के बीच उभरता संतुलन?

रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशिया में अमेरिकी प्रभाव को सीमित करने के मुद्दे पर भारत और चीन के बीच एक प्रकार की रणनीतिक समझ विकसित होती दिखाई दे रही है।विश्लेषकों का मानना है कि भारत एक संतुलित नीति अपनाना चाहता है—जहां एक ओर अमेरिका के सहयोग से चीन के प्रभाव को सीमित किया जाए, वहीं दूसरी ओर BRICS और चीन जैसे मंचों के जरिए अमेरिका को भी पूरे क्षेत्र में एकतरफा प्रभाव स्थापित करने से रोका जाए।

ऐसे में बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक हलचल केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में अमेरिका, चीन और भारत के बीच चल रही व्यापक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी अहम हिस्सा बनती दिखाई दे रही है।

(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों)

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