
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित MOU पर सहमति बनने के संकेत हैं। पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका में है, जबकि परमाणु मुद्दा अब भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित अंतरिम समझौते की संभावना अब पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत दिखाई दे रही है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया की कई विश्वसनीय रिपोर्टों के अनुसार दोनों देशों के बीच एक ऐसे समझौते पर काम चल रहा है, जिसमें मौजूदा युद्धविराम को 60 दिनों के लिए बढ़ाने, होर्मुज़ जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने, ईरानी तटों और बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकेबंदी हटाने और ईरानी तेल बिक्री पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों को कम करने जैसे महत्वपूर्ण बिंदु शामिल हो सकते हैं।
60 दिन का एमओयू और परमाणु बातचीत
प्रस्तावित समझौते के तहत अमेरिका और ईरान अगले 60 दिनों तक एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MOU) के दायरे में रहकर बातचीत जारी रखेंगे। इस अवधि के दौरान ईरान के परमाणु संवर्धन कार्यक्रम और उसके पास मौजूद लगभग 400 किलोग्राम संवर्धित यूरेनियम के मुद्दे पर वार्ता होगी। जरूरत पड़ने पर इस अवधि को आगे भी बढ़ाया जा सकता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक अगर दोनों पक्ष सहमत हो जाते हैं, तो इस एमओयू पर हस्ताक्षर पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हो सकते हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 24 मई को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि पाकिस्तान पूरी ईमानदारी के साथ शांति प्रयासों को जारी रखेगा और जल्द ही अगले दौर की बातचीत की मेजबानी करने की उम्मीद करता है।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि यह एमओयू काफी हद तक तय हो चुका है।
मुस्लिम देशों से लगातार संपर्क में ट्रंप
पिछले कुछ दिनों में ट्रंप ने सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन, मिस्र और तुर्किये के नेताओं से इस मुद्दे पर बातचीत की है। उन्होंने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से भी चर्चा की, जिन्होंने ईरान जाकर एमओयू को आगे बढ़ाने की कोशिश की।पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी पहले से ही ईरान में मौजूद थे और उन्होंने इस मुद्दे पर कई दौर की बातचीत की। इस मध्यस्थता में कतर की टीम भी शामिल हुई, जिससे बातचीत को अतिरिक्त मजबूती मिली।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने 22 मई को कहा था कि इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान मुख्य मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है और उसने काबिले तारीफ काम किया है।
ट्रंप पर बढ़ता राजनीतिक दबाव
ट्रंप इस समझौते को लेकर गंभीर हैं। ईरान युद्ध के दौरान और युद्धविराम के बाद उन्होंने कई विरोधाभासी बयान दिए, लेकिन हाल के दिनों में लगातार मुस्लिम देशों के नेताओं से बातचीत उनके गंभीर इरादों की ओर इशारा करती है।इसके अलावा यह भी माना जा रहा है कि इस बार अमेरिका-ईरान वार्ता में इजरायल का प्रभाव पहले जितना नहीं है। यह इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए झटका माना जा रहा है, हालांकि उनके पास इसे रोकने के सीमित विकल्प हैं।
ट्रंप की गिरती लोकप्रियता, अमेरिका में बढ़ती पेट्रोल कीमतें और नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव भी उनके लिए दबाव का कारण बने हुए हैं। रिपब्लिकन पार्टी के कई नेता चुनाव को लेकर चिंतित हैं, इसलिए ट्रंप किसी बड़े कूटनीतिक समझौते के जरिए राजनीतिक बढ़त हासिल करना चाहते हैं।
ईरान का परमाणु रुख सबसे बड़ी बाधा
हालांकि समझौते की राह में सबसे बड़ी अड़चन ईरान का परमाणु कार्यक्रम बना हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने यह संकेत दिया है कि ईरान अपने संवर्धित यूरेनियम भंडार को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।असल सवाल यह है कि क्या मौजूदा युद्ध और कूटनीतिक दबावों के बाद ईरान भविष्य में परमाणु हथियार हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ेगा।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन जैसे व्यवहारिक नेता इस समझौते के पक्ष में बताए जा रहे हैं, लेकिन रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के भीतर कई कठोर धड़े इसके खिलाफ हैं। उनकी सबसे बड़ी चिंता होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर नियंत्रण को लेकर है। वे न सिर्फ जहाजों की आवाजाही पर नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं, बल्कि वहां से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलने के पक्ष में भी बताए जा रहे हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह स्वीकार करना मुश्किल होगा कि ईरान अकेले या ओमान के साथ मिलकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य को नियंत्रित करे और वहां टोल वसूले।
समझौता हुआ तो भी पूरी राहत नहीं
अगर बिना यूरेनियम संवर्धन रोकने की स्पष्ट प्रतिबद्धता के एमओयू पर हस्ताक्षर हो जाते हैं, तो इसे ट्रंप की विश्वसनीयता के लिए झटका माना जाएगा।भले ही ईरान यह कहे कि उसका परमाणु हथियार बनाने का इरादा नहीं है, लेकिन दुनिया की चिंताएं पूरी तरह खत्म नहीं होंगी। यहां तक कि अगर समझौते में भविष्य की बातचीत का वादा शामिल हो और ट्रंप यह चेतावनी दें कि अमेरिका जरूरत पड़ने पर फिर सैन्य कार्रवाई करेगा, तब भी संदेह बना रहेगा।अगर मोजतबा खामेनेई अंतिम मंजूरी दे देते हैं, तो इस सप्ताह के मध्य तक पाकिस्तान में एमओयू पर हस्ताक्षर हो सकते हैं।
दुनिया को मिलेगी राहत, लेकिन अनिश्चितता बनी रहेगी
होर्मुज़ जलडमरूमध्य खुलने से दुनिया को बड़ी राहत मिलेगी, क्योंकि यह वैश्विक तेल आपूर्ति का अहम मार्ग है। हालांकि खाड़ी क्षेत्र से तेल और गैस आपूर्ति पूरी तरह सामान्य होने में कई महीने लग सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक यह एमओयू स्थायी समझौते में नहीं बदलता, तब तक खाड़ी देशों में बड़े निवेश और ऊर्जा परियोजनाओं को लेकर सतर्कता बनी रहेगी।इसलिए भले ही यह संभावित एमओयू दुनिया भर में शांति की दिशा में बड़ा कदम माना जाए, लेकिन इसके साथ कई अनिश्चितताएं और रणनीतिक सवाल भी लंबे समय तक बने रहेंगे।
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