Nilanjan Mukhopadhyay

राम मंदिर विवाद से डिलिमिटेशन तक, क्यों निर्णायक होंगे यूपी चुनाव 2027?


राम मंदिर विवाद से डिलिमिटेशन तक, क्यों निर्णायक होंगे यूपी चुनाव 2027?
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राम मंदिर विवाद, परिसीमन, लोकसभा विस्तार और विपक्षी रणनीति के बीच 2027 का यूपी चुनाव राज्य ही नहीं, देश की राजनीति की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है।

उत्तर प्रदेश में 2027 की विधानसभा चुनावी लड़ाई अब केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रह गई है। राम मंदिर से जुड़े कथित वित्तीय घोटालों, परिसीमन (डिलिमिटेशन), लोकसभा सीटों के संभावित विस्तार और 'वन नेशन, वन इलेक्शन' जैसे मुद्दों ने इस चुनाव को राष्ट्रीय राजनीति के भविष्य से जोड़ दिया है। ऐसे में उत्तर प्रदेश का जनादेश केवल राज्य सरकार तय नहीं करेगा, बल्कि देश की राजनीतिक दिशा भी प्रभावित कर सकता है।

राम मंदिर विवाद ने भाजपा के सामने खड़ी की नई चुनौती

राम मंदिर निर्माण के लिए जुटाए गए चंदे और मंदिर ट्रस्ट से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए एक असामान्य राजनीतिक चुनौती पैदा कर दी है। आरोप लगाए गए हैं कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने जमीनों की खरीद ऊंचे दामों पर की और चंदे के इस्तेमाल में भी गड़बड़ियां हुईं।

यह स्थिति इसलिए भी अलग है क्योंकि भाजपा ने वर्षों तक राम मंदिर आंदोलन को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनाया। अब उसी आंदोलन से जुड़े समर्थकों के बीच पार्टी की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या विपक्ष इन आरोपों को राजनीतिक मुद्दा बनाकर भाजपा की साख को और नुकसान पहुंचा पाएगा।

आस्था, सरकार और संस्थागत भरोसे का सवाल

राम मंदिर विवाद ने धार्मिक आस्था, सुशासन और संस्थागत विश्वास के उस संगम को प्रभावित किया है, जिसे 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भाजपा और केंद्र सरकार ने राजनीतिक रूप से मजबूत बनाया था।नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने फरवरी 2020 में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया, जिसे मंदिर निर्माण और उसके प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके बाद मंदिर, ट्रस्ट और सरकार के बीच एक स्वाभाविक राजनीतिक और प्रशासनिक संबंध स्थापित हो गया।

प्रधानमंत्री मोदी की सीधी भूमिका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर निर्माण से जुड़े तीन सबसे महत्वपूर्ण अवसरों पर स्वयं हिस्सा लिया। अगस्त 2020 में भूमि पूजन, जनवरी 2024 में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा और नवंबर 2025 में ध्वजारोहण कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी ने उन्हें मंदिर परियोजना का सबसे प्रमुख चेहरा बना दिया।ऐसे में यदि मंदिर से जुड़े वित्तीय विवाद सामने आते हैं, तो विपक्ष स्वाभाविक रूप से इन मामलों की राजनीतिक जिम्मेदारी भी भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी पर डालने की कोशिश करेगा।

2027 के चुनावों पर पड़ सकता है असर

लेख के अनुसार, इन घटनाओं का असर 2027 की शुरुआत में होने वाले उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड विधानसभा चुनावों पर पड़ सकता है। यही वह समय होगा जब लंबे समय से लंबित जनगणना भी शुरू होने की संभावना है और हरिद्वार में कुंभ मेले का आयोजन भी होगा।शुरुआती दौर में भाजपा के भीतर इस बात पर चर्चा हुई थी कि सुरक्षा बलों पर अतिरिक्त दबाव को देखते हुए चुनाव 2026 के अंत में कराए जा सकते हैं। लेकिन राम मंदिर से जुड़े कथित वित्तीय विवाद सामने आने के बाद अब ऐसा करना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा माना जा रहा है। पार्टी संभवतः समय के साथ इस विवाद का असर कम होने का इंतजार करना चाहेगी।

भाजपा के 'सुशासन' के दावे पर असर

उत्तर प्रदेश भाजपा का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक गढ़ है। ऐसे में राम मंदिर से जुड़े आरोप पार्टी के सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के दावों को चुनौती दे सकते हैं।हालांकि विपक्ष के सामने भी बड़ी चुनौती है। समाजवादी पार्टी आज भी जनता के एक वर्ग के बीच उस छवि से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई है, जिसे भाजपा लगातार 'माफिया राज', 'तुष्टिकरण' और कमजोर कानून व्यवस्था के रूप में प्रचारित करती रही है।

राम मंदिर विवाद के बाद 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर जो राजनीतिक आकलन किए जा रहे हैं, उनकी सबसे बड़ी वजह 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे हैं। इन चुनावों में समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के गठबंधन ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करते हुए भाजपा और उसके सहयोगियों से सात सीटें अधिक जीतीं।

2014 के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश में भाजपा चुनावी बढ़त खोती दिखाई दी। भाजपा और उसके सहयोगियों को कुल 36 सीटें मिलीं, जिनमें भाजपा ने 33 और उसके सहयोगियों ने तीन सीटें जीतीं। वहीं, इंडिया गठबंधन के खाते में 43 सीटें आईं, जिनमें समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटों पर जीत दर्ज की।

वोट प्रतिशत में भाजपा आगे, लेकिन सीटों में पिछड़ी

सीटों के लिहाज से सपा-कांग्रेस गठबंधन आगे रहा, लेकिन वोट शेयर के आंकड़े अलग तस्वीर पेश करते हैं।भाजपा और उसके सहयोगियों को 43.69 प्रतिशत वोट मिले, जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन का वोट प्रतिशत 43.52 रहा। यानी वोट प्रतिशत में भाजपा मामूली बढ़त बनाए रखने में सफल रही।इसके बावजूद फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (First-Past-The-Post) प्रणाली के कारण विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से विपक्ष को बढ़त मिल गई। 403 विधानसभा क्षेत्रों में से 223 क्षेत्रों में सपा-कांग्रेस गठबंधन आगे रहा, जबकि भाजपा और उसके सहयोगी केवल 174 क्षेत्रों में बढ़त बना सके।

'वोटों की बर्बादी' बनी भाजपा की चुनौती

लेख के अनुसार, यह चुनावी गणित का एक दिलचस्प उदाहरण था। भाजपा के कई बड़े नेताओं ने भारी अंतर से जीत दर्ज की, जिससे उनके पक्ष में पड़े अतिरिक्त वोट दूसरी सीटों पर कोई फायदा नहीं पहुंचा सके।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लखनऊ जैसी सीटों पर बड़े अंतर से जीत हासिल की। इन सीटों पर पड़े अतिरिक्त वोट चुनावी दृष्टि से 'वेस्ट' हो गए।इसके विपरीत, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने कई सीटें कम अंतर से जीतीं। इससे उनके वोट अधिक प्रभावी ढंग से विभिन्न सीटों पर जीत में बदल गए।

विधानसभा चुनाव में भाजपा के सामने नई चुनौती

2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को इसी चुनौती का समाधान तलाशना होगा। पार्टी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और कई वरिष्ठ मंत्रियों जैसे बड़े नेताओं को मैदान में उतारेगी, जिनकी लोकप्रियता कुछ क्षेत्रों में भारी वोट दिला सकती है, लेकिन उससे अन्य सीटों पर लाभ सीमित रह सकता है।ऐसे में चुनाव का परिणाम काफी हद तक प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर चलाए गए अभियान और उम्मीदवारों के चयन पर निर्भर करेगा।

राम मंदिर मुद्दे को लगातार उठा रहे हैं अखिलेश यादव

लेख में कहा गया है कि राम मंदिर से जुड़े कथित भूमि खरीद विवाद (2021) और चंदा घोटाले (2026) दोनों मामलों को समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव लगातार सार्वजनिक मंचों, सोशल मीडिया और जनसभाओं में उठाते रहे हैं।विपक्ष की ओर से इस मुद्दे को सबसे ज्यादा आक्रामक तरीके से उठाने वाले नेताओं में अखिलेश यादव प्रमुख रहे हैं।

सपा-कांग्रेस गठबंधन के सामने सबसे बड़ी परीक्षा

2024 के चुनाव में दोनों दलों की सफलता के बावजूद 2027 का रास्ता आसान नहीं माना जा रहा। दोनों पार्टियों को समय रहते सीटों के बंटवारे और संयुक्त चुनाव अभियान पर सहमति बनानी होगी।समाजवादी पार्टी पहले ही कांग्रेस पर अधिक सीटों की मांग को लेकर सवाल उठा चुकी है। कांग्रेस ने कथित तौर पर 120 सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी, जिसे सपा ने अव्यावहारिक बताते हुए कहा कि सीटों का फैसला जीतने की संभावना के आधार पर होना चाहिए, न कि राजनीतिक प्रतिष्ठा के आधार पर।

कांग्रेस के पुराने प्रदर्शन का हवाला

सपा अपने तर्क के समर्थन में 2022 के विधानसभा चुनाव का उदाहरण देती है। उस चुनाव में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ते हुए 403 में से केवल दो सीटें जीती थीं और उसका वोट प्रतिशत मात्र 2.33 प्रतिशत रहा था।हालांकि 2017 में जब पहली बार 'यूपी के दो लड़के' का नारा देकर सपा और कांग्रेस ने गठबंधन किया था, तब कांग्रेस ने 105 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उसे केवल सात सीटों पर जीत मिली थी।

गठबंधन में मतभेद भाजपा के लिए फायदेमंद

दोनों दल सार्वजनिक रूप से गठबंधन में चुनाव लड़ने की बात कह चुके हैं, लेकिन यदि सीट बंटवारे या नेतृत्व को लेकर विवाद बढ़ता है तो उसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा।लेख के अनुसार, सपा और कांग्रेस को संयुक्त चुनाव अभियान पहले से तैयार करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि दोनों दलों के कार्यकर्ता एक-दूसरे के उम्मीदवारों के पक्ष में पूरी ईमानदारी से वोट ट्रांसफर कराएं।

2027 के उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड विधानसभा चुनाव ऐसे समय होंगे जब भाजपा अपने कई बड़े संवैधानिक और चुनावी एजेंडों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकती है। लेखक का मानना है कि इन योजनाओं का असर केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संरचना पर भी पड़ सकता है।

फिर संसद में आ सकते हैं संवैधानिक संशोधन विधेयक

भाजपा उन विधेयकों को दोबारा संसद में लाने की तैयारी कर सकती है, जिन्हें अप्रैल में आयोजित विशेष सत्र के दौरान पेश किया गया था लेकिन पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने के कारण पारित नहीं कराया जा सका।उस समय इसे भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना गया था। हालांकि, इसके बाद पश्चिम बंगाल में मिली बड़ी चुनावी सफलता और विपक्षी दलों में कथित टूट-फूट ने भाजपा का मनोबल बढ़ाया है।

भाजपा अभी भी लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत से कुछ दर्जन सांसद दूर है और वह विपक्षी दलों में और विभाजन कराकर या कुछ दलों का समर्थन हासिल कर इन विधेयकों को पारित कराने की कोशिश कर सकती है।

लोकसभा विस्तार की तैयारी

भाजपा भविष्य में लोकसभा और अन्य विधानमंडलों की सीटों का विस्तार करने के पक्ष में है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाकर 816 तक की जा सकती है। उनका तर्क है कि इससे संसद का आकार तो बढ़ेगा, लेकिन राजनीतिक समीकरण भी पूरी तरह बदल जाएंगे।

महिला आरक्षण भी होगा अहम मुद्दा

भाजपा लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों का आरक्षण लागू करने की दिशा में भी आगे बढ़ना चाहती है।यदि लोकसभा विस्तार और महिला आरक्षण दोनों साथ लागू होते हैं तो कई संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की संरचना बदल सकती है।

परिसीमन आयोग की संभावना

भाजपा नए परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) के गठन की दिशा में भी आगे बढ़ सकती है। नए परिसीमन में असम मॉडल को आधार बनाया जा सकता है। उनके अनुसार, असम में परिसीमन के बाद कई ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदली गईं, जहां पहले अल्पसंख्यक समुदायों का चुनावी प्रभाव अधिक माना जाता था। इस दावे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों की अलग-अलग राय रही है।

'वन नेशन-वन इलेक्शन' भी एजेंडे में

मौजूदा लोकसभा कार्यकाल के दौरान भाजपा 'वन नेशन-वन इलेक्शन' (एक साथ चुनाव) के प्रस्ताव को भी आगे बढ़ा सकती है।यदि ऐसा होता है तो लोकसभा और सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने की व्यवस्था लागू हो सकती है, जिससे देश की चुनावी प्रक्रिया में व्यापक बदलाव आएगा।

'भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय कर सकते हैं 2027 के चुनाव'

लेखक का निष्कर्ष है कि यदि लोकसभा विस्तार, परिसीमन, महिला आरक्षण और 'वन नेशन-वन इलेक्शन' जैसी सभी योजनाएं लागू हो जाती हैं, तो भारत की चुनावी राजनीति का ढांचा पूरी तरह बदल सकता है।लेखक का मत है कि ऐसी स्थिति में भाजपा का राजनीतिक प्रभुत्व और मजबूत हो सकता है। हालांकि, यह लेखक का विश्लेषण और दृष्टिकोण है, न कि स्थापित तथ्य।इसी कारण लेखक 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को केवल एक राज्य का चुनाव नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की भावी दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ मानते हैं।

सपा और कांग्रेस के सामने बड़ी जिम्मेदारी

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी को आने वाले महीनों में अपनी राजनीतिक रणनीति बेहद सावधानी से तय करनी होगी।लेखक के अनुसार, दोनों दलों के फैसले, उनका गठबंधन और चुनावी अभियान केवल उत्तर प्रदेश के नतीजों को ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को भी प्रभावित कर सकते हैं।

(इस लेख में व्यक्त जानकारी, विचार और राय लेखक के निजी हैं। जरूरी नहीं कि वे द फेडरल (The Federal) के विचारों या आधिकारिक रुख का प्रतिनिधित्व करते हों।)

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