2027 चुनाव से पहले यूपी में बड़ा सियासी धमाका, हार के खौफ से झुकी BJP?
उत्तर प्रदेश बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के प्रमुख और कुंडा से 7 बार के विधायक राजा भैया (रघुराज प्रताप सिंह) से उनके आवास पर हुई मुलाकात ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाल ही में एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी। यूपी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कुंडा से लगातार विधायक राजा भैया (रघुराज प्रताप सिंह) से मिलने उनके घर पहुंचे।
दोनों नेताओं की मुलाकात हुई, तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, लेकिन तस्वीरों से ज्यादा चर्चा उस सवाल की शुरू हो गई जो इस मुलाकात के पीछे छिपा था। सवाल यह नहीं है कि बीजेपी और राजा भैया साथ क्यों दिखे? सवाल यह है कि आखिर ऐसी क्या राजनीतिक परिस्थिति बन गई कि सत्तारूढ़ पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को खुद राजा भैया के दरवाजे जाना पड़ा?
राजा भैया बीजेपी के लिए कोई अनजाने चेहरा नहीं हैं। राज्यसभा चुनाव हो या विधान परिषद का मुकाबला, राजा भैया और उनकी पार्टी कई मौकों पर बीजेपी के साथ खड़ी नजर आई है। तो फिर अचानक इस औपचारिक मुलाकात की जरूरत क्यों पड़ी? इसे समझने के लिए राजनीति को दो हिस्सों में देखना होगा—पहला, 23 अक्टूबर को होने वाला विधान परिषद चुनाव और दूसरा, 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव।
2024 का सबक: कौशांबी और प्रतापगढ़ की हार से बढ़ी चिंता
उत्तर प्रदेश में बीजेपी पिछले दस सालों से सत्ता में है। 2017 में प्रचंड बहुमत और 2022 में दोबारा सरकार बनाने के बाद भी राजनीति में एंटी-इंकंबेंसी (सरकार विरोधी लहर) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विपक्ष वोटर लिस्ट पुनरीक्षण (SIR), यूजीसी विवाद, रोजगार और कई स्थानीय मुद्दों को लेकर सरकार को घेर रहा है। ऐसे में बीजेपी 2027 के लिए कोई भी ऐसा समीकरण कमजोर नहीं छोड़ना चाहती जो नतीजों में अंतर ला सके।
राजा भैया की अहमियत समझने के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों को देखना जरूरी है। प्रतापगढ़ और कौशांबी सीटों पर बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा था। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इस हार का एक बड़ा कारण राजा भैया के समर्थकों की नाराजगी भी थी।
मामला तब शुरू हुआ जब बीजेपी की सहयोगी अपना दल (एस) की नेता अनुप्रिया पटेल ने प्रतापगढ़ की एक रैली में कहा था— "अब राजा मां की कोख से जन्म नहीं लेते, जनता राजा चुनती है।" इस बयान को सीधे राजा भैया से जोड़कर देखा गया, जिससे उनके समर्थकों में भारी नाराजगी फैल गई। कौशांबी में भी एसपी उम्मीदवार पुष्पेंद्र सरोज ने राजा भैया से मुलाकात की थी और बीजेपी उम्मीदवार एक लाख से ज्यादा वोटों से हार गए। इसने यह साबित किया कि राजा भैया का असर केवल कुंडा तक सीमित नहीं है, बल्कि आसपास के कई जिलों में भी है।
33 साल से अजेय: केवल जाति नहीं, नेटवर्क का खेल
राजा भैया को अक्सर सिर्फ एक 'ठाकुर चेहरा' माना जाता है, लेकिन 1993 से लगातार 33 सालों तक कुंडा से निर्दलीय और अपनी पार्टी से चुनाव जीतना केवल एक जाति के भरोसे संभव नहीं है। कुंडा विधानसभा सीट के गणित पर नजर डालें तो वहां क्षत्रिय मतदाता करीब 6 प्रतिशत हैं, जबकि दलित 26 प्रतिशत, मुस्लिम 15 प्रतिशत और यादव 14 प्रतिशत हैं। इसके बावजूद राजा भैया हर बार बड़े अंतर से जीत दर्ज करते हैं।
उनके समर्थक बताते हैं कि उनके पैतृक निवास बेंती राजभवन में लगने वाले जनता दरबार में हर समुदाय के लोग अपनी समस्याएं लेकर पहुंचते हैं। स्थानीय विवादों को सुलझाने और व्यक्तिगत मदद करने की इस शैली ने उनकी एक अलग सर्वस्वीकार्य छवि बनाई है।
तुरंत कारण: 23 अक्टूबर का विधान परिषद चुनाव
पंकज चौधरी की इस मुलाकात का तात्कालिक कारण 23 अक्टूबर को होने वाला विधान परिषद (MLC) चुनाव है। यूपी में शिक्षक और स्नातक कोटे की 11 सीटों के लिए मतदान होना है। यह चुनाव आम चुनाव से काफी अलग होता है, क्योंकि इसमें आम जनता नहीं बल्कि केवल पंजीकृत शिक्षक और स्नातक मतदाता ही वोट डालते हैं।
शिक्षक और युवा वर्ग पुरानी पेंशन योजना (OPS) और रोजगार जैसे सवालों को लेकर सरकार से लगातार जवाब मांग रहे हैं। ऐसे में बीजेपी को ऐसे नेताओं के सहयोग की जरूरत है, जिनका शैक्षणिक संस्थानों और शिक्षक वर्ग के बीच मजबूत प्रभाव हो। अवध और पूर्वांचल के कई जिलों में राजा भैया के समर्थकों का एक विशाल नेटवर्क है, जो इन मतदाता वर्गों तक सीधी पहुंच रखता है।
एमएलसी चुनावों में सबसे बड़ी चुनौती मतदाताओं को घर से निकालकर पोलिंग बूथ तक लाना होता है, क्योंकि इसमें वोटिंग प्रतिशत कम रहता है। राजा भैया का जमीनी संगठन और कैडर इस काम को बखूबी अंजाम दे सकता है।
दोस्ती बनाम औपचारिक गठबंधन: 2027 की तैयारी
अगर बीजेपी और राजा भैया के बीच औपचारिक चुनावी गठबंधन बनता है, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे। 2022 के विधानसभा चुनाव में राजा भैया की पार्टी ने 16 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। भले ही उन्हें जीत केवल 2 सीटों (कुंडा और बाबागंज) पर मिली, लेकिन उन सीटों पर बीजेपी तीसरे नंबर पर खिसक गई थी।
अगर दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं, तो सवर्ण और विशेषकर राजपूत वोटों का बंटवारा होता है, जिसका सीधा फायदा विपक्ष को मिलता है। इसके उलट, यदि गठबंधन होता है तो सीटों का तालमेल आसान हो जाएगा और बीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ जनसत्ता दल का कैडर भी एक ही उम्मीदवार के लिए काम करेगा।
समाजवादी पार्टी इस समय 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण के साथ आक्रामक रुख अपनाए हुए है और उसकी नजर बीजेपी के पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक में सेंध लगाने पर है। ऐसे में राजा भैया का बीजेपी के साथ खुलकर आना यह स्पष्ट संदेश देगा कि सवर्ण और राजपूत राजनीति का एक बड़ा चेहरा सत्ताधारी दल के साथ खड़ा है।
राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही स्थायी दुश्मन; वहां सिर्फ स्थायी होती हैं तो जरूरतें। पंकज चौधरी का राजा भैया के दरवाजे पहुंचना यह साबित करता है कि आगामी एमएलसी चुनाव और 2027 की सियासी जंग जीतने के लिए बीजेपी को राजा भैया के नेटवर्क और क्षेत्रीय प्रभाव की सख्त जरूरत महसूस हो रही है।

