राजपथ: बांकीपुर में बीजेपी का उम्र गणित फेल, अयोध्या में VIP पास का खेल और दिल्ली में महिलाओं को झटका
बांकीपुर विधानसभा सीट जहां से नितिन नवीन लगातार पांच बार विधायक रहे हैं। वहां पर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का पहला कदम ही सही नहीं पड़ा! उन्हें अपनी ही सीट पर प्रत्याशी बदलना पड़ गया।
बिहार की सियासत में जब बांकीपुर जैसी हॉट सीट का नाम आता है, तो बड़े-बड़े सूरमाओं के पसीने छूट जाते हैं। यह वो सीट है जिसे बीजेपी का अभेद्य किला कहा जाता है। ये वही विधानसभा सीट है जिससे नितिन नवीन लगातार पांच बार विधायक रहे। लेकिन अफ़सोस, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का पहला कदम ही इस दिशा में सही नहीं पड़ा! उन्हें अपनी ही सीट पर प्रत्याशी बदलना पड़ गया और कैंडिडेट बदलने से लेकर उम्र के गणित तक, हर मोर्चे पर मुँह की खानी पड़ रही है। इस बार इस किले की दीवारों में खुद बीजेपी ने ही ऐसा छेद कर दिया है कि सब बगलें झांक रहे हैं। इसे कहते हैं—'अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मारना'! और अब इस मुद्दे पर प्रशांत किशोर की 'जन सुराज' से लेकर आरजेडी (RJD) तक बीजेपी को घेरने में जुटे हैं, क्योंकि उन्हें बैठे-बिठाए एक बड़ा मुद्दा मिल गया है।
बीजेपी ने पहले तो 24 घंटे के अंदर अपने तय उम्मीदवार अभिषेक सिन्हा बंटी का पत्ता साफ कर दिया। पार्टी ने इसकी वजह 'पारिवारिक कारण' बताई, लेकिन सियासी गलियारों में चर्चा उड़ी कि उनके पिता का नाम चारा घोटाले में था। हालांकि, इसके पीछे की असली वजह एक समारोह के दौरान उनकी जुबान फिसलना माना जा रहा है। अभिषेक सिन्हा की जुबान फिसली और उपचुनाव की उम्मीदवारी से उनका पत्ता कट गया। लेकिन इसमें मजेदार बात यह रही कि बीजेपी अपना उम्मीदवार बदलेगी, इसका ऐलान मुख्य विपक्षी दल आरजेडी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर पहले ही कर दिया था। आरजेडी ने साफ लिखा था कि हार के डर से बीजेपी प्रत्याशी बदलने पर विचार कर रही है।
विवादों से बचने के लिए बीजेपी ने अपना प्रत्याशी तो बदल दिया, लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट तब आया जब नए नवेले उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा भी विवादों में घिर गए। वजह रही नीरज सिन्हा का ऑफिशियल 'बायोडाटा', जो सोशल मीडिया पर तैरने लगा। इस आधिकारिक दस्तावेज में उम्मीदवार की जन्मतिथि 1 जुलाई 1994 लिखी है, लेकिन उसी कागज़ पर नीचे लिखा है कि इन्होंने साल 2006 में बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता ली थी। अब ज़रा हिसाब लगाइए, 1994 में पैदा हुआ बच्चा 2006 में महज 12 साल का था! इसे कहते हैं—'होनहार बिरवान के होत चीकने पात'। जब सोशल मीडिया पर इसकी खिंचाई होने लगी, तो बीजेपी ने आनन-फानन में संशोधित बायोडाटा जारी कर दिया और उसमें से 2006 वाला पूरा हिस्सा ही गायब कर दिया। जो बीजेपी खुद को सबसे अनुशासित पार्टी कहती है, उसमें फैले इस मिसमैनेजमेंट ने उसे सीधे फ्रंट फुट से बैकफुट पर ला दिया है।
अयोध्या में वीआईपी पास का बड़ा खेल, दलालों की चांदी
बिहार के बाद अब बात करते हैं उत्तर प्रदेश की, जहाँ पर भी बीजेपी विवादों में घिरी हुई है। अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का ऐसा भयंकर भंडाफोड़ हुआ कि 26 जून को ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को इस्तीफा सौंपना पड़ा और 6 जुलाई को वो मंजूर भी हो गया। लेकिन कहते हैं ना कि 'चोर चोरी से जाए पर हेराफेरी से न जाए'! बड़े साहब कुर्सी से हट गए, लेकिन मंदिर के भीतर बैठा बिचौलियों का गैंग आज भी अंगद के पैर की तरह जमाकर बैठा हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मंदिर में मुफ्त में मिलने वाले वीआईपी पास को दलालों द्वारा 1 से 3 हज़ार रुपये में बेचा जा रहा है।
यह वीआईपी सुविधा उन लाचार बुजुर्गों, महिलाओं और मासूम बच्चों के लिए बनाई गई थी जो घंटों लाइन में खड़े नहीं हो सकते। मंदिर में एक दिन में 6 से 7 स्लॉट होते हैं और हर स्लॉट में 300 पास जारी करने का नियम है। लेकिन यहाँ तो दूध की रखवाली के लिए बिल्ली को बिठा दिया गया है! होटलों और पास जारी करने वालों ने मिलकर एक ऐसा रैकेट बना लिया है कि आम भक्त चाहे कितनी भी गुहार लगा ले, जब तक जेब ढीली नहीं करेगा, उसे वीआईपी दर्शन नसीब नहीं होंगे। बाहर दुनिया को दिखाने के लिए सब कुछ चकाचक और फ्री है, लेकिन अंदर ही अंदर आस्था का सौदा हो रहा है। चढ़ावा चोरी पर इस्तीफे हो गए, लेकिन ये पास का खेल अब भी चालू है। नीति बनाने वाले अधिकारी कबूतर की तरह आंखें बंद करके सो रहे हैं।
दिल्ली-NCR की महिलाओं को बड़ा झटका, बदलेगा बसों का नियम
अब बात करते हैं देश की राजधानी दिल्ली की, जहाँ दिल्ली-एनसीआर में महिलाओं की जिंदगी में एक बड़ा बदलाव होने वाला है जो उनकी जेब पर सीधा असर डालेगा। राजनीति में अक्सर ऐसा होता है कि जब सुविधाएं देने की बात हो तो फाइलें रेंगती हैं, लेकिन जब उनको छीनने की बात हो, तो फैसले गोली की रफ्तार से होते हैं। दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार ने अपने दूसरे साल में ही ऐसा पैंतरा चला है जो दिल्ली-एनसीआर की मुश्किलें बढ़ा देगा।
आम आदमी पार्टी के राज में मुफ्त सफर का मज़ा ले रही महिलाओं के होश उड़ गए हैं, क्योंकि 1 अगस्त 2026 से दिल्ली की बसों में फ्री सफर का पूरा ढांचा बदलने जा रहा है। अब बिना 'पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड' के मुफ्त का टिकट भूल जाइए। पुराना पेपर टिकट सिर्फ 31 जुलाई 2026 तक ही वैध रहेगा। सबसे बड़ा झटका यह है कि यह मुफ्त का सफर अब केवल दिल्ली की रहने वाली महिलाओं के लिए रह जाएगा। इसका मतलब यह हुआ कि यदि आप नोएडा, गाजियाबाद या गुरुग्राम से रोज़ दिल्ली नौकरी करने आती हैं, तो आपको अपनी जेब ढीली करनी होगी। चुनाव के वक्त तो बड़े-बड़े दावे किए गए थे और सभी महिलाएं सहेलियां थीं, लेकिन अब सरकार बनते ही 'हम आपके हैं कौन' वाला सियासी कार्ड खेल दिया गया है।

