ज़मीनी हकीकत: बिना पर्ची दवा लेना मजबूरी या शौक? जानिए ग्राउंड रिपोर्ट
ड्रग कंट्रोल विभाग के CCTV नियम से क्या रुकेगा नशा? 'ज़मीनी हकीकत' में जानिए क्यों आम आदमी सीधे केमिस्ट से दवा लेने को मजबूर है और क्या है आभा ऐप का सच।
Zamini Hakikat: ड्रग कंट्रोल विभाग ने देशभर के केमिस्टों को अपनी दुकानों के काउंटर पर सीसीटीवी कैमरे लगाने और रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है। इसका उद्देश्य बिना डॉक्टर की पर्ची के दवाओं की बिक्री को रोकना और नशे पर लगाम लगाना है। आखिर यह पहल सिर्फ प्रिस्क्रिप्शन को लेकर है या नशे पर रोकथाम के लिए या दोनों के लिए, यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इस निर्देश का जमीनी स्तर पर क्या असर होगा और आम लोगों की क्या मजबूरियां हैं, यह जानने के लिए द फ़ेडरल देश के शो 'ज़मीनी हकीकत' में हमने ग्राउंड पर जाकर सीधे जनता और केमिस्ट एसोसिएशन से बात की। इस मुद्दे पर किस व्यक्ति ने क्या राय रखी, आइए विस्तार से जानते हैं:
आम जनता की राय और उनकी मजबूरियां
परवीन कुमार (फल विक्रेता): परवीन कुमार ने बताया कि वे छोटी-मोटी बीमारियों जैसे खांसी-जुकाम के लिए सीधे केमिस्ट से दवाई ले लेते हैं। उन्होंने सरकारी अस्पतालों की एक बड़ी समस्या का जिक्र करते हुए कहा कि वहां अब 'आभा ऐप' (ABHA App) के जरिए स्मार्टफोन से स्कैन करने पर ही पर्चा बनता है। वे अपनी मां को हर्निया के ऑपरेशन के लिए अस्पताल ले गए थे, जहां उन्हें यह परेशानी उठानी पड़ी। परवीन का स्पष्ट कहना है कि स्मार्टफोन की इस अनिवार्यता के कारण अब अनपढ़ और बिना स्मार्टफोन वाले लोग सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं करा पाएंगे।
पवन (फल विक्रेता): पवन एक ठेले वाले हैं। उन्होंने बताया कि खरोंच या हल्के बुखार जैसी छोटी बीमारियों के लिए वे सीधे केमिस्ट से पैरासिटामोल या बैंडेड ले लेते हैं। हालांकि, माइग्रेन जैसी बड़ी बीमारी के लिए वे सरकारी पंत अस्पताल में इलाज कराते हैं जहां मुफ्त दवाई और टेस्ट होते हैं। लेकिन जनरल ओपीडी में भीड़ के कारण पूरा दिन बर्बाद हो जाता है और एक दिन में एक ही टेस्ट होने के कारण जांच में हफ्तों लग जाते हैं, जिससे उनके काम-धंधे और दिहाड़ी पर सीधा असर पड़ता है।
मुनमुन दुबे: मुनमुन दुबे ने बताया कि वे बदन दर्द या छोटी तकलीफ के लिए सीधे केमिस्ट से गोली ले लेते हैं और उसी से उनका काम चल जाता है। उन्होंने फीस या भीड़ को इसकी वजह नहीं माना, बल्कि उनके लिए यह एक सीधा और आसान विकल्प है।
हेमराज शर्मा: हेमराज शर्मा ने कहा कि जब उनके पास डॉक्टर के पास जाने का समय नहीं होता, तो वे सीधे केमिस्ट वाले से दवा ले लेते हैं। उनके लिए डॉक्टर की फीस उतनी बड़ी समस्या नहीं है, जितनी कि समय की कमी। इमरजेंसी में वे सीधे मेडिकल स्टोर से गोली लेना ही बेहतर समझते हैं।
सिराज: सिराज की राय बाकियों से एकदम अलग है। उनका कहना है कि वे कभी सीधे केमिस्ट से दवा नहीं लेते, बल्कि हमेशा डॉक्टर के पास जाकर दवा लिखवाते हैं। वे सरकारी डिस्पेंसरी नहीं जाते क्योंकि वहां बहुत समय लगता है, इसलिए वे अपने मोहल्ले के छोटे प्राइवेट डॉक्टरों से इलाज कराते हैं क्योंकि वे बड़े और महंगे डॉक्टरों की फीस नहीं दे सकते।
केमिस्ट एसोसिएशन का क्या कहना है?
विष्णु दुआ (वाइस प्रेसिडेंट, रिटेल डिस्ट्रीब्यूशन केमिस्ट अलायंस - RDCA): दिल्ली में करीब 12,000 लाइसेंसी केमिस्ट की दुकानें हैं, जो इनकी एसोसिएशन से जुड़ी हैं। विष्णु दुआ ने बताया कि सीसीटीवी कैमरे लगाने (कम से कम 15 दिन की रिकॉर्डिंग) के फैसले का उनकी एसोसिएशन स्वागत करती है। उन्होंने माना कि समाज में कुछ लोग गलत काम करते हैं, और इस नियम से 'नशामुक्त भारत अभियान' में मदद मिलेगी और युवाओं को नशे की लत से बचाया जा सकेगा।
इसके साथ ही विष्णु दुआ ने कुछ अहम चिंताएं और मांगें भी सामने रखीं:
अवैध ऑनलाइन फार्मेसी: विष्णु दुआ ने मांग की कि ऑनलाइन दवाइयों की बिक्री पर रोक लगनी चाहिए। उनका कहना है कि ऑनलाइन दवाइयों में फर्जी या 'डमी' पर्चियां (जैसे कस्टमर दिल्ली का और पर्ची चेन्नई की) लगाकर दवाइयां बेची जा रही हैं।
टेली-कंसल्टेशन (फोन पर इलाज): दुआ ने बताया कि फोन पर दवा पूछने के चलन में कई फर्जी डॉक्टर भी शामिल हो गए हैं, इसलिए मरीजों को जांच-परख कर ही ऐसे डॉक्टरों से सलाह लेनी चाहिए।
फर्स्ट-एड देने की छूट: उन्होंने सरकार से यह भी अपील की कि स्लम इलाकों और गरीब तबके के लोग जो प्राइवेट डॉक्टर की फीस अफोर्ड नहीं कर सकते, उनके लिए केमिस्टों को फर्स्ट-एड (प्राथमिक उपचार) और सामान्य दवाइयां देने की कानूनी अनुमति मिलनी चाहिए, ताकि जरूरतमंदों की मदद हो सके।
आशीष ग्रोवर ( सेक्रेटरी, दिल्ली ड्रग्स ट्रेडर्स एसोसिएशन (DDTA), भागीरथ पैलेस):
दिल्ली की सबसे बड़ी थोक दवा मार्केट 'भागीरथ पैलेस' के जनरल सेक्रेटरी आशीष ग्रोवर ने भी सरकार के इस निर्देश का स्वागत किया और इसके कई और फायदे गिनाए।
झगड़ों और नशेबाजों से बचाव: आशीष ग्रोवर ने बताया कि कई बार कम उम्र के बच्चे नशे के लिए दवाइयां मांगने आते हैं या कुछ लोग जबरन दवा मांगते हुए झगड़ा करते हैं। कैमरे लगे होने से यह साबित करना आसान होगा कि दुकानदार ने बिना पर्ची के कोई गलत दवा नहीं दी है।
पुरानी पर्ची (Old Prescription) की बड़ी समस्या: ग्रोवर ने एक बहुत बड़ी जमीनी समस्या बताई। उन्होंने कहा कि कई लोग डॉक्टर की 1500-2000 रुपये की भारी फीस बचाने के लिए 6 महीने पुरानी पर्ची लेकर आते हैं और एंटीबायोटिक जैसी दवाइयां मांगते हैं। जब केमिस्ट पुरानी पर्ची पर दवा देने से मना करते हैं, तो ग्राहकों से भारी बहस और झगड़ा होता है।
गरीबों के लिए नियम न टूटें: जब उनसे पूछा गया कि जो गरीब फीस नहीं दे सकते और सीधे पुड़िया मांगते हैं, उनका क्या होगा? इस पर ग्रोवर ने स्पष्ट कहा कि बिना डॉक्टर की सलाह के दवा देना मरीज के लिए ही खतरनाक हो सकता है। गरीब लोगों को भीड़ के बावजूद सरकारी अस्पतालों में ही जाना चाहिए। दवाइयों के दुरुपयोग को रोकने के लिए बनाए गए नियमों का पालन हर किसी को करना ही होगा।
'ज़मीनी हकीकत' की इस रिपोर्ट से साफ है कि ड्रग कंट्रोल विभाग का सीसीटीवी वाला कदम नशाखोरी रोकने के लिए बहुत जरूरी है, जिसका केमिस्ट एसोसिएशन ने भी समर्थन किया है। लेकिन, जब तक आम जनता को डॉक्टर की भारी फीस, सरकारी अस्पतालों की लंबी लाइनों और 'आभा ऐप' जैसी तकनीकी परेशानियों से निजात नहीं मिलेगी, तब तक लोग अपना समय और पैसा बचाने के लिए सीधे केमिस्ट के पास जाने को मजबूर रहेंगे। सरकार को नियम लागू करने के साथ-साथ सरकारी स्वास्थ्य तंत्र को आसान और सुलभ बनाने पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।

