छठ से पहले दिल्ली में यमुना को लेकर फिर गरमाई सियासत
छठ पूजा से पहले यमुना नदी में प्रदुषण को लेकर दिल्ली की राजनीति फिर से उफान पर है तो वहीँ जनता के बीच नाराज़गी है।
Zamini Haqiqat: राजधानी दिल्ली में छठ महापर्व जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा है, यमुना नदी की सफाई और उसके बढ़ते प्रदूषण को लेकर सियासी पारा एक बार फिर चढ़ गया है। वादों और दावों के बीच यमुना का पानी आज भी काला और ज़हरीला है। एक तरफ जहां सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी आम आदमी पार्टी (AAP) के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली की आम जनता और खासकर पूर्वांचली समाज में इस बदहाली को लेकर भारी गुस्सा है। 'द फेडरल' की टीम ने वजीराबाद बैराज से लेकर आईटीओ छठ घाट तक यमुना की ज़मीनी हकीकत का जायज़ा लिया।
यमुना की ज़मीनी हकीकत: नदी या सीवर?
'द फेडरल' की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, वजीराबाद बैराज तक यमुना का पानी फिर भी कुछ हद तक साफ नज़र आता है। पानी के बहाव को छठ पर्व के मद्देनज़र बढ़ा दिया गया है ताकि प्रदूषण कुछ कम दिखे। लेकिन वजीराबाद से महज़ कुछ मीटर आगे बढ़ते ही जैसे ही 'नजफगढ़ ड्रेन' (जिसे साहिबी नदी भी कहा जाता है) यमुना में मिलती है, नदी का पानी पूरी तरह से काला और ज़हरीला हो जाता है। आगे चलकर इसमें 22 अन्य नाले भी मिलते हैं, जो यमुना को पूरी तरह एक बड़े सीवर में तब्दील कर देते हैं।
आईटीओ छठ घाट पर साफ-सफाई और रंग-रोगन की तैयारियां जोरों पर हैं, लेकिन नदी के किनारे पूजा सामग्री और विसर्जन के अवशेषों का अंबार लगा हुआ है। पानी की स्थिति ऐसी है कि उसमें खड़ा होना भी बीमारियों को दावत देने जैसा है।
जनता की आवाज़: 'सरकारों ने सिर्फ धोखा दिया'
यमुना किनारे पहुंचे स्थानीय नागरिकों ने सरकारों के रवैये पर गहरी निराशा जताई है।
सुमित्रा गुप्ता (44 वर्षों से दिल्ली निवासी): उनका कहना है कि दशकों से हालात जस के तस हैं। पानी इतना काला है कि इसमें मुंह धोना तो दूर, छूने का भी मन नहीं करता। केजरीवाल सरकार हो या वर्तमान में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की सरकार, ज़मीनी स्तर पर कोई बदलाव नज़र नहीं आ रहा है।
सर्वेश गुप्ता: इन्होंने यमुना की दुर्दशा के लिए सरकारों के साथ-साथ आम जनता को भी ज़िम्मेदार ठहराया। उनका कहना है कि लोग घरों का कूड़ा और पूजा सामग्री नदी में फेंकते हैं। फैक्ट्रियों का दूषित पानी और खुले सीवर आज भी सीधे यमुना में गिर रहे हैं।
पूर्वांचली समाज में भारी आक्रोश
छठ पर्व मुख्य रूप से पूर्वांचलियों का सबसे बड़ा आस्था का पर्व है, जिसमें व्रती को जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देना होता है। ज़हरीले पानी को लेकर पूर्वांचली समाज में सरकार के खिलाफ सख्त नाराज़गी है।
वीरेंद्र सिंह सूर्यवंशी (पूर्वांचली प्रतिनिधि): उन्होंने इसे पूर्वांचलियों की आस्था के साथ सीधा छलावा करार दिया। उनका कहना है कि 27 साल बाद दिल्ली में भाजपा की सरकार आई और सीएम रेखा गुप्ता को सत्ता में आए लगभग डेढ़ साल हो चुका है, लेकिन हालात नहीं बदले। उन्होंने आरोप लगाया कि यमुना सफाई के नाम पर हज़ारों करोड़ रुपये के फंड का सिर्फ 'बंदरबांट' हुआ है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यही हालात रहे, तो जनता चुनाव में इसका कड़ा जवाब देगी।
उपेंद्र तिवारी (एक्स-कमांडो): उन्होंने आक्रोश जताते हुए कहा कि यमुना का पानी इतना ज़हरीला हो चुका है कि इसमें जाने वाले को त्वचा संबंधी गंभीर बीमारियां (खुजली आदि) हो सकती हैं। उन्होंने राजनेताओं पर जनता को धोखा देने और अपनी जेबें भरने का सीधा आरोप लगाया।
पुरोहित की चिंता: 'कहीं साहिबी नदी न बन जाए यमुना'
वजीराबाद स्थित यमुनेश्वर महादेव मंदिर के पंडित संजय गिरी ने चिंता जताते हुए कहा कि केवल एक-दो घंटे के लिए नदी किनारे आकर फोटो खिंचवाने से यमुना साफ नहीं होगी। इसके लिए जनता की भागीदारी और सीवर ट्रीटमेंट प्लांट्स का होना बहुत ज़रूरी है। उन्होंने डर जताया कि अगर यही हाल रहा तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यमुना पूरी तरह से एक नाले (साहिबी नदी की तरह) में तब्दील हो जाएगी। हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि जागरूकता के कारण अब लगभग 10% लोगों ने नदी में सामग्री डालना कम किया है।
राजनीतिक बयानबाज़ी बनाम ज़मीनी सच
दिल्ली में वर्तमान भाजपा सरकार (मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता) को सत्ता संभाले करीब डेढ़ साल हो चुका है। मुख्यमंत्री खुद यमुना किनारे सफाई करती नज़र आई हैं। वहीं, विपक्ष में बैठी आम आदमी पार्टी (AAP) लगातार भाजपा पर हमलावर है और इसे महज़ एक चुनावी हथकंडा बता रही है। केमिकल के छिड़काव और टेंडर प्रक्रियाओं को लेकर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
दशकों से सरकारें बदलती रहीं, नेता बदलते रहे, यमुना को साफ करने के हज़ारों करोड़ के बजट पास होते रहे, लेकिन यमुना का पानी आज भी काला है। राजनीति के इस शोरगुल में यमुना की दुर्दशा और छठ व्रतियों की आस्था हर साल इसी तरह मैली होती नज़र आ रही है। जनता अब केवल वादे नहीं, बल्कि ज़मीन पर साफ यमुना देखना चाहती है।

