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"हम वोटर हैं, आतंकी नहीं!": दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ बवाल

वोट कटने (SIR) के विरोध में जंतर-मंतर पर उतरे युवाओं को दिल्ली पुलिस ने लिया हिरासत में। 12 मेट्रो स्टेशन बंद। जानिए ग्राउंड जीरो से 'द फ़ेडरल देश' की रिपोर्ट।


Zamini Hakikat: गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर के दिन देश की राजधानी दिल्ली में एक अभूतपूर्व सियासी और सामाजिक संग्राम देखने को मिला। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की विवादित 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) प्रक्रिया और वोटर लिस्ट से लाखों नाम काटे जाने के विरोध में विपक्ष, आम आदमी पार्टी, यूथ कांग्रेस और जनसंगठनों ने जंतर-मंतर पर 'सत्याग्रह' का आह्वान किया था। लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शन के इस प्रयास को दिल्ली पुलिस ने पूरी सख्ती के साथ कुचल दिया। नई दिल्ली इलाके को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया, 12 प्रमुख मेट्रो स्टेशनों पर ताले जड़ दिए गए और विरोध करने पहुंचे सैकड़ों युवाओं, महिलाओं और छात्रों को घसीटकर बसों में भरते हुए हिरासत में ले लिया गया।


'द फ़ेडरल देश' की इस विस्तृत ग्राउंड रिपोर्ट में जानिए कि कैसे 2 अक्टूबर के दिन नई दिल्ली की सड़कों पर जनता और पुलिस के बीच लुकाछिपी का खेल चला और प्रदर्शनकारियों का दर्द क्या था:

1. किले में तब्दील नई दिल्ली: 12 मेट्रो स्टेशन बंद, चप्पे-चप्पे पर बैरिकेडिंग
प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर तक पहुँचने से रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने ऐसी नाकेबंदी की, जिसने आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। नई दिल्ली के डीसीपी सचिन शर्मा ने आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट कर दिया कि पूरे इलाके में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 163 लागू कर दी गई है।

मेट्रो ऑपरेशन्स ठप: पुलिस के निर्देश पर दिल्ली मेट्रो के 12 सबसे व्यस्त स्टेशनों—पटेल चौक, केंद्रीय सचिवालय, मंडी हाउस, बाराखंभा, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन, जनपथ और झंडेवालान के गेट सुबह से ही बंद कर दिए गए।

आम जनता बेहाल: पार्लियामेंट स्ट्रीट, टॉलस्टॉय मार्ग, पटेल चौक और जनपथ गोलचक्कर पर भारी बैरिकेडिंग के चलते भयंकर ट्रैफिक जाम लग गया। छुट्टी का दिन होने के बावजूद ली मेरिडियन और शांगरी-ला होटल के आसपास वाहन रेंगते नजर आए। गुरुद्वारा बंगला साहिब और हनुमान मंदिर जाने वाले श्रद्धालुओं को भी पुलिस की पूछताछ और भारी पैदल यात्रा का सामना करना पड़ा।

2. टॉलस्टॉय मार्ग बना 'मिनी जंतर-मंतर'
जब पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने जंतर-मंतर के सभी रास्ते सील कर दिए, तो देश के अलग-अलग हिस्सों (बिहार, गाजियाबाद, यूपी) और दिल्ली के विभिन्न इलाकों से पहुंचे प्रदर्शनकारियों ने टॉलस्टॉय मार्ग को ही अपना 'मिनी जंतर-मंतर' बना लिया। मेट्रो बंद होने के कारण कोई बस से शिवाजी स्टेडियम तक पहुंचा तो कोई मीलों पैदल चलकर आया। छात्र, युवा और महिलाएं सड़क के बीचों-बीच धरने पर बैठ गए और सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करने लगे।

3. "हम आतंकवादी नहीं हैं!" – सड़क पर छलका वोटरों का आक्रोश
सड़क पर बैठे प्रदर्शनकारियों का दर्द सिर्फ एक राजनीतिक विरोध नहीं था, बल्कि अपनी नागरिकता और पहचान छिनने का डर था।

"शराब बिक रही है, लेकिन धारा 144 यहाँ लगी है": एक आक्रोशित युवा ने कहा, "ज्ञानेश कुमार अपने एसी कमरे में बैठकर हमारे वोट काट चुके हैं। हम यहाँ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने आए हैं, लेकिन हमारे साथ ऐसा सुलूक किया जा रहा है जैसे हम आतंकवादी या देशद्रोही हों। दिल्ली में जगह-जगह शराब बिक रही है, छोटी बच्चियों के रेप हो रहे हैं, वहां धारा 144 नहीं लगाई जाती, लेकिन हमारे लोकतांत्रिक अधिकार मांगने पर रोक है।"

शबाना मलिक का दर्द: एक एनजीओ चलाने वाली शबाना मलिक ने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा, "मैं 2002 से, 2005 और 2006 में लगातार परमानेंट वोट डाल रही हूँ, फिर भी मेरा नाम काट दिया गया। कारण बताया गया कि मेरे नाम में गलती है, जिसे मैंने ठीक भी करा लिया। मेरे बच्चों के पिता नहीं हैं। अगर मेरा नाम वोटर लिस्ट से कट गया, तो मेरे बच्चों के पहचान पत्र कैसे बनेंगे? सरकार जानबूझकर लोगों को मृत घोषित कर रही है।"

34 वर्षीय वोटर की हताशा
: गाजियाबाद से आए एक 34 वर्षीय व्यक्ति ने बताया कि दो साल से उसका नाम वोटर लिस्ट से कटा हुआ है। उसने कई बार फॉर्म भरे, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। उसने सवाल किया, "मैं अब वोट किसे दूँ? मैं इस देश का नागरिक हूँ या नहीं?"

4. तख्तियों पर तीखे नारे: "कुल्फी जैसा पिघला खेल..."
प्रदर्शनकारियों के हाथों में जो तख्तियां (Placards) और पोस्टर थे, वे चुनाव आयोग के प्रति जनता के गिरते भरोसे को साफ बयां कर रहे थे। ज़मीन पर बिखरे प्लेकार्ड्स पर लिखा था:

"नाम काटा लिस्ट से, अब जा तू सीट से"

"कुल्फी जैसा पिघला खेल, ज्ञानेश कुमार को भेजो जेल"

"ECI छोड़ने को बोला था"

छात्रों और युवाओं ने एक सुर में नारा लगाया: "मोदी हाय-हाय", "ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो" और पुलिस की सख्ती पर "दिल्ली पुलिस शर्म करो"। एक डीयू (दिल्ली यूनिवर्सिटी) के छात्र ने कहा, "हमारा गणतंत्र जिसे हमने अंग्रेजों से लड़कर जीता था, आज दांव पर है। ज्ञानेश कुमार सिर्फ एक कठपुतली हैं।"

5. बलपूर्वक हिरासत: महिलाओं और छात्रों को टांग कर ले गई पुलिस
शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों को पुलिस ने एक पल भी चैन से बैठने नहीं दिया। 'द फ़ेडरल देश' के कैमरों में कैद दृश्यों के अनुसार, महिला पुलिसकर्मियों ने महिला प्रदर्शनकारियों को जबरन उठाकर और घसीटकर बसों में भरा। जो छात्र नारे लगा रहे थे, उन्हें भी टांग कर डिटेंशन बसों में डाल दिया गया। पुलिस की यह लुकाछिपी दिन भर चलती रही। जैसे ही 10-20 लोग इकट्ठा होकर नारे लगाते, भारी पुलिस बल उन्हें घेरकर बसों में भरता और नई दिल्ली इलाके से कोसों दूर ले जाकर छोड़ देता।

2 अक्टूबर को गांधी जी की जयंती पर हुए इस 'सत्याग्रह' ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि वोटर लिस्ट (SIR) का विवाद अब सिर्फ राजनीतिक दलों का मुद्दा नहीं रह गया है; यह आम जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई बन चुका है। चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त और 'गोल्ड स्टैंडर्ड' मानी जाने वाली संस्था पर उठ रहे ये गंभीर सवाल और सड़कों पर घसीटे जाते वोटर, भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश कर रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने भले ही धारा 163 का इस्तेमाल कर जंतर-मंतर को खाली करा लिया हो, लेकिन जनता के मन में उठ रहे सवालों को दबाना अब चुनाव आयोग और सरकार दोनों के लिए भारी चुनौती साबित होने वाला है।


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