नीले गमछे से लोहिया ट्रस्ट तक: यूपी की राजनीति में प्रतीक और विरासत का नया खेल!
समाजवादी पार्टी के भीतर एक बड़ा संगठनात्मक और प्रतीकात्मक बदलाव देखने को मिला है। शिवपाल सिंह यादव के प्रस्ताव पर अखिलेश यादव को सर्वसम्मति से लोहिया ट्रस्ट का नया अध्यक्ष चुन लिया गया है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव केवल रैलियों, भाषणों और घोषणापत्रों से नहीं जीते जाते। यहाँ एक राजनीति ऐसी भी है जो चुनाव आयोग के कागज़ों में दर्ज नहीं होती, लेकिन मतदाता के मानस पर गहरा असर छोड़ती है। यह राजनीति है 'रंगों और प्रतीकों' की। हाल के दिनों में जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में नीला गमछा पहने दिखाई दिए, तो राजनीतिक गलियारों में उनके बयानों से ज़्यादा चर्चा उस गमछे के रंग की होने लगी। यही नीला रंग दशकों से बहुजन समाज पार्टी और दलित अस्मिता का प्रतीक रहा है। इसके तुरंत बाद सपा ने अपनी छात्र इकाई का रंग भी बदलकर नीला कर दिया। इस घटनाक्रम ने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यूपी में विचारधारा अब धीरे-धीरे रंगों के संकेतों में सिमटती जा रही है?
आज़ादी से लेकर अब तक: खादी से भगवा और नीले का सफर
भारतीय राजनीति में स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक सफेद खादी का दबदबा रहा, जो महात्मा गांधी की सादगी और कांग्रेस के सामाजिक जनाधार को दर्शाता था। लेकिन जैसे-जैसे देश की राजनीति बदली, क्षेत्रीय दलों का उभार हुआ और रंगों की अलग-अलग गाथाएँ सामने आईं।
नीले रंग का राजनीतिक इतिहास डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा 1942 में बनाई गई शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन से जुड़ता है। बाद में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया और 1984 में कांशीराम द्वारा गठित बहुजन समाज पार्टी ने नीले रंग को दलित सम्मान और प्रतिरोध की पहचान बना दिया। हाथी के चुनाव चिह्न के साथ यह रंग बीएसपी का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया। यही वजह है कि जब समाजवादी पार्टी नीले रंग का सहारा लेती है, तो बहस सिर्फ एक कपड़े की नहीं रहती, बल्कि उस दलित विरासत की होती है जिस पर बीएसपी दशकों से अपना दावा करती आ रही है।
दूसरी तरफ, समाजवादी राजनीति की अपनी अलग पहचान रही है। डॉ. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के दौर में लाल रंग को संघर्ष और क्रांति का प्रतीक माना गया। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की लाल टोपी के साथ यह रंग समाजवादी पार्टी का ट्रेडमार्क बन गया। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के लिए भगवा रंग सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का ध्वजवाहक बना। 1990 की राम रथ यात्रा के बाद भगवा रंग चुनावी अभियानों से निकलकर पार्टी के स्थायी जनाधार का हिस्सा बन गया, जिसे बीजेपी ने गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों तक पहुँचाया।
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत तिवारी के अनुसार: "राजनीतिक दल जब अपने पारंपरिक रंगों से बाहर निकलकर किसी दूसरे रंग को अपनाते हैं, तो यह सीधे तौर पर नए सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश होती है। हालांकि, केवल प्रतीक बदलने से वोटों का स्थानांतरण संभव नहीं होता।"
रंगों का प्रभाव और मायावती का तीखा पलटवार
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और विविध राज्य में हर मतदाता विस्तृत नीति पत्र नहीं पढ़ता। ऐसे में टोपी, झंडा या गमछा एक त्वरित दृश्य पहचान (Visual Identity) प्रस्तुत करता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि केवल रंग चुनाव नहीं जिताते। आज बीएसपी का नीला रंग वही है, लेकिन उसका राजनीतिक प्रभाव काफी घटा है। सपा की लाल टोपी भी वही है, फिर भी उसे 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) जैसे नए राजनीतिक गठबंधनों का सहारा लेना पड़ रहा है।
अखिलेश यादव के नीले गमछे पर बीएसपी अध्यक्ष मायावती ने कड़ा ऐतराज जताते हुए सपा पर "गिरगिट की तरह रंग बदलने" का आरोप लगाया। मायावती का यह तंज अपने कैडर को यह संदेश देने की कोशिश था कि नीले रंग की असली वारिस केवल बीएसपी है।
अंततः, यूपी की राजनीति एक विशाल कैनवास है जहाँ लाल, भगवा, हरा और नीला रंग अपनी-अपनी जगह बनाए हुए हैं। लेकिन लोकतंत्र का सच यही है कि मतदाता रंग देखकर आकर्षित तो हो सकता है, परंतु वोट डालते समय वह अपने जमीनी अनुभवों और राजनीतिक भरोसे को ही प्राथमिकता देता है।
अखिलेश यादव बने लोहिया ट्रस्ट के अध्यक्ष, शिवपाल यादव ने खुद रखा प्रस्ताव
राजनीति में हर मुकाबला चुनाव मैदान में बैलेट बॉक्स के जरिए नहीं लड़ा जाता। कुछ लड़ाइयाँ ऐसी भी होती हैं जो दफ़्तरों, कमरों और तिजोरियों के ताले खोलकर जीती जाती हैं। समाजवादी पार्टी के इतिहास में हाल ही में एक ऐसा ही पन्ना पलटा, जब अखिलेश यादव को सर्वसम्मति से लोहिया ट्रस्ट का अध्यक्ष चुन लिया गया। पहली नज़र में यह एक सामान्य संगठनात्मक फेरबदल लग सकता है, लेकिन सपा की अंदरूनी राजनीति को समझने वालों के लिए यह एक बहुत बड़ा रणनीतिक बदलाव है। इस फैसले के साथ ही सैकड़ों करोड़ रुपये की संपत्तियों, पार्टी कार्यालयों और सबसे बढ़कर मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक विरासत की चाबी अखिलेश यादव के हाथों में आ गई है।
1990 से 2016: लोहिया ट्रस्ट का गठन और अंदरूनी दरार
लोहिया ट्रस्ट केवल एक इमारत या संस्था नहीं है, बल्कि यह समाजवादी आंदोलन का वैचारिक केंद्र रहा है। इसकी नींव 1990 में मुलायम सिंह यादव द्वारा रखी गई थी। उस दौर में बोफोर्स विवाद के बाद जनता दल सत्ता में आया था, लेकिन केंद्र और राज्य की राजनीति में अस्थिरता बनी हुई थी। मुलायम सिंह यादव समझ चुके थे कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी विचार को लंबे समय तक टिकाये रखने के लिए एक स्थायी वैचारिक और संगठनात्मक ठिकाने की ज़रूरत है।
1992 में जब समाजवादी पार्टी का गठन हुआ, तब लोहिया ट्रस्ट ही उसका अनौपचारिक मुख्यालय बना। यहीं से नीतियाँ बनती थीं, घोषणापत्र तैयार होते थे और कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया जाता था।
लेकिन 2016 में समाजवादी परिवार के भीतर शुरू हुए भीषण आंतरिक संघर्ष ने इस संस्था को भी प्रभावित किया। एक तरफ मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव थे, तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव। जब शिवपाल यादव ने लोहिया ट्रस्ट और संगठन पर पकड़ मजबूत करनी शुरू की, तो अखिलेश यादव ने अपनी राजनीतिक गतिविधियों के संचालन के लिए 'जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट' का गठन कर लिया। इसके बाद सपा के भीतर दो समानांतर शक्ति केंद्र खड़े हो गए—मुलायम का लोहिया ट्रस्ट और अखिलेश का जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट।
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद गोस्वामी के अनुसार:
"लोहिया ट्रस्ट समाजवादी पार्टी की जननी रहा है। 2016 के बाद यह ट्रस्ट मुख्यधारा की सक्रिय राजनीति से थोड़ा अलग-थलग पड़ गया था। अब इसका नेतृत्व अखिलेश को मिलना यह साबित करता है कि पार्टी के भीतर अब कोई दूसरा शक्ति केंद्र नहीं बचा है।"
शिवपाल का प्रस्ताव और 2027 का सियासी संदेश
मुलायम सिंह यादव के निधन और शिवपाल यादव की सपा में वापसी के बाद भी लोहिया ट्रस्ट की कमान को लेकर अस्पष्टता बनी हुई थी। लेकिन इस बार जब बैठक हुई, तो खुद शिवपाल सिंह यादव ने अखिलेश यादव का नाम अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित किया, जिस पर सभी सदस्यों ने अपनी मुहर लगा दी।
सपा प्रवक्ता आज़म ख़ान का कहना है: "लोहिया जी के विचारों और मुलायम सिंह जी की विरासत को एक दिशा में ले जाने के लिए यह फैसला बेहद ज़रूरी था। पार्टी अब पूरी तरह एकजुट होकर चुनावी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार है।"
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए अखिलेश यादव 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे के साथ डॉ. लोहिया के सामाजिक न्याय के सिद्धांत को पुनः केंद्र में ला रहे हैं। ऐसे में लोहिया ट्रस्ट की कमान संभालना यह साफ संदेश देता है कि अब सपा का संगठन, परिवार, संपत्ति और विचारधारा—सब एक ही नेतृत्व के तहत काम करेंगे।
2016 की पुरानी तस्वीरों में जहाँ पारिवारिक तनाव साफ दिखता था, वहीं आज की तस्वीरें एकता का दावा करती हैं। अब देखना यह होगा कि लोहिया ट्रस्ट का यह नए सिरे से हुआ हस्तांतरण केवल चुनावी व्यवस्था है या समाजवादी राजनीति के एक नए और स्थायी अध्याय की शुरुआत।

