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'क्या लोकतंत्र अपने ही नागरिकों से डर रहा है?': जंतर-मंतर पर पुलिस-प्रदर्शनकारियों के आमने-सामने होने का सच

राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर 2 अक्टूबर को पुलिस और सुरक्षा बलों की छावनी में तब्दील हो गया। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव आयोग की साख पर उठे सवालों को लेकर आम आदमी पार्टी, यूथ कांग्रेस, आइसा (AISA) और एसएफआई (SFI) समेत कई राजनीतिक व छात्र संगठनों ने जोरदार प्रदर्शन किया।


क्या देश में चुनाव कराना अब सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया बनकर रह गया है या फिर लोकतंत्र में जनता का भरोसा भी दांव पर लग चुका है? यह सवाल आज किसी बंद कमरे में नहीं, बल्कि देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर गूंज रहा है। चुनाव कराने वाली देश की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था—भारतीय चुनाव आयोग (ECI)—आज उस चौराहे पर खड़ी है, जहां उस पर निष्पक्षता और विश्वसनीयता का सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर उठी चिंगारी अब एक राजनीतिक आंदोलन का रूप ले चुकी है और राजधानी दिल्ली की सड़कों पर उतर आई है।

जंतर-मंतर बना अभेद्य किला, छावनी में तब्दील लुटियंस दिल्ली

2 अक्टूबर को दिल्ली का दिल कहे जाने वाले जंतर-मंतर का नजारा किसी युद्ध क्षेत्र जैसा नजर आ रहा था। सुरक्षा बलों ने पूरे इलाके को पूरी तरह छावनी में तब्दील कर दिया। बैरिकेड्स की कई परतें, पुलिस जवानों की भारी तैनाती, रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) का फ्लैग मार्च और आसमान में मंडराते ड्रोन कैमरे—यह सब इस बात का गवाह थे कि सरकार और प्रशासन किसी भी कीमत पर प्रदर्शनकारियों को चुनाव आयोग के दफ्तर तक नहीं पहुंचने देना चाहते।

सुरक्षा के नाम पर जंतर-मंतर के आसपास इंटरनेट सेवाएं ठप कर दी गईं। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए एहतियात के तौर पर जनपथ, पटेल चौक, केंद्रीय सचिवालय, राजीव चौक, मंडी हाउस, लोक कल्याण मार्ग और सेवा तीर्थ समेत आसपास के 12 प्रमुख मेट्रो स्टेशनों के एंट्री और एग्जिट गेटों को अगले आदेश तक बंद कर दिया गया।

विपक्ष और छात्रों का हल्लाबोल, सौरभ भारद्वाज समेत सैकड़ों हिरासत में

यह विरोध प्रदर्शन अब केवल किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रहा है। आम आदमी पार्टी (AAP), यूथ कांग्रेस, वामपंथी छात्र संगठन जैसे आइसा (AISA) और एसएफआई (SFI) के कार्यकर्ता और आम नागरिक एकजुट होकर जंतर-मंतर की ओर बढ़े।

दिल्ली आम आदमी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज समेत कई वरिष्ठ नेताओं को पुलिस ने बैरिकेड्स पार करने की कोशिश के दौरान हिरासत में ले लिया। इसके अलावा, आइसा और एसएफआई के करीब 100 से अधिक छात्र कार्यकर्ताओं को पुलिस ने बस में भरकर अज्ञात स्थानों पर भेज दिया। पुलिस द्वारा संसद मार्ग को तो खाली करा लिया गया, लेकिन प्रदर्शनकारियों का हौसला पस्त नहीं हुआ। वे कनॉट प्लेस और जनपथ के आसपास जमा हो गए और "ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो" के गगनभेदी नारों से पूरी दिल्ली गूंज उठी।

हिरासत से बड़ा सवाल: आखिर किस बात का डर?

आज की सबसे बड़ी तस्वीर सिर्फ नेताओं या छात्रों की गिरफ्तारी नहीं है। सबसे बड़ा सवाल उस लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उठ रहा है जो अपने ही नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध से घबराती हुई दिखाई दे रही है। जब किसी लोकतंत्र में जनता और विपक्ष चुनाव आयोग जैसी संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठाने लगें, तो यह मामला केवल एक अधिकारी के कार्यकाल का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी चुनावी व्यवस्था के अस्तित्व और साख का बन जाता है।

एक तरफ जहां केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस इस पूरे घटनाक्रम को केवल कानून-व्यवस्था (Law and Order) की स्थिति मानकर नियंत्रण में करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल इसे देशवासियों के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बता रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग अब एक स्वतंत्र संस्था के रूप में कार्य करने के बजाय पक्षपातपूर्ण फैसले ले रहा है, जिससे निष्पक्ष चुनाव की धारणा को भारी ठेस पहुंची है।

सड़कों पर उतरी लड़ाई, आगे क्या?

संसद मार्ग से लेकर कनॉट प्लेस की सड़कों पर पुलिस की लाठियों और बैरिकेड्स के बीच जो टकराव देखने को मिला, उसने यह साफ कर दिया है कि यह विवाद आसानी से थमने वाला नहीं है। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर जनता और राजनीतिक दलों के बीच जो अविश्वास की खाई पैदा हुई है, उसे पाटना अब आसान नहीं होगा। जब लोकतंत्र में चुनाव कराने वाली संस्था खुद विवादों और बहस के केंद्र में आ जाए, तो जनता का भरोसा बहाल करना ही सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। अब देखना यह होगा कि सड़कों पर उतरा यह आक्रोश आने वाले दिनों में क्या नया राजनीतिक मोड़ लेता है।

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