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मायावती का मास्टरस्ट्रोक, डिजिटल दंगल और अंडे का गणित

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में उत्तराधिकार के मुद्दे पर मायावती के फैसले का जिक्र है, जिसमें आनंद कुमार के बेटों को राजनीतिक पदों से दूर रख कर किसी समर्पित दलित कार्यकर्ता या निष्ठावान चेहरे को आगे लाने का संदेश दिया गया है।


उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) लंबे समय से एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहाँ सवाल सिर्फ चुनाव जीतने का नहीं, बल्कि पार्टी के अस्तित्व और भविष्य का भी है। हाल ही में आकाश आनंद को पार्टी की मुख्य जिम्मेदारियों से अलग करने के बाद राजनीतिक गलियारों में कयास लगाए जा रहे थे कि आनंद कुमार के दूसरे बेटे ईशान को आगे लाया जा सकता है। लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ने इन सभी संभावनाओं पर विराम लगा दिया। मायावती ने साफ कर दिया कि आनंद कुमार के किसी भी बेटे को बसपा में कोई राजनीतिक पद नहीं मिलेगा—न विधायक, न सांसद और न ही मंत्री।

अगर भतीजे नहीं, तो फिर कौन? मायावती ने अपनी भतीजी दीपिका आनंद का जिक्र जरूर किया है, जो फिलहाल कानून (Law) की पढ़ाई कर रही हैं। लेकिन यहाँ भी शर्त यह है कि सिर्फ रिश्तेदारी काफी नहीं होगी, बल्कि काम और निष्ठा के आधार पर ही कोई फैसला होगा। मायावती के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि यदि दीपिका तैयार नहीं होती हैं, तो पार्टी की कमान परिवार से बाहर किसी dedicated और समर्पित दलित कार्यकर्ता को सौंपी जा सकती है।

कांशीराम के दौर के कैडर आधारित आंदोलन को पुनर्जीवित करने की यह कोशिश भारतीय राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ एक बड़ा संदेश मानी जा रही है। इसके साथ ही मायावती संगठन में 'Gen-Z' और युवाओं को 50% तक भागीदारी देने की तैयारी में हैं। 2012 के बाद से सत्ता से बाहर चल रही बसपा अपने चार बार के सुशासन मॉडल और कानून-व्यवस्था के ट्रैक रिकॉर्ड को याद दिलाकर 2027 के विधानसभा चुनाव की जमीन तैयार कर रही है। अब सवाल यह है कि क्या बसपा का अगला नेतृत्व परिवार के बाहर से निकलकर आएगा?

यूपी में शुरू हुआ 'डिजिटल दंगल'

एक तरफ जहाँ मायावती पार्टी के कैडर को नए सिरे से गढ़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश की पूरी राजनीति अब चौपालों और मैदानों से निकलकर मोबाइल स्क्रीन पर शिफ्ट हो चुकी है। पहले नेता भाषण देते थे, रैलियाँ करते थे, टीवी पर आते थे। लेकिन अब नेता सीधे आपकी जेब में रखे स्मार्टफोन के जरिए आपके दिमाग में जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।

इसका गणित बेहद सरल है। उत्तर प्रदेश में करीब 13 करोड़ 39 लाख मतदाता हैं, जिनमें से लगभग 12 करोड़ 28 लाख लोगों के पास स्मार्टफोन मौजूद है। आम भारतीय दिन में 4 से 5 घंटे सोशल मीडिया स्क्रॉल करने में बिताता है। यही वजह है कि भाजपा, समाजवादी पार्टी और बसपा के बीच सोशल मीडिया के मैदान में तीखी जंग छिड़ चुकी है।



यहाँ Follower संख्या से ज्यादा एल्गोरिद्म और मनोविज्ञान काम करता है। भाजपा ने यह मान लिया है कि जनता लंबा भाषण नहीं सुनती, इसलिए 30-सेकंड के तीखे और वायरल कट्स बनाकर डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स के जरिए प्रचार कराया जा रहा है। समाजवादी पार्टी त्वरित वीडियो, अखिलेश यादव के हल्के-फुल्के व्यंग्य और ग्राउंड रिपोर्टिंग के सहारे तीखा पलटवार करती है। वहीं, मायावती का अंदाज अलग है; वे रोज दर्जनों पोस्ट नहीं करतीं, लेकिन उनका एक सिंगल ट्वीट पूरे राजनीतिक हलके में चर्चा का विषय बन जाता है।

लेकिन इस डिजिटल राजनीति के बीच सबसे बड़ा सवाल लोकतंत्र का है। क्या टूटी हुई सड़क, अस्पताल की लाइन, महंगाई और बेरोजगारी जैसी जमीनी समस्याओं का समाधान 30-सेकंड की रील के व्यूज से निकलेगा? रील आपको कुछ सेकंड के लिए प्रभावित कर सकती है, लेकिन मोहल्ले का गड्ढा रोज दिखाई देता है। 2027 का चुनाव सिर्फ पार्टियों का नहीं, बल्कि सोशल मीडिया एल्गोरिद्म बनाम जमीनी हकीकत का भी मुकाबला होगा।

नाश्ते की थाली से गायब होता अंडा!

राजनीतिक बहस और स्क्रीन पर दिखते विज्ञापनों से इतर आम नागरिक की असली परीक्षा उसकी रसोई में होती है। सुबह का नाश्ता अब सिर्फ नाश्ता नहीं रहा, बल्कि वह देश की जमीनी अर्थव्यवस्था का आईना बन चुका है। हाल के दिनों में अगर आपने बाजार में अंडे खरीदे हैं, तो 75-80 रुपये प्रति दर्जन मिलने वाला अंडा अब 100 रुपये के पार पहुँच चुका है।



जब आम ग्राहक दुकानदार से पूछता है तो जवाब मिलता है—"ऊपर से महंगा आ रहा है।" लेकिन यह 'ऊपर' सिर्फ थोक व्यापारी नहीं है। अंडे की कीमत मुर्गी नहीं, बल्कि मुर्गी का खाना यानी मक्का और सोयाबीन तय करते हैं। इस साल लंबे मानसून और अत्यधिक गर्मी के कारण मुर्गियों पर 'हीट स्ट्रेस' बढ़ा और अंडों का उत्पादन घटा। वहीं पोल्ट्री चारे की लागत कुछ महीनों में 24-26 रुपये से बढ़कर 30-32 रुपये प्रति किलो हो गई।

इतना ही नहीं, इस महंगाई का सीधा कनेक्शन पेट्रोल नीति से भी है। सरकार पेट्रोल में एथेनॉल का मिश्रण बढ़ा रही है, जिसके लिए मक्के की भारी मांग डिस्टिलरियों में बढ़ी है। यानी एक ही मक्के की फसल के दो बड़े खरीदार खड़े हैं—पोल्ट्री उद्योग और एथेनॉल कंपनियां। मांग ज्यादा और सप्लाई सीमित होने से दाम बढ़ना स्वाभाविक है।

अर्थशास्त्री इसे 'प्रोटीन इंफ्लेशन' (Protein Inflation) कहते हैं। अगर मोबाइल या कार महंगी हो, तो खरीद टाली जा सकती है, लेकिन यदि अंडा, दूध, चिकन या दालें महंगी हो जाएं, तो आम इंसान को अपना पोषण कम करना पड़ता है। सरकार का विकास सिर्फ देश की जीडीपी या शेयर बाजार के आंकड़ों से नहीं नापा जा सकता। देश की आर्थिक सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सामान्य नागरिक की थाली समृद्ध हुई है या छोटी।

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