मेरठ के चर्चित सौरभ हत्याकांड में बड़ा फैसला, पत्नी मुस्कान और प्रेमी साहिल को फांसी की सजा!
उत्तर प्रदेश के मेरठ के चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में जिला अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मृतक की पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को फांसी की सजा सुनाई है।
उत्तर प्रदेश के मेरठ के बहुचर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में आज जिला अदालत ने बेहद कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला दोनों को फांसी (मृत्युदंड) की सजा सुनाई है। अदालत ने इस जघन्य हत्याकांड को एक ऐसा अपराध माना, जिसमें क्रूरता और हैवानियत की सारी हदें पार कर दी गई थीं। फैसला सुनाए जाने के वक्त दोनों आरोपियों को सुरक्षा कारणों से जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जोड़ा गया था, जहां अपना अंजाम सामने देखकर दोनों आरोपी फूट-फूटकर रो पड़े।
खुशियों के बीच पक रही थी खौफनाक साजिश
यह पूरी कहानी एक हंसते-खेलते परिवार के अचानक तबाह होने की दर्दनाक दास्तान है। 24 फरवरी 2025 को सौरभ राजपूत लंदन से अपने घर मेरठ लौटते हैं। परिवार में खुशी का माहौल था। 25 फरवरी को बेटी पीहू का जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया और फिर 28 फरवरी को पत्नी मुस्कान का जन्मदिन मनाया गया। लेकिन इन खुशियों के पीछे मुस्कान अपने प्रेमी साहिल शुक्ला के साथ मिलकर पति सौरभ के कत्ल का खौफनाक प्लान तैयार कर रही थी।
3 मार्च की काली रात: खाने में दवा, सीने में चाकू और ड्रम में लाश
3 मार्च 2025 की रात मुस्कान ने साजिश के तहत खाने में नींद की दवा मिलाकर सौरभ को सुला दिया। जब सौरभ बेहोश हो गए, तो उसने अपने प्रेमी साहिल को घर बुला लिया। दोनों ने मिलकर बेदर्दी से सौरभ के सीने में चाकू घोंपकर उनकी हत्या कर दी। हत्या के बाद साक्ष्य मिटाने के लिए आरोपियों ने शव के 5 टुकड़े किए, उन्हें एक नीले ड्रम में डाला और ऊपर से सीमेंट भरकर ड्रम को पूरी तरह सील कर दिया।
शिमला में फरारी और ड्रम से बरामद हुआ शव
वारदात को अंजाम देकर अगले ही दिन दोनों आरोपी हिमाचल प्रदेश के शिमला भाग गए। परिजनों के लगातार बढ़ते दबाव और सवालों के बीच 17 मार्च को मुस्कान मेरठ वापस लौटी। कड़ाई से पूछताछ करने पर पूरा मामला खुला और 18 मार्च को जब पुलिस घर पहुंची, तो सीमेंट से भरे नीले ड्रम को तोड़ा गया, जिसमें से सौरभ का शव बरामद हुआ। पुलिस ने तुरंत मुस्कान और साहिल को गिरफ्तार कर लिया।
16 महीने चला ट्रायल, 34 गवाह और न्याय की जीत
पुलिस ने 12 मई 2025 को करीब 1000 पन्नों की मजबूत चार्जशीट दाखिल की। मामले में 34 गवाहों और फॉरेंसिक सबूतों के आधार पर जुलाई 2025 से शुरू हुआ ट्रायल करीब 16 महीने तक चला। आखिरकार 30 सितंबर 2026 को अदालत ने दोनों को दोषी करार दिया।
सजा पर बहस के दौरान सरकारी वकील ने इसे 'दुर्लभ से दुर्लभतम' (Rarest of Rare) केस बताते हुए फांसी की मांग की। वहीं सजा का ऐलान करने से ठीक पहले जज ने मुस्कान से पूछा कि वह क्या कहना चाहती है, तो उसने रोते हुए केवल इतना कहा— "मेरी बच्चियों का ख्याल रखा जाए।"
इसके बाद अदालत ने दोनों दोषियों को फांसी की सजा सुना दी। करीब डेढ़ साल तक चले इस चर्चित मुकदमे का कानूनी अध्याय अब जिला अदालत में समाप्त हो गया है। हालांकि, आगे इस फैसले की पुष्टि के लिए मामला उच्च न्यायालय (High Court) जाएगा।

