प्रशांत किशोर की पार्टी टूटी, आरजेडी से मृत्युंजय तिवारी का इस्तीफा
'राजपथ' में प्रदीप सहगल का खुलासा: प्रशांत किशोर की पार्टी के दिग्गज भाजपा में शामिल; आरजेडी प्रवक्ता मृत्युंजय का इस्तीफा; नरोत्तम मिश्रा की खुली चुनौती.
Rajpath: बिहार में आगामी विधानसभा उपचुनावों से ठीक पहले देश के सबसे बड़े चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को एक तगड़ा झटका लगा है. वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) में मचे आंतरिक घमासान के बीच पार्टी के सबसे बड़े ब्राह्मण चेहरे ने इस्तीफा दे दिया है. दूसरी तरफ, मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार के पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने अपनी ही सरकार के प्रशासन को खुली चुनौती देकर दिल्ली से लेकर भोपाल तक हड़कंप मचा दिया है.
डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फेडरल देश' के शो 'राजपथ' में एंकर प्रदीप सहगल ने इन तीनों बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों का एक मुकम्मल और गहन विश्लेषण पेश किया है.
1. बांकीपुर उपचुनाव से पहले प्रशांत किशोर का कुबा टूटा, दिग्गज बीजेपी में शामिल
दूसरों को चुनाव जिताने का ठेका लेने वाले देश के सबसे बड़े चुनावी चाणक्य प्रशांत किशोर (PK) खुद अपनी ही राजनीतिक पिच पर चारों खाने चित होते हुए नजर आ रहे हैं. स्वर्णिम बिहार का सपना दिखाने वाले पीके बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव से ठीक पहले अपनी जन सुराज पार्टी (Jan Suraaj) में मची भगदड़ को रोकने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं.
एंकर प्रदीप सहगल ने विशेष रिपोर्ट में बताया कि पहली ही चुनावी परीक्षा से ठीक पहले जन सुराज पार्टी के सबसे बड़े चेहरे प्रोफेसर के.सी. सिन्हा, फिल्म डायरेक्टर चेतना झा, बिट्टू सिंह और गोपाल सिंह जैसे दिग्गज नेता एक झटके में पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए हैं. क्या है पीके से हुई रणनीतिक चूक?
बांकीपुर सीट हमेशा से ही कायस्थों का एक मजबूत गढ़ मानी जाती रही है, जहां से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन लगातार पांच बार विधायक रहे हैं. इस सीट से प्रशांत किशोर ने खुद चुनाव लड़ने का फैसला किया है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, के.सी. सिन्हा (जो खुद कायस्थ हैं) इस सीट से अपनी दावेदारी मान रहे थे, लेकिन पीके की खुद चुनाव लड़ने की जिद ने उन्हें नाराज कर दिया. पटना की सड़कों पर लगे पोस्टरों ने पीके पर तंज कसते हुए लिखा है कि 'केसी सिन्हा तो सिर्फ झांकी है, जमानत जब्त होना अभी बाकी है, इनको वोट नहीं नोट चाहिए'.
2. आरजेडी में भीषण गदर: प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी का सभी पदों से इस्तीफा
लालू प्रसाद यादव के कुनबे को अब राजनीतिक फेविकॉल की जरूरत पड़ गई है. टीवी डिबेट्स में विरोधियों के छक्के छुड़ाने वाले और आरजेडी (RJD) के सबसे वफादार संकटमोचक प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है. मृत्युंजय तिवारी ने पार्टी नेतृत्व पर तीखा हमला बोलते हुए कहा:
"बुरे वक्त में जब पार्टी महज 25 सीटों पर सिमट गई थी, तब मैंने लालू जी का झंडा बुलंद रखा था. लेकिन अब मेरे जैसे समर्पित और निष्ठावान कार्यकर्ताओं के लिए आरजेडी में कोई सम्मान नहीं बचा है. मैं और अपमान नहीं सह सकता. मैंने बार-बार नेता विरोधी दल श्री तेजस्वी यादव जी से अपनी शिकायतें कीं, लेकिन उन्होंने कोई संज्ञान नहीं लिया. अपमानित होकर राजनीति नहीं की जा सकती."
निशाना संजय यादव पर, टूटेगा 'एमवाई' समीकरण?
'राजपथ' शो में यह विश्लेषण सामने आया कि मृत्युंजय तिवारी का सीधा निशाना तेजस्वी यादव के सबसे करीबी सलाहकार और राज्यसभा सांसद संजय यादव पर है. यह वही संजय यादव हैं जिनके अहंकार के चलते लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य को भी आरजेडी के सभी पदों से इस्तीफा देना पड़ा था. भागलपुर के रहने वाले मृत्युंजय तिवारी एक बड़ा ब्राह्मण चेहरा हैं. कयास लगाए जा रहे हैं कि उनका अगला पड़ाव भाजपा हो सकता है, जो तेजस्वी के एमवाई (MY) समीकरण के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका साबित होगा.
3. मध्य प्रदेश में नरोत्तम मिश्रा का अपनी ही सरकार पर 'जेल वार'
मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर होने वाले उपचुनाव ने भाजपा के भीतर चल रही अंदरूनी जंग को सार्वजनिक कर दिया है. सूबे के कद्दावर नेता और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने अपनी ही भाजपा सरकार के प्रशासन को खुली चुनौती दे डाली है. दतिया में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए नरोत्तम मिश्रा ने बेहद आक्रामक लहजे में कहा:
"अगर मेरे कार्यकर्ताओं पर एफआईआर हुई या वे जेल गए, तो मैं भी उनके साथ जेल जाऊंगा. दम है तो छू कर दिखाओ."
टिकट कटने का असली दर्द और आंतरिक तकरार
नरोत्तम मिश्रा 2023 का विधानसभा चुनाव हार गए थे. दतिया सीट पर उपचुनाव का एलान हुआ, तो मिश्रा को टिकट की पूरी उम्मीद थी. लेकिन पार्टी ने आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बना दिया. नरोत्तम मिश्रा ने सीधे तौर पर दबाव की राजनीति शुरू कर दी है. उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि 'आशुतोष तिवारी में इतनी ताकत नहीं कि वे मेरा टिकट कटवा सकें'. उनका यह इशारा सीधे तौर पर भाजपा के प्रदेश नेतृत्व और भोपाल-दिल्ली के बड़े नेताओं की तरफ है. अपनी ही सरकार के पुलिस प्रशासन को चुनौती देना भाजपा के स्थापित 'अनुशासन' पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है.

