x

राजपथ: साधु वेश में पप्पू यादव, पुलिस का पीआर खेल और MP हाईकोर्ट का नोटिस

द फ़ेडरल देश के शो 'राजपथ' में प्रदीप सहगल के साथ देखिए संसद में पप्पू यादव के साधु वेश प्रदर्शन, जंतर-मंतर पुलिस हिंसा और MP हाईकोर्ट में पुजारी नियुक्ति नीति को चुनौती देने वाली रिपोर्ट।


Rajpath: देश के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में एक साथ तीन बड़े विवाद गरमा गए हैं। एक तरफ संसद के भीतर राम मंदिर के चढ़ावे में कथित धांधली के खिलाफ साधु वेश में सांसद पप्पू यादव का प्रदर्शन बहस के केंद्र में आ गया है, तो दूसरी तरफ 20 जुलाई के जंतर-मंतर आंदोलन के बाद घायल पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों को मीडिया के सामने लाकर एक नया नैरेटिव गढ़ने का आरोप लग रहा है। वहीं, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी मंदिरों में पुजारियों की नियुक्ति पर जाति आधारित प्राथमिकता को लेकर राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है।


डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के चर्चित शो 'राजपथ' में एंकर प्रदीप सहगल ने इन तीनों बड़े घटनाक्रमों, उनके कानूनी पहलुओं और राजनीतिक निहितार्थों का तीखा और गहन विश्लेषण पेश किया है।

1. राम मंदिर चढ़ावा विवाद: साधु वेश में पप्पू यादव की 'चोर-चोर' की नारेबाजी और संत समाज की नाराजगी
अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे में कथित धांधली और 'चंदा चोरी' के आरोपों को लेकर पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव संसद के भीतर साधु की वेशभूषा धारण कर और हाथ में दान-पेटी लेकर पहुंच गए। संसद परिसर में उन्होंने 'चोर-चोर' के नारे लगाए, जिसके बाद पूरे मामले का रुख चढ़ावे में अनियमितता के मूल सवाल से हटकर 'प्रदर्शन के तरीके' पर टिक गया है।

संत समाज का विरोध: संत समाज के एक बड़े धड़े ने आपत्ति जताते हुए कहा कि भाजपा या सरकार से राजनीतिक विरोध हो सकता है, लेकिन भगवा वस्त्र और साधु वेशभूषा का राजनीतिक व्यंग्य के लिए इस्तेमाल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

विपक्ष का पलटवार और दोहरा पैमाना: एंकर प्रदीप सहगल ने शो में सवाल उठाया कि जब लखनऊ में बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन के रोड शो के दौरान राजनीतिक प्रदर्शन के लिए हनुमान की वेशभूषा का इस्तेमाल हुआ था, तब संत समाज और सत्ता पक्ष की यह नाराजगी कहाँ थी? क्या धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल की मर्यादा सत्ता और विपक्ष देखकर तय होगी?

मूल मुद्दा भटका: इस प्रतीकात्मक प्रदर्शन के कारण राम मंदिर ट्रस्ट और चढ़ावे में पारदर्शिता की मांग पीछे छूट गई और बहस पूरी तरह से धार्मिक प्रतीकों के अपमान पर केंद्रित हो गई।

2. जंतर-मंतर हिंसा पर छवि बदलने का खेल? कैमरों के सामने आए घायल पुलिसकर्मी और परिवार
20 जुलाई को जंतर-मंतर पर 'संसद चलो' मार्च के दौरान छात्रों पर हुए पुलिस बल प्रयोग, लाठीचार्ज और वॉटर कैनन के इस्तेमाल पर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस लगातार विपक्ष के निशाने पर थी। लेकिन अब इस पूरी कहानी का रुख बदलने की कोशिश की जा रही है।

सहानुभूति बनाम जवाबदेही: घटना के कुछ दिनों बाद मीडिया के कैमरों के सामने घायल पुलिसकर्मियों, उनकी पत्नियों और रोते हुए बच्चों को लाया गया। पुलिस का दावा है कि भीड़ में छात्रों के अलावा 2000 से ज्यादा असामाजिक तत्व शामिल थे।

खुफिया तंत्र की नाकामी पर सवाल: अगर जंतर-मंतर पर 2000 असामाजिक तत्व मौजूद थे, तो दिल्ली पुलिस का खुफिया तंत्र (Intelligence) क्या कर रहा था? समय रहते उन असामाजिक तत्वों को रोका क्यों नहीं गया?

पीड़ा का निष्पक्ष मूल्यांकन: क्या घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों को आगे लाना जनता की सहानुभूति हासिल करने और अपनी पुलिसिया नाकामी छिपाने की रणनीति (PR Strategy) है? सवाल यह भी है कि पुलिस लाठीचार्ज में घायल हुए छात्रों की पीड़ा को फाइलों में दबाया जाएगा या उन्हें भी बराबर की जगह मिलेगी?

3. 'क्या भगवान भी जाति पूछकर पूजा स्वीकार करेंगे?' MP हाईकोर्ट ने धार्मिक न्यास विभाग को भेजा नोटिस
मध्य प्रदेश के भोपाल से एम.सी. अहिरवार द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) ने देश में सामाजिक न्याय और धार्मिक व्यवस्था पर नई बहस छिड़ दी है। याचिका में मध्य प्रदेश सरकार के 'धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग' की 4 जनवरी 2019 की उस नीति को चुनौती दी गई है, जिसके तहत सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में पुजारियों की नियुक्ति की जाती है।

समानता के अधिकार का हनन: याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में केवल एक विशेष समुदाय (ब्राह्मणों) को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे वेद, उपनिषद, संस्कृत और पूजा पद्धति में पारंगत अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के योग्य उम्मीदवारों को अवसर नहीं मिल रहा।

अनुच्छेद 14 और 16 की कसौटी: एमपी हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मूल कानूनी सवाल यह है कि जब मंदिर का प्रशासन और फंड सरकार के अधीन है, तो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 16 (सरकारी नियुक्तियों में समान अवसर) के नियमों का पालन क्यों नहीं होना चाहिए?


Read More
Next Story