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UP पॉलिटिक्स: मूंछों पर ताव और BSP में वर्चस्व की आर-पार की जंग

यूपी में बेरोजगारी छोड़ मूंछों पर क्यों हो रही राजनीति? 'द फ़ेडरल देश' के शो 'राजपथ' में प्रदीप सहगल से समझिए अखिलेश का दांव और BSP के घमासान का सच।


Rajpath: उत्तर प्रदेश में जहां नौजवान रोजगार मांग रहा है, महंगाई चरम पर है और किसान अपनी फसलों के दाम पूछ रहा है, वहीं प्रदेश की राजनीति असली मुद्दों को छोड़कर 'मूंछों' के इर्द-गिर्द सिमट गई है। दूसरी तरफ, बहुजन समाज पार्टी (BSP) में मायावती और आकाश आनंद के बीच का विवाद सिर्फ पारिवारिक नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर वर्चस्व और प्रभाव की एक गहरी जंग है।


'द फ़ेडरल देश' के खास शो 'राजपथ' में एंकर प्रदीप सहगल ने यूपी की राजनीति के इन दोनों बड़े और दिलचस्प घटनाक्रमों का परत-दर-परत विश्लेषण किया है। आइए समझते हैं मूंछों के अहंकार और बसपा के भीतर मचे कोहराम की पूरी कहानी:

1. मैनपुरी से लखनऊ तक: हत्या का मुद्दा 'मूंछों' के ताव में कैसे बदल गया?
इस मूंछ वॉर की शुरुआत 30 अगस्त को मैनपुरी में एक ट्रक क्लीनर की हत्या के बाद हुए प्रदर्शन से हुई।

CO का वायरल मूंछ-ताव: तनावपूर्ण माहौल के बीच पुलिस क्षेत्राधिकारी (CO) अशोक कुमार सिंह वहां पहुंचते हैं। सपा कार्यकर्ताओं द्वारा वीडियो बनाए जाने पर वह अपनी मूंछों पर ताव देते हैं और कहते हैं कि "वीडियो बना लो... और अखिलेश यादव को भेज देना।"

अखिलेश यादव का 5 शब्दों का पलटवार: पुलिस के इस अहंकार का जवाब अखिलेश यादव ने सीधे नहीं, बल्कि प्रतीकों में दिया। उन्होंने एक बुजुर्ग की तस्वीर पोस्ट कर सिर्फ 5 शब्द लिखे "उसकी मूंछें बहुत छोटी थीं।"

मंच पर 'ताऊ' का सम्मान: अगले दिन लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अखिलेश यादव ने ललितपुर के 75 वर्षीय सपा कार्यकर्ता जगदीश यादव को मंच पर बुलाया, जो 55 सालों से मूंछें रख रहे हैं। अखिलेश ने उनसे मूंछों पर ताव दिलवाया और उनके रखरखाव के लिए अपनी जेब से पैसे भी दिए।

'राजपथ' का सवाल: एंकर प्रदीप सहगल ने तीखा सवाल उठाया कि क्या हत्या, पुलिस की जवाबदेही और न्याय जैसे गंभीर मुद्दों को दरकिनार कर 'मूंछों' को राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन का प्रतीक बना देना सही है?


2. BSP का अंदरूनी घमासान: सिर्फ परिवारवाद नहीं, पदों और भरोसे की जंग
बसपा में जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ ससुर-दामाद का विवाद नहीं है, बल्कि बंद कमरों में चल रही पावर-पॉलिटिक्स है।

खेमेबाजी का खेल: बसपा में इस समय एक तरफ इकलौते राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का खेमा है, तो दूसरी तरफ अशोक सिद्धार्थ और आकाश आनंद हैं। दिलचस्प बात यह है कि कभी रामजी गौतम को आगे बढ़ाने वाले अशोक सिद्धार्थ ही थे, लेकिन आज दोनों अलग-अलग ध्रुवों पर हैं।

सोशल मीडिया पर बगावत और सतीश चंद्र मिश्र: आकाश आनंद को पद से हटाए जाने के बाद अशोक सिद्धार्थ ने एक आलोचनात्मक पोस्ट साझा की थी। इसे नेतृत्व (मायावती) के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश माना गया। इसका नतीजा यह हुआ कि सिद्धार्थ पर कार्रवाई हुई और रामजी गौतम को 10 राज्यों वाले सेक्टर-1 की जिम्मेदारी दे दी गई।

आकाश आनंद की असली नाराजगी: बताया जाता है कि आकाश आनंद पार्टी के बड़े फंड को चुनावों में आक्रामक तरीके से इस्तेमाल करना चाहते थे। लेकिन जब मायावती ने सार्वजनिक मंच से उन्हें "आपके दामाद" कहकर संबोधित किया, तो इसे आकाश के करीबियों ने राजनीतिक नहीं, बल्कि 'व्यक्तिगत अपमान' माना।

ईशान आनंद की एंट्री: एंकर प्रदीप सहगल ने सवाल किया कि यदि समस्या सिर्फ परिवारवाद या अनुशासन की होती, तो आकाश के छोटे भाई ईशान आनंद का कद पार्टी में क्यों बढ़ाया जा रहा है?

निष्कर्ष:
'राजपथ' के इस विश्लेषण का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि बसपा की असली चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि पार्टी का वह मॉडल है जहां किसी 'दूसरे बड़े नेता' (Second-line leadership) के उभरने की जगह ही नहीं बची है। इतिहास गवाह है कि सिर्फ एक चेहरे पर टिके संगठन चुनाव तो लड़ सकते हैं, लेकिन अपना भविष्य नहीं बचा सकते।


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