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JPSC परीक्षा धांधली से आकाश आनंद के 'अंकल' दांव तक: 'राजपथ' का खुलासा

'द फ़ेडरल देश' के शो 'राजपथ' में एंकर प्रदीप सहगल की रिपोर्ट। देखिए JPSC धांधली, UGC NET पेपर लीक से पीड़ित शुभम खरवार और आकाश आनंद के नए राजनीतिक दांव का सच।


Rajpath: "बैरिकेड्स टूट चुके हैं, पुलिस की लाठियाँ बरस रही हैं और सड़क पर चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल!" झारखंड की राजधानी रांची में जेपीएससी और जेएसएससी (JPSC-JSSC) परीक्षा में धांधली के खिलाफ जब हज़ारों छात्र सड़कों पर उतरे... तो विधानसभा का गेट भी उनका रास्ता नहीं रोक पाया। पुलिस ने खदेड़ा, लाठियाँ चलाईं, सिर फूटे... जवाब में बोतलें और चप्पलें भी चलीं। लेकिन इस पूरे बवाल के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर देश का युवा सड़कों पर लाठियाँ खाने को मजबूर क्यों है? 'द फ़ेडरल देश' के विशेष शो 'राजपथ' में एंकर प्रदीप सहगल की इस रिपोर्ट में देश के युवाओं से जुड़े तीन बड़े ज्वलंत मुद्दों की पड़ताल की गई है—रांची का हिंसक छात्र आंदोलन, लखनऊ में पेपर लीक से टूटते सपने और उत्तर प्रदेश की राजनीति में आया नया भूचाल।


1. रांची में JPSC-JSSC परीक्षा धांधली: राहुल गांधी का अपनी ही सहयोगी सरकार पर हमला

माहौल तब और गर्मा गया, जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी खुलकर इन छात्रों के समर्थन में आ गए। ताज्जुब की बात यह रही कि राहुल गांधी ने किसी विपक्षी राज्य सरकार को नहीं, बल्कि झारखंड में अपनी ही सहयोगी पार्टी (JMM-कांग्रेस गठबंधन) की सरकार को नसीहत दे डाली!

राहुल गांधी ने साफ़ कहा कि छात्रों से तुरंत बातचीत की जाए और उनकी समस्याओं को हल किया जाए। अब सवाल उठता है कि जब अपने ही सहयोगी खुलकर कटघरे में खड़े करने लगें, तो क्या सरकारों के कानों पर जूं रेंगना मजबूरी बन जाता है?


2. महात्मा गांधी के रास्ते पर 'जेन ज़ी' (Gen Z) युवा: 98% माँगों के आगे झुका प्रशासन

ज़र गौर कीजिए... यह आज का 'जेन ज़ी' (Gen Z) युवा है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस दौर में भी युवाओं को आज महात्मा गांधी ही रास्ता दिखा रहे हैं। चाहे दिल्ली में CJP का आंदोलन हो या फिर रांची की सड़कों पर हुआ यह विरोध प्रदर्शन... युवाओं का पहला रास्ता शांतिपूर्ण सत्याग्रह का ही रहा है। युवाओं ने पहले शांति से अपनी बात रखी, बापू के अहिंसा के रास्ते पर चलकर अपनी आवाज़ बुलंद की।


इसे किसी राजनीतिक पार्टी के झंडे की ज़रूरत नहीं है। यह युवा सोशल मीडिया पर अपनी आवाज़ उठाना जानता है, डिजिटल स्पेस में माहौल बनाना जानता है और जब पानी सिर से ऊपर गुज़र जाए, तो सड़कों पर आकर सिस्टम की ईंट से ईंट बजाना भी जानता है!


इस आंदोलन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब घंटों के बवाल और तीखे विरोध के बाद प्रशासन को झुकना पड़ा। छात्रों ने अपनी माँगें रखीं और सरकार को उनकी लगभग 98% माँगों को स्वीकार करना पड़ा! चाहे वो परीक्षा में पारदर्शिता की बात हो, धांधली की जाँच हो या री-एग्जाम की बात।


झारखंड का यह संग्राम कोई अकेली घटना नहीं है। बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश और राजस्थान से लेकर दिल्ली तक... प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली, पेपर लीक और सालों-साल भर्ती अटकना एक राष्ट्रव्यापी नासूर बन चुका है। रांची की सड़कों पर दिखा यह गुस्सा इस बात का संकेत है कि अब देश का युवा चुप बैठने वाला नहीं है।


3. लखनऊ से ग्राउंड रियलिटी: मऊ के शुभम खरवार का छलका दर्द

जब गांव की पगडंडियों से निकलकर कोई लड़का शहर में कदम रखता है, तो वो अकेला नहीं आता। उसके साथ आते हैं उसके बाप के पसीने की कमाई, मां की दुआएं और पूरे परिवार का भविष्य। मऊ जिले का रहने वाला शुभम खरवार भी साल 2020 में लखनऊ आया था। लखनऊ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में पढ़ते हुए शुभम का सपना सिर्फ इतना था कि पढ़-लिखकर कुछ बन जाए और अपने किसान पिता के आर्थिक बोझ को कम कर सके। लेकिन आज इन सड़कों पर चलते हुए शुभम के कदमों में उम्मीद नहीं... सिर्फ बेबसी और निराशा है।

शुभम खरवार का बयान:

"मेरा नाम शुभम खरवार है, मैं मऊ का रहने वाला हूँ। 2020 में लखनऊ आया था... बी.ए., एम.ए. सब यहीं से किया। दो बार नेट का एग्जाम दिया। लेकिन पेपर लीक होने की वजह से मुझे बहुत आर्थिक बोझ झेलना पड़ा। मैं दो बाई दो के कमरे में रहता हूँ। मेरे पिताजी किसान हैं, वो किसी तरह खेती-किसानी के पैसों से मुझे थोड़ा-थोड़ा पैसा भेजते हैं जिससे मेरा यहाँ गुजर-बसर होता है।"

यूजीसी नेट 2024 का फॉर्म आया, तो परीक्षा लिखित होनी थी। 19 जून 2024 की तारीख उस मेहनत पर पानी फेरने आई जब खबर मिली कि पेपर लीक हो चुका है और यूजीसी नेट की परीक्षा रद्द कर दी गई है।

शुभम खरवार :

"एक परीक्षा के लिए 4-4 साल पढ़ना बड़ा मुश्किल काम है। अब पिताजी का भी फोन आता है तो बहुत डर लगता है, वो बहुत परेशान हो जाते हैं। उम्र निकलती जा रही है, घर का बहुत प्रेशर है। अब समझ ही नहीं आता कि गाँव वापस लौट जाएँ या यहीं रुककर फिर से किसी अनिश्चितता का इंतज़ार करें।"

यह पेपर लीक अब इतना बड़ा आर्थिक और मानसिक बोझ बन गया है कि छात्र पूरी तरह टूट चुके हैं। एक पेपर का बिक जाना सिर्फ किसी परीक्षा का रद्द होना नहीं है... यह किसी गरीब के चूल्हे का बुझ जाना है, किसी पिता की कमर टूट जाना है और एक युवा की जवानी को अनिश्चितता के अंधेरे में धकेल देना है।


4. यूपी की सियासत: आकाश आनंद का 'अंकल-चाची' दांव और मोदी-शाह पर खामोशी

"आकाश भैया... अखिलेश अंकल... राहुल को भी नाप दिया... लेकिन बुआ के डर से भाजपा के बड़े नेताओं को भूल गए!"

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सालों से सपा और कांग्रेस वाले रट लगाते थे कि 'बसपा तो बीजेपी की B-टीम है'। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव पास आ रहे हैं, बसपा के नए उत्तराधिकारी आकाश आनंद ने ऐसा दांव खेला कि सब भौचक्के रह गए।


राहुल-अखिलेश पर सीधा प्रहार: आकाश आनंद ने भरी जनसभा में कांग्रेस के राहुल गांधी और सपा के अखिलेश यादव को सीधे 'अंकल' और डिंपल यादव को 'चाची' कहकर बुला दिया! वे जनता को यह दिखाना चाहते थे कि बसपा किसी की 'B-टीम' नहीं है, बल्कि युवाओं की नई आवाज़ है।


मोदी-शाह के नाम पर लगी ब्रेक: आकाश आनंद ने मंच से योगी आदित्यनाथ और नितिन गडकरी का नाम तो लिया, लेकिन जैसे ही बात देश के शीर्ष नेताओं—यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की आई, उनकी जुबान पर जैसे ब्रेक लग गया!


राजनीतिक गलियारों में सवाल: क्या वाकई 'बुआ' (मायावती) का इतना डर था कि आकाश भैया मोदी-शाह का नाम लेने से बचते रहे? विपक्ष का कहना है कि चाहे आकाश कितना भी 'अंकल-अंकल' चिल्ला लें, लेकिन दिल्ली के बड़े साहबों की बात आते ही बसपा नेताओं के पसीने छूट जाते हैं।


आकाश आनंद ने अखिलेश को 'अंकल' और डिंपल को 'चाची' बनाकर हेडलाइंस तो बटोर लीं, लेकिन क्या सिर्फ नाम बदलने और रिश्ते गिनाने से चुनाव जीता जाता है?


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