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यूपी में चुनावी 'रेवड़ी' पर घमासान, रामपुर जेल में शिवपाल-आजम मुलाकात

'द फ़ेडरल देश' के शो 'राजपथ' में एंकर प्रदीप सहगल की रिपोर्ट। देखिए यूपी की नई 'कैश स्कीम', आजम खान से शिवपाल की मुलाकात और उत्तराखंड की खिलाड़ी शाइरा का सच।


Rajpath: देश और राज्यों की राजनीति में चुनाव पास आते ही लोकलुभावन योजनाओं और सियासी शह-मात का खेल तेज़ हो गया है। उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड तक राजनीतिक दल जनता के बीच अपने नए नैरेटिव सेट करने में जुटे हैं। 'द फ़ेडरल देश' के विशेष शो 'राजपथ' में एंकर प्रदीप सहगल की इस विस्तृत रिपोर्ट में तीन प्रमुख और संवेदनशील मुद्दों का गहन विश्लेषण किया गया है—उत्तर प्रदेश में चुनाव से ठीक पहले महिलाओं के लिए प्रस्तावित कैश ट्रांसफर योजना, रामपुर जेल में बंद आजम खान से मुलाकात के बाद सपा का नया मुस्लिम कार्ड और उत्तराखंड में एक होनहार ताइक्वांडो खिलाड़ी के सपनों पर सरकारी सिस्टम की उपेक्षा।


1. उत्तर प्रदेश में 'कैश स्कीम' की सुगबुगाहट: राहत या टैक्सपेयर के पैसे से चुनावी रेवड़ी?
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राज्य सरकार द्वारा महिलाओं के लिए एक नई योजना लाने की चर्चाएं तेज़ हैं। बताया जा रहा है कि इस योजना के तहत प्रत्येक पात्र महिला को कुल 50,000 रुपये दिए जाएंगे, जिसमें चुनाव से ठीक पहले 20,000 रुपये सीधे बैंक खातों में ट्रांसफर किए जाएंगे और शेष 30,000 रुपये चुनाव जीतने के बाद 10-10 हजार रुपये की तीन किस्तों में दिए जाएंगे।

टैक्सपेयर्स का पैसा और इकोनॉमी पर असर
इस तरह की नकदी आबंटन योजनाओं पर आर्थिक और राजनीतिक विश्लेषकों ने गंभीर सवाल उठाए हैं:

विकास बजट पर कटौती: विशेषज्ञों का तर्क है कि जब सरकारें वोट पाने के लिए अरबों-खरबों रुपये नकद बांटती हैं, तो इसका सीधा असर बुनियादी ढांचे (Infrastructure), अस्पतालों में दवाओं के बजट, सड़कों के निर्माण और स्कूल-कॉलेजों के विकास पर पड़ता है।

कर्ज और महंगाई का बोझ: चुनाव जीतने के लिए लिए गए सरकारी कर्ज की भरपाई अंततः आम नागरिक पर नए टैक्स और महंगाई लादकर ही की जाती है।

देश भर में बढ़ता ट्रेंड: बिहार में महिला नकद सहायता, मध्य प्रदेश की 'लाडली बहना' और महाराष्ट्र की 'लड़की बहिन' योजना के बाद अब वही मॉडल यूपी में दोहराने की तैयारी है।

विपक्ष का रुख:

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मो. आज़म और कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत का आरोप है कि 5 साल के कार्यकाल में ठोस रोजगार और विकास दिखाने में विफल रहने के बाद सरकारें टैक्सपेयर्स के पैसे को चुनावी 'शॉर्टकट' की तरह इस्तेमाल कर रही हैं।

2. रामपुर जेल में शिवपाल-आजम की मुलाकात: 2027 के लिए सपा का 'मुस्लिम कार्ड'
2027 के यूपी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए समाजवादी पार्टी (SP) ने अभी से अपनी राजनीतिक बिसात बिछाना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में सपा के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल यादव रामपुर जिला जेल पहुंचे, जहां उन्होंने पार्टी के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री आजम खान से करीब एक घंटे तक बंद कमरे में बातचीत की।

जेल के बाहर शिवपाल का कड़ा बयान
मुलाकात के बाद बाहर निकले शिवपाल यादव ने तीखा हमला बोलते हुए कहा:

"आजम खान के साथ बहुत जुल्म हुआ है। उन्हें सही से दवाई और कपड़े तक नहीं मिल रहे हैं। 2027 में हमारी सरकार बनते ही, जिन लोगों ने उन पर जुल्म किया है, उनसे चुन-चुनकर हिसाब लिया जाएगा।"

सपा का मुस्लिम वोट बैंक और राजनीतिक गणित
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी लगभग 19 से 20 प्रतिशत है और राज्य की करीब 80 से 90 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाता हार-जीत तय करते हैं।

2022 का प्रदर्शन: CSDS के आंकड़ों के मुताबिक, 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा को लगभग 75% से 80% मुस्लिम वोट मिले थे, जिसके दम पर सपा ने 111 सीटें जीती थीं और अपना वोट प्रतिशत बढ़ाकर 32% के पार पहुंचाया था।

2024 का परिणाम: 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले और एकतरफा मुस्लिम समर्थन के सहारे सपा ने 2024 लोकसभा चुनाव में 37 सीटें जीतीं।

सेंधमारी का डर: कांग्रेस, बीएसपी और AIMIM द्वारा मुस्लिम वोटों में सेंध लगाने की कोशिशों के बीच आजम खान के प्रति सहानुभूति जताकर सपा अपने कोर वोट बैंक को एकजुट रखने की कोशिश में है।

3. उत्तराखंड: ताइक्वांडो खिलाड़ी शाइरा का दर्द और खेल व्यवस्था पर सवाल
उत्तराखंड के देहरादून से एक होनहार ताइक्वांडो खिलाड़ी और 12वीं की छात्रा शाइरा का मामला सामने आया है, जिसने राज्य के खेल ढांचे और प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। 'युवा विद्यार्थी मंथन' कार्यक्रम के दौरान शाइरा ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के समक्ष अपनी समस्याएं रखी थीं।

वायरल वीडियो और यू-टर्न का सच
कार्यक्रम के बाद सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुआ, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में जाने के लिए पैसों की तंगी और प्रशासनिक उपेक्षा की बात सामने आई। बाद में शाइरा का एक और वीडियो जारी हुआ, जिसमें उसने स्पष्ट किया:

रोमानिया में होने वाले इंटरनेशनल टूर्नामेंट का कुल खर्च लगभग 3.70 लाख रुपये था।

एक निजी संस्था ने 1.70 लाख रुपये की मदद की थी, जबकि बाकी के करीब 2 लाख रुपये परिवार को स्वयं जुटाने थे।

किसी अधिकारी ने रिश्वत नहीं मांगी थी, बल्कि आर्थिक तंगी के कारण वह प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकी।

प्रशासनिक उपेक्षा पर उठे सवाल
इस पूरी घटना ने राज्य सरकार के दावों की पोल खोल दी है। सवाल यह उठ रहा है कि जो सरकार अपने प्रचार-प्रसार और विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये खर्च करती है, क्या उसके पास देश का नाम रोशन करने वाली एक अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी के लिए महज 2 लाख रुपये का प्रोत्साहन बजट नहीं था?


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