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'राजपथ': चीनी ₹70 पार, BJP नेता बोले- 'महंगाई से डायबिटीज़ बचेगी'

'राजपथ' में प्रदीप सहगल का विश्लेषण: चीनी के बढ़ते दाम पर इथेनॉल नीति का असर, कैलाश विजयवर्गीय का बयान और UP TET में 62 हजार कार्यरत शिक्षकों के फेल होने का सच।


Rajpath: त्यौहारों के सीजन की दस्तक के साथ ही देश की आम जनता की रसोई पर महंगाई का बड़ा प्रहार हुआ है। जिस चीनी के बिना हर त्यौहार की मिठास अधूरी है, वही चीनी आज आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही है। एक तरफ जहां चीनी, सब्जियों, सरसों के तेल और राशन के बढ़ते दामों ने त्यौहारों का उत्साह फीका कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ सत्तापक्ष के वरिष्ठ नेताओं के असंवेदनशील बयानों ने जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है।

इसी के साथ, उत्तर प्रदेश से आई एक खबर ने देश की शिक्षा व्यवस्था की जर्जर हालत को उजागर कर दिया है, जहां प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में बच्चों का भविष्य गढ़ रहे 62 हजार से अधिक कार्यरत शिक्षक न्यूनतम पात्रता परीक्षा (UP TET 2026) में फेल हो गए हैं।

डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के विशेष शो 'राजपथ' में एंकर प्रदीप सहगल ने इन तीनों प्रमुख राष्ट्रीय मुद्दों पर विस्तृत इनसाइट एनालिसिस पेश किया।

1. चीनी ₹70 के पार, मिठाइयाँ 30% महंगी: 'इथेनॉल पॉलिसी' और जमाखोरी बनी असली वजह

त्यौहारों के सीजन से ठीक पहले बाजार में अचानक चीनी के दामों में आग लग गई है। कुछ ही दिनों पहले 45 से 48 रुपये प्रति किलो मिलने वाली चीनी आज 70 रुपये किलो के आंकड़े को पार कर चुकी है। इसके चलते बाजार में मिठाइयाँ 30 प्रतिशत तक महंगी हो गई हैं।

'राजपथ' के विश्लेषण के अनुसार, चीनी के दामों में इस अप्रत्याशित उछाल के पीछे तीन मुख्य कारण हैं:

1. इथेनॉल डायवर्जन (Ethanol Blending Policy):

सरकार पेट्रोल में मिलावट करने के लिए गन्ने के रस से भारी मात्रा में इथेनॉल बनवा रही है। जब गन्ने का बड़ा हिस्सा इथेनॉल बनाने में डायवर्ट हो जाता है, तो चीनी उत्पादन के लिए गन्ने की उपलब्धता कम हो जाती है। बाजार में सप्लाई घटते ही चीनी के दाम तेजी से भागने लगते हैं।

2. बेमौसम बारिश और कम पैदावार:

इस बार गन्ने की फसल को बेमौसम बारिश और कीट-बीमारियों ने भारी नुकसान पहुंचाया, जिससे कुल उत्पादन में बड़ी गिरावट दर्ज की गई।

3. त्यौहारों की मांग और मुनाफाखोरी:

त्यौहारों के कारण अचानक मांग बढ़ी, जिसका फायदा उठाते हुए बड़े जमाखोरों और मुनाफाखोरों ने गोदामों में चीनी का स्टॉक दबा दिया, जिससे बाजार में कृत्रिम किल्लत पैदा हो गई।

आम आदमी की रसोई पर चौतरफा मार: 'हिडन टैक्स' और 'श्रिंकफ्लेशन'

चीनी ही नहीं, आम आदमी की रसोई का पूरा बजट बिगड़ चुका है।

दो-तीन महीने पहले 30 रुपये किलो मिलने वाला प्याज 60 रुपये के पार पहुंच चुका है।

बारिश की मार के कारण बाजार में हरी सब्जियां औसतन 70 से 80 रुपये प्रति किलो बिक रही हैं।

सरसों का तेल 200 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गया है, जबकि आटा, दाल, चावल और चायपत्ती के दामों में भी भारी बढ़ोतरी हुई है।

श्रिंकफ्लेशन (Shrinkflation): एफएमसीजी (FMCG) कंपनियां जनता पर 'हिडन टैक्स' थोप रही हैं। पैकेट के दाम तो बढ़ाए ही जा रहे हैं, साथ ही नूडल्स, साबुन, टूथपेस्ट और पैक्ड आटे के पैकेट का वजन भी चुपके से कम कर दिया गया है। यानी आम उपभोक्ता पूरा पैसा देने के बाद भी आधा सामान पाने को मजबूर है।

सरकार के पास तुरंत राहत देने के 3 उपाय:

इथेनॉल की कैपिंग (Quota Policy): त्यौहारों के दौरान गन्ने के रस को इथेनॉल में डायवर्ट करने की सीमा तय की जाए ताकि चीनी का उत्पादन प्रभावित न हो।

स्टॉक लिमिट और जमाखोरी पर नकेल: बड़े व्यापारियों और मिलों पर सख्त स्टॉक लिमिट लागू की जाए ताकि ब्लैक मार्केटिंग रुके।

PDS से सस्ती आपूर्ति: राशन की दुकानों के जरिए आम जनता को सब्सिडी दरों पर चीनी और जरूरी खाद्य सामग्री उपलब्ध कराई जाए।

2. महंगाई पर बीजेपी नेता का अजब ज्ञान: "चीनी महंगी है तो अच्छा है, डायबिटीज़ से बचेंगे"

महंगाई पर लगाम लगाने के बजाय सत्तापक्ष के वरिष्ठ नेताओं के बयानों ने जन-आक्रोश को और भड़का दिया है। मध्य प्रदेश से भाजपा के वरिष्ठ नेता और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने महंगाई पर अजीबोगरीब तर्क देते हुए कहा कि चीनी महंगी होना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, लोग कम खाएंगे तो डायबिटीज़ जैसी बीमारियों से बचेंगे।

'राजपथ' में इस असंवेदनशील बयान पर तीखे सवाल खड़े किए गए:

जिम्मेदारी से भागने का तर्क: जब सत्ता अपनी नाकामी छिपाने लगती है, तब ऐसे ही हास्यास्पद तर्क दिए जाते हैं। क्या कल को दाल 300 रुपये किलो होने पर कहा जाएगा कि यूरिक एसिड नहीं बढ़ेगा? क्या दूध महंगा होने पर यह ज्ञान दिया जाएगा कि कम कैलोरी सेहत के लिए अच्छी है? या फिर पेट्रोल 200 रुपये होने पर गाड़ी छोड़कर पैदल चलने की सलाह दी जाएगी?

जनता के संघर्ष का अपमान: 40 साल से ऊपर के लोगों को 'गुड़ खाने' की सलाह देना आम आदमी की बेबसी का मजाक उड़ाना है। जो मजदूर दिनभर पसीना बहाकर शाम को एक कप मीठी चाय पीना चाहता है, या जो गृहिणी हर महीने राशन की लिस्ट काट रही है, यह बयान उनके आत्मसम्मान पर चोट है।

सरकार का काम डाएट चार्ट बनाना नहीं: लोकतंत्र में सरकार का काम जनता को यह सिखाना नहीं है कि उन्हें क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि बुनियादी जरूरत की चीजें हर नागरिक की पहुंच में रहें।

3. UP TET 2026 में 62 हजार कार्यरत शिक्षक फेल; री-एग्जाम की तैयारी पर उठे सवाल

उत्तर प्रदेश टीईटी (UP TET 2026) के हाल ही में जारी नतीजों ने प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा और प्रशासनिक सुशासन की पोल खोल दी है। प्रदेश के 60 जिलों के 955 केंद्रों पर आयोजित इस परीक्षा में वर्षों से बच्चों को पढ़ा रहे 2,68,799 कार्यरत शिक्षक शामिल हुए थे।

परीक्षा के आंकड़े:

प्राथमिक स्तर: 1.22 लाख शिक्षकों में से 93 हजार पास हुए (लगभग 76%)।

उच्च प्राथमिक स्तर: 1.46 लाख शिक्षकों में से 1.13 लाख पास हुए (लगभग 77%)।

कुल परिणाम: 2,06,771 शिक्षक पास हुए, जबकि 62,028 कार्यरत शिक्षक न्यूनतम योग्यता परीक्षा में फेल हो गए।

वोट बैंक की राजनीति या शिक्षा का स्तर?

नियमों में ढील और विशेष परीक्षा: जो शिक्षक वर्षों से बच्चों का भविष्य बना रहे थे, वे खुद बेसिक परीक्षा पास नहीं कर पाए। इसके बावजूद, उन्हें पद से हटाने या सख्त कदम उठाने के बजाय सरकार उनके लिए अलग से 'विशेष परीक्षा' (Re-exam) कराने की तैयारी कर रही है।

छात्र बनाम शिक्षक के नियम: एक आम छात्र अगर परीक्षा में फेल हो जाए, तो उसकी पूरी साल खराब हो जाती है। लेकिन जब कार्यरत शिक्षक फेल होते हैं, तो पूरी व्यवस्था उनके लिए नरम पड़ जाती है।

बेरोजगार योग्य युवाओं के साथ अन्याय: प्रदेश में बीएड, डीएलएड, टीईटी और सीटीईटी पास लाखों योग्य युवा सड़कों पर बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं और नई भर्ती का इंतजार कर रहे हैं। उनसे मेरिट और योग्यता मांगी जाती है, जबकि फेल होने वाले शिक्षकों को बार-बार मौका दिया जा रहा है।

चुनावी गणित और करदाताओं का पैसा: आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के मद्देनजर 62 हजार शिक्षकों और उनके परिवारों को नाराज न करने के लिए यह फैसला लिया जा रहा है। विशेष परीक्षा आयोजित कराने पर फिर से सरकारी खजाने का करोड़ों रुपया खर्च होगा, जिसका बोझ अंततः करदाता (Taxpayer) जनता ही उठाएगी।

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चों के भविष्य को दांव पर लगाकर क्या चुनाव जीतने की यह राजनीति सही है? यह सवाल आज देश के हर नागरिक के सामने खड़ा है।

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