योगी के 'औरंगजेब' कार्ड पर बवाल, बांकीपुर में PK vs BJP की भीषण भिड़ंत!
यूपी में युवाओं के प्रदर्शन के बीच सीएम योगी के 'बाबर-औरंगजेब' वाले बयान पर संग्राम। जानिए यूपी के 122 दलबदलू विधायकों का पूरा गणित और बिहार के बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर (PK) और बीजेपी समर्थकों के बीच हुई हिंसक झड़प का सच।
Rajpath: उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार की राजनीति में इस वक्त हलचल तेज़ है। एक तरफ जहाँ 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले बयानों के तीर चलने लगे हैं, वहीं दूसरी तरफ दलबदल की सुगबुगाहट और उपचुनावों में हिंसक झड़पें लोकतंत्र की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रही हैं। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के शो 'राजपथ' में एंकर प्रदीप सहगल ने इन तमाम मुद्दों की गहराई में जाकर राजनीतिक दलों की रणनीति, आंकड़ों और ज़मीनी हकीकत का बड़ा विश्लेषण पेश किया है।
1. युवाओं के जनाक्रोश के बीच 'औरंगजेब' की एंट्री: राजपथ में उठा बड़ा सवाल
'राजपथ' के इस एपिसोड की शुरुआत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के वाराणसी में दिए गए उस चर्चित बयान से हुई, जिसमें उन्होंने समाज को बांटने वाली ताकतों पर सीधा हमला बोला था। सीएम योगी ने खुले मंच से कहा था कि "याद रखना, बांटने वाले लोग वही हैं जिनके आदर्श बाबर और औरंगजेब हैं। ये समाज को खाई में बांटकर फिर कटवाने का काम करते हैं।"
एंकर प्रदीप सहगल ने इस बयान की टाइमिंग और राजनीतिक नीयत पर तीखे सवाल खड़े किए। शो में विश्लेषण करते हुए बताया गया कि जब-जब उत्तर प्रदेश में रोजगार, पर्चा लीक, PCS परीक्षा में नॉर्मलाइजेशन विवाद और 69,000 शिक्षक भर्ती जैसे गंभीर मुद्दों पर राज्य का युवा सड़कों पर उतरता है, तब-तब सरकार प्रशासनिक और नीतिगत जवाब देने के बजाय बैकफुट पर नज़र आती है।
'राजपथ' में दिखाए गए दृश्यों के मुताबिक, एक तरफ जहाँ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठियां चलाई जाती हैं और मंचों से चेतावनी दी जाती है कि "बैनर नीचे कर दो, वरना जीवन भर बेरोजगार रह जाओगे", वहीं दूसरी तरफ चुनाव नज़दीक आते ही धार्मिक ध्रुवीकरण के पुराने सियासी हथियार बाबर और औरंगजेब को बहस के केंद्र में ला खड़ा किया जाता है। शो का सीधा सवाल था कि क्या 2026-27 के दौर में भी उत्तर प्रदेश का युवा विकास और नौकरी के बजाय 500 साल पुराने इतिहास के नाम पर वोट देगा?
2. यूपी विधानसभा में 'अवसरवाद' का गणित: 399 में से 122 विधायक दलबदलू
'राजपथ' के दूसरे हिस्से में एंकर प्रदीप सहगल ने उत्तर प्रदेश की राजनीति का वो सबसे कड़वा और चौंकाने वाला आंकड़ा पेश किया, जिसे अक्सर राजनीतिक दल 'विनेबिलिटी' यानी 'जीतने की क्षमता' का नाम देकर ढकने की कोशिश करते हैं।
2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही एक बार फिर उत्तर प्रदेश में दलबदल का खेल शुरू हो चुका है। 'राजपथ' की विशेष पड़ताल में सामने आया कि:
30 फीसदी से ज़्यादा विधायक बाहरी: उत्तर प्रदेश की 399 सदस्यीय विधानसभा में इस समय 122 विधायक (लगभग 30.5%) ऐसे हैं, जो किसी न किसी समय अपनी मूल पार्टी छोड़कर दूसरे दल में शामिल हुए और चुनाव जीते।
बीजेपी में दलबदलुओं का दबदबा: सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के 260 विधायकों में से 78 विधायक (30%) दूसरे राजनीतिक दलों से आए हुए हैं।
समाजवादी पार्टी की स्थिति: विपक्षी समाजवादी पार्टी के 102 विधायकों में से 29 विधायक (28%) दलबदलू पृष्ठभूमि के हैं।
छोटे दलों का हाल: निषाद पार्टी के 80% (5 में से 4), सुभासपा के 50% (6 में से 3), अपना दल (एस) के 31% और आरएलडी के 33% विधायक मूल रूप से बाहरी दलों के हैं।
सांसदों और कद्दावर नेताओं का पाला बदल:
सिर्फ विधानसभा ही नहीं, बल्कि लोकसभा में भी यह आंकड़ा बेहद दिलचस्प है। सपा के 37 सांसदों में से 19 सांसद (51%) और बीजेपी के 33 में से 15 सांसद (45%) दूसरी पार्टियों से आकर चुनाव जीते हैं।
शो में दारा सिंह चौहान (5 बार दलबदल), राम प्रसाद चौधरी (5 बार दलबदल), जगदंबिका पाल (4 बार) और रमाकांत यादव (4 बार) जैसे बड़े चेहरों का हवाला देकर प्रदीप सहगल ने स्पष्ट किया कि कैसे विचारधारा की बड़ी-बड़ी बातें करने वाली पार्टियाँ चुनाव जीतते ही जनता के भरोसे का सौदा कर देती हैं।
3. बांकीपुर उपचुनाव में संग्राम: पुलिस के सामने मारपीट और प्रशांत किशोर का सीधा हमला
बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के दौरान बूथों पर हुई हिंसक घटनाओं को लेकर 'राजपथ' में ज़मीनी हकीकत बयां की गई। पोलिंग बूथों के बाहर बीजेपी और प्रशांत किशोर की पार्टी 'जन सुराज' के समर्थकों के बीच तीखी झड़प हुई, जिसमें जमकर लात-घूंसे चले और पुलिस मूकदर्शक बनी रही।
हालात बिगड़ने पर 'जन सुराज' के सूत्रधार प्रशांत किशोर को खुद मौके पर उतरना पड़ा। प्रशांत किशोर ने ऑन-कैमरा आरोप लगाया कि— "पुलिस प्रशासन सत्ताधारी दल के इशारे पर जन सुराज के पोलिंग एजेंट्स को डरा रहा है, हेल्प डेस्क हटा रहा है और वोटरों को परेशान कर रहा है क्योंकि बीजेपी यह चुनाव बुरी तरह हार रही है।"
'राजपथ' में एंकर प्रदीप सहगल ने सवाल उठाया कि एक तरफ जब छात्र अधिकार माँगते हैं तो AK-47 तक का भय दिखाया जाता है, लेकिन दूसरी तरफ जब चुनाव में बाहुबल का प्रदर्शन होता है और 1.17 लाख रुपये कैश बरामदगी जैसे मामले सामने आते हैं, तब प्रशासनिक तंत्र मौन साध लेता है। क्या यह व्यवस्था आम वोटर को डराने का काम कर रही है?
द फ़ेडरल देश के शो 'राजपथ' में एंकर प्रदीप सहगल की यह रिपोर्ट साफ़ इशारा करती है कि 2027 के महासमर से पहले देश की राजनीति दो धुरों पर घूम रही है—एक तरफ मुद्दों से भटकाव और दलबदलुओं के दम पर सत्ता समीकरण साधना, तो दूसरी तरफ ज़मीनी चुनावों में प्रशासनिक रसूख का प्रदर्शन। लेकिन अंतिम फैसला उस आम जनता के हाथ में है, जिसे तय करना है कि उसे अपने हक का रोज़गार चाहिए या ध्रुवीकरण की राजनीति।
Next Story

