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कांवड़ पथ पर 'सनातनी जेन जी': क्या जंतर-मंतर के छात्रों की मांगें हैं सही?

'द फ़ेडरल देश' की ग्राउंड रिपोर्ट: हरिद्वार मेरठ रोड मोदीनगर कांवड़ पथ पर 'सनातनी जेन जी' की आवाज़। जानिए NEET विवाद, नेमप्लेट मुद्दा और रोजगार पर कांवड़ियों का क्या है रुख।


Sanatanee Genz The Kanwariyas: बीते कुछ सालों से 'जेन जी' (Gen Z यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी) देश की राजनीति और सामाजिक विमर्श के केंद्र में बनी हुई है। यह पीढ़ी सरकारी नीतियों और फैसलों पर मूकदर्शक बनने के बजाय सीधे सवाल उठाने का मादा रखती है। हाल ही में नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए उग्र छात्र आंदोलनों और NEET पेपर लीक विवाद के बाद उत्पन्न जनाक्रोश का ही नतीजा था कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद से इस्तीफा देना पड़ा।


हालांकि, जंतर-मंतर के घटनाक्रम पर समाज और युवाओं के बीच अलग-अलग राय देखने को मिलती है। इसी पृष्ठभूमि में 'द फ़ेडरल देश' की टीम ने उस युवा वर्ग की नब्ज टटोली, जो अपनी गहरी सनातनी पहचान और सांस्कृतिक आस्था से जुड़ा हुआ है।

सावन के पवित्र महीने में हरिद्वार और गोमुख से गंगाजल लेकर नंगे पाँव सैकड़ों किलोमीटर की कठिन पदयात्रा तय करने वाले इन नौजवानों को हम 'सनातनी जेन जी' कह रहे हैं। हमारी पड़ताल का मुख्य उद्देश्य यह समझना था कि कंधे पर कांवड़ उठाए यह युवा वर्ग, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वाले 'स्टूडेंट जेन जी' के आंदोलनों और मांगों को किस नजरिए से देखता है।

1. गदाना गाँव से ग्राउंड रिपोर्ट: कांवड़ पथ पर युवाओं की आवाज़
गाजियाबाद के मोदीनगर क्षेत्र स्थित गदाना गाँव के पास दिल्ली-मेरठ हाईवे इन दिनों 'हर-हर महादेव' के उद्घोष और भगवाधारी श्रद्धालुओं के जनसैलाब से सराबोर है। कांवड़ शिविरों और धूल भरी सड़कों पर 'द फ़ेडरल देश' की टीम ने इन युवाओं से सीधे बातचीत की।

अभय तोमर (अतरौली, 18 वर्ष): जीवन में पहली बार कांवड़ लेकर आ रहे अभय सोशल मीडिया और स्मार्टफोन की दुनिया से दूर हैं। 2027 के चुनाव में पहली बार वोट डालने के सवाल पर वे कहते हैं कि वोट देते समय उनकी प्राथमिकता यही रहेगी कि पढ़ने वाले बच्चों को समय पर बुनियादी सुविधाएं मिलें। यूपी में दुकानों पर नाम-पट्टिका (नेमप्लेट) लगाने के सरकारी आदेश को वे सही मानते हैं।

अभय शुक्ला (अतरौली, 21 वर्ष): ग्रेजुएशन (BA) के छात्र अभय लगातार तीसरी बार कांवड़ यात्रा कर रहे हैं। वे जंतर-मंतर के प्रदर्शनों से पूरी तरह वाकिफ हैं और उनका स्पष्ट मानना है कि NEET पेपर लीक के खिलाफ छात्रों की मांगें पूरी तरह जायज थीं। कांवड़ यात्रा के दौरान होने वाले हादसों पर संयम की अपील करते हुए वे कहते हैं कि जल खंडित होने पर उग्रता या हिंसा से समाधान नहीं निकलता।

2. सनातनी बनाम स्टूडेंट जेन जी: दर्द, समर्थन और सियासत की थ्योरी
कांवड़ पथ पर मिले युवाओं की राय मुख्य रूप से तीन अलग-अलग दृष्टिकोणों में विभाजित नजर आती है।

शिक्षा के संकट और व्यवस्था पर छलका दर्द
विनय (बयाना, 22 वर्ष): 51 लीटर जल की कांवड़ ला रहे विनय ने पारिवारिक परिस्थितियों के कारण 8वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। वे कहते हैं, "अगर मैं पढ़ा-लिखा होता तो पुलिस में होता या डॉक्टर बनता। जंतर-मंतर पर जो छात्र लड़े, वे अपने भविष्य के लिए लड़े। अगर शिक्षा का मजाक बनेगा तो मेहनत का क्या अर्थ रह जाएगा? प्रदर्शनकारियों पर पुलिस का लाठीचार्ज गलत था।"

सनी (निवाड़ी, 18 वर्ष) व कृष (पिलखुवा, 19 वर्ष): पहली और दूसरी बार कांवड़ ला रहे इन छात्रों का मानना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के लीक होने से युवाओं का मनोबल टूटता है। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा सही दिशा में उठाया गया कदम था और सरकार को पारदर्शी नीतियां बनानी चाहिए।

सचिन (रोहिणी, दिल्ली, 20 वर्ष): खुद NEET की तैयारी कर चुके सचिन कहते हैं कि धर्म अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन जीवन में शिक्षा सर्वोपरि है। उनका मानना है कि विरोध प्रदर्शन में उपद्रव नहीं होना चाहिए, लेकिन उठाए गए मुद्दे शत-प्रतिशत सही थे।

सोनू यादव (नोएडा, 22 वर्ष): BA द्वितीय वर्ष के छात्र सोनू का कहना है कि जिस विषय में सीधी रुचि न हो, उस पर टिप्पणी करने से बचना चाहिए।

राजनीतिक साजिश का दृष्टिकोण
मोहित चौहान (कंदोला, 22 वर्ष): 101 लीटर कलश कांवड़ ला रहे मोहित खुद 2019 में यूपी पुलिस भर्ती परीक्षा दे चुके हैं, जो रद्द हो गई थी। इसके बावजूद उनका मानना है कि जंतर-मंतर पर वास्तविक छात्रों से ज्यादा सरकार विरोधी राजनीतिक दलों का जमावड़ा था।

3. नेमप्लेट विवाद: शुद्धता, पहचान और भाईचारे का सवाल
कांवड़ मार्ग पर खाद्य विक्रेताओं के नाम-बोर्ड लगाने के सरकारी आदेश पर युवाओं के व्यावहारिक तर्क सामने आए:

शुद्धता और परहेज: अभय तोमर, अभय शुक्ला, कृष और सोनू यादव का मानना है कि सावन में खान-पान की सात्विकता और परहेज के कारण विक्रेता की पहचान स्पष्ट होना व्यावहारिक रूप से सहायक है।

संदेह का निवारण: रोहिणी के सचिन के अनुसार, पैकेटबंद या खुले भोजन को खरीदने से पहले नाम लिखा होने से मन का संदेह दूर हो जाता है।

सामाजिक सौहार्द: 51 लीटर कांवड़ ला रहे विनय ने सामाजिक सद्भाव पर जोर देते हुए कहा, "हिंदू हो या मुस्लिम, सबका खून लाल ही है। पहचान लिखे जाने से कोई आपत्ति नहीं है, बस इसके नाम पर नफरत नहीं फैलनी चाहिए।"

4. कांवड़ शिविर आयोजक का नजरिया: "मुफ्त राशन नहीं, स्थायी रोजगार चाहिए"
गदाना गाँव में पिछले 14 वर्षों से कांवड़ शिविर चला रहे पंकज (36 वर्ष) का दृष्टिकोण बेहद व्यावहारिक दिखा।

पंजाब में सिलाई का कार्य करने वाले पंकज कहते हैं कि केवल मुफ्त राशन बांटने से युवाओं का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता। एक सामान्य परिवार बच्चे की शिक्षा में जीवन भर की जमापूंजी लगा देता है, लेकिन पेपर लीक होने से उनके सपने टूट जाते हैं। गरीब वर्ग को केवल राशन के बजाय उचित दैनिक मजदूरी, पारदर्शी परीक्षाएं और पक्के रोजगार के अवसरों की आवश्यकता है।

5. प्रशासनिक व्यवस्था: उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के बीच का अंतर
यात्रा के दौरान पुलिस व प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर युवाओं ने अपने अनुभव साझा किए:

उत्तराखंड प्रशासन से शिकायतें: निवाड़ी के सनी और बयाना के विनय का आरोप है कि उत्तराखंड क्षेत्र में कांवड़ियों को मुख्य मार्ग से हटाकर जबरन नहर के सुनसान रास्तों पर भेजा जाता है। इस दौरान सुविधाओं के अभाव और अत्यधिक महंगाई का सामना करना पड़ता है।

उत्तर प्रदेश में व्यवस्थाएं
: दिल्ली (बुराड़ी) से आए विवेक (25 वर्ष), जो पिछले 15 वर्षों से कांवड़ ला रहे हैं, और रोहिणी के सचिन ने बताया कि यूपी सीमा में प्रवेश करते ही शिविरों, शौचालयों और भोजन का बेहतर प्रबंध मिलता है, जिससे पदयात्रा की थकान कम होती है।

6. एक्सप्रेसवे पर 'सुपरफास्ट डाक कांवड़' का उत्साह
दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे पर ग्रेटर नोएडा के रोजा जलालपुर से आ रहे युवाओं के एक जत्थे से मुलाकात हुई, जो अपनी 11वीं 'डाक कांवड़' लेकर आगे बढ़ रहे थे। इस जत्थे का 220 किलोमीटर की दूरी महज 8 घंटे 15 मिनट में पूरी करने का पिछला रिकॉर्ड रहा है।

17 वर्षीय गौरव और 22 वर्षीय नितिन ने बताया कि इस बार भी 8 से 10 घंटे के भीतर यात्रा पूरी करने का लक्ष्य है, जिसके लिए दो महीने तक गहन अभ्यास किया गया है।

इसी जत्थे में शामिल सौरभ प्रजापति, जो खुद SSC और यूपी पुलिस की तैयारी कर रहे हैं, ने जंतर-मंतर आंदोलन पर संतुलित विचार रखे। उन्होंने कहा कि NEET परीक्षा रद्द करने और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से सरकार ने जवाबदेही का संदेश दिया है। वास्तविक छात्रों की मांगें सही थीं, लेकिन अराजकता फैलाने वाले तत्वों का पढ़ाई से संबंध नहीं था। सरकार को पेपर लीक में शामिल बिचौलियों और दलालों पर और अधिक कठोर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए।

ग्राउंड ज़ीरो का निष्कर्ष
'द फ़ेडरल देश' की इस विस्तृत ग्राउंड रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि आज का 'सनातनी जेन जी' अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है, लेकिन साथ ही वह अपने भविष्य और अधिकारों को लेकर भी बेहद जागरूक है।

चाहे पहली बार कांवड़ ला रहे 18 वर्ष के अभय तोमर हों या 15 साल से यात्रा कर रहे 25 वर्ष के विवेक, ये युवा सावन की कांवड़ परंपरा को पूरे गौरव के साथ निभाने के साथ-साथ 'पारदर्शी परीक्षा प्रणाली', 'रोजगार' और 'जवाबदेही' जैसे बुनियादी मुद्दों पर जंतर-मंतर के छात्रों के दर्द से सीधे जुड़ते हैं। आगामी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांवड़ पथ से उभरी यह सोच राज्य और देश के राजनीतिक विमर्श में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।


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