
हूती -सऊदी टकराव से बढ़ा खाड़ी संकट, अब निशाने पर ग्लोबल एनर्जी रूट्स
सऊदी अरब और हूतियों के बीच बढ़ते तनाव ने खाड़ी में संघर्ष का एक नया मोर्चा खोल दिया है, जिससे बाब-अल-मंदेब जैसे अहम समुद्री रास्तों पर खतरा बढ़ रहा है। इस टकराव का असर तेल और गैस की वैश्विक सप्लाई, शिपिंग और पहले से तनावग्रस्त एनर्जी रूट्स पर पड़ सकता है।
पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई ने एक और खतरनाक मोड़ ले लिया है। यमन में सऊदी अरब और ईरान समर्थित हूतियों के बीच कई सालों से ठंडी पड़ी लड़ाई अब नए ज़ोर-शोर से शुरू हो गई है, जिससे पहले से ही उबल रहे क्षेत्रीय संघर्ष में एक और मोर्चा खुल गया है।
हूतियों ने यमन के लाल सागर तट पर अपनी पकड़ मज़बूत कर ली है और वे सऊदी अरब के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और अहम बाब-अल-मंदेब जलमार्ग के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। इसके जवाब में रियाद ने पूरे देश में हूतियों के ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं। हूतियों के मुताबिक, सऊदी अरब ने उनके ठिकानों पर करीब 350 हमले किए हैं।
ग्लोबल एनर्जी मार्केट के लिए कई खतरे
JNU के सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़ के मुदस्सिर कमर ने कहा, "यमन में बढ़ते टकराव और सऊदी अरब के अंदर हमलों की खबरें एक खतरनाक स्थिति पैदा कर रही हैं, जिसका सऊदी और क्षेत्रीय सुरक्षा पर दूरगामी असर पड़ सकता है। इससे सऊदी अरब की सुरक्षा पर अभूतपूर्व खतरा पैदा हो गया है और इसके लिए शायद सैन्य कार्रवाई या ओमान या अन्य देशों के ज़रिए मध्यस्थता की ज़रूरत पड़ सकती है।" उन्होंने आगे कहा, "हूतियों का हमला रेड सी क्षेत्र की सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है, जिससे ग्लोबल एनर्जी सिक्योरिटी की स्थिति प्रभावित हो सकती है।"
पश्चिम एशिया का टकराव कई मोर्चों पर बढ़ रहा है और एक बार फिर ग्लोबल एनर्जी मार्केट के लिए खतरा बन गया है। इस लड़ाई का असर सऊदी अरब और यमन से कहीं ज़्यादा दूर तक महसूस किया जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के लगभग बंद होने के कारण, बहुत कम टैंकर ही ईरान या अमेरिका द्वारा निशाना बनाए जाने के डर से इस संकरे रास्ते से गुज़रने की हिम्मत कर पा रहे हैं। अब बाब-अल-मंदेब (Bab el-Mandeb) में भी रुकावट आ रही है, जो एक और अहम समुद्री रास्ता (chokepoint) है। इसके गंभीर नतीजे न सिर्फ़ इस इलाके के लिए, बल्कि ग्लोबल एनर्जी मार्केट के लिए भी हो सकते हैं।
मक्का वाला पहलू
इस लड़ाई में एक खतरनाक धार्मिक पहलू जुड़ गया है। सऊदी अरब का दावा है कि हूतियों ने सुन्नी इस्लाम की सबसे पवित्र जगहों में से एक, मक्का की तरफ़ एक ड्रोन भेजा था। रियाद ने कहा कि सऊदी एयर डिफेंस फोर्स ने ड्रोन को कोई नुकसान पहुँचाने से पहले ही रोक दिया। हूतियों ने इस आरोप से इनकार किया है। आरोप और इनकार, दोनों ही सच हो सकते हैं या नहीं भी। लेकिन इसके राजनीतिक नतीजों को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। इस आरोप से मामला बहुत गंभीर हो गया है। मक्का और मदीना जैसे पवित्र शहर सऊदी अरब के इलाके का कोई आम हिस्सा नहीं हैं। सऊदी अरब खुद को दुनिया भर के सुन्नी मुसलमानों का संरक्षक मानता है, क्योंकि इन शहरों की चाबियाँ उसके पास हैं। रियाद का "रेड लाइन" (सीमा रेखा) का ज़िक्र यह संकेत देता है कि मक्का से जुड़ी कोई भी घटना सऊदी अरब को और भी कड़ा जवाब देने के लिए मजबूर कर सकती है।
पाकिस्तान की मुश्किल स्थिति
इस समय रियाद के सामने एक मुश्किल चुनाव है। वह अपने इलाके और तेल के बुनियादी ढांचे पर बार-बार हो रहे हमलों को बर्दाश्त नहीं कर सकता, लेकिन यमन में बड़े हमले से एक लंबी लड़ाई छिड़ सकती है, जिसके बारे में रियाद जानता है कि यह आसान नहीं होगी। सऊदी अरब ने 2015 में यमन में बड़े पैमाने पर दखल दिया था, जिसमें ज़मीनी कार्रवाई के बजाय मुख्य रूप से हवाई ताकत का इस्तेमाल किया गया था। लेकिन सऊदी अरब की हवाई ताकत बहुत ज़्यादा होने के बावजूद, हूथी अपनी जगह पर डटे रहने में कामयाब रहे। असल में, सऊदी अरब के नेतृत्व वाली सैन्य कार्रवाई के सालों तक चलने के बावजूद उन्होंने ज़बरदस्त मज़बूती दिखाई है।
क्या रियाद अब मदद के लिए पाकिस्तान और तुर्की के साथ हुए अपने रक्षा समझौते का सहारा लेगा? 2015 में, पाकिस्तान तटस्थ रहा था और उसने हूतियों के खिलाफ सऊदी सैन्य गठबंधन में शामिल होने से इनकार कर दिया था; पाकिस्तान की संसद ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। चूंकि इस्लामाबाद की सीमा ईरान से लगती है, इसलिए हूतियों की मदद के लिए लड़ाके भेजने से तेहरान के साथ रिश्ते खराब हो सकते थे। अगर सऊदी नेतृत्व पाकिस्तान और तुर्की दोनों से मदद मांगता है - क्योंकि उसे ईरान-समर्थित हूतियों के लगातार हमलों का सामना करना पड़ रहा है - तो इस्लामाबाद और अंकारा, दोनों के लिए यह एक मुश्किल फैसला होगा। पाकिस्तान शायद दोनों पक्षों के बीच शांति समझौता कराने की कोशिश करेगा।

