दिल्ली के SIR में यमुना किनारे बेला एस्टेट में 728 ज़िंदा वोटर मृत घोषित!
दिल्ली के बेला एस्टेट में वोटर लिस्ट विवाद। 1961 से रह रहे लोगों के 50 साल पुराने वोट काटे गए। जानिए 'द फ़ेडरल देश' की एक्सक्लूसिव ग्राउंड रिपोर्ट और लोगों का दर्द।
Zamini Hakikat: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की SIR प्रक्रिया और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर दिल्ली के शांति वन, पांटून पुल और तेजपाल बगीची इलाके के निवासियों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। 'द फ़ेडरल देश' की टीम जब इस इलाके में ज़मीनी हकीकत जानने पहुंची, तो वहां के बाशिंदों का दर्द छलक पड़ा। लोगों का आरोप है कि पहले विकास के नाम पर उनके पक्के मकानों को तोड़कर उन्हें झुग्गियों में धकेल दिया गया, और अब एक गहरी साज़िश के तहत उनकी दशकों पुरानी वोटर आईडी को रद्द किया जा रहा है ताकि सरकार को आवास या मुआवज़ा न देना पड़े।
इस रिपोर्ट में पढ़िए उन चार चेहरों की कहानी, जो दशकों से दिल्ली के वोटर होने के बावजूद आज अपने ही देश में अपनी पहचान साबित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं:
1. जमीला खातून: "गंगाजल उठाकर कसम खाई थी, आज हमारे पानी तक पर पहरा है"
52 सालों से इस इलाके में रह रहीं जमीला खातून का दर्द सरकारी वादों की खोखली हकीकत बयां करता है। 13 साल की उम्र में ब्याह कर यहाँ आईं जमीला के पति का देहांत हो चुका है। वे बताती हैं, "हमारे पास सरकार के बनाए आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी और राशन कार्ड—सब मौजूद हैं। पहले हमारे पक्के मकान थे, जिन्हें तोड़कर हमें गाँव में बसाने का वादा किया गया। लेकिन गाँव नहीं बसाया, हमारी चारपाई और बकरियों तक को मलबे में दबा दिया।"
जमीला ने स्थानीय बीजेपी नेता रेखा गुप्ता और प्रशासन पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा, "चुनाव के समय बीजेपी वाले आए, गले में माला डाली और गंगाजल उठाकर कसम खाई थी कि 'जहाँ झुग्गी, वहीं मकान' देंगे। लेकिन अब मकान देना तो दूर, हर महीने बुलडोज़र भेजने की धमकी मिलती है।" 150-200 रुपये की दिहाड़ी मज़दूरी करने वाली जमीला का कहना है कि अब प्रशासन लाल बत्ती से ₹100 देकर खरीदे गए उनके पीने के पानी को भी फेंक कर चला जाता है।
2. कमल: 1961 से रह रहे परिवार को प्रशासन ने बना दिया 'नया वोटर'
कमल का मामला इस पूरी प्रक्रिया (SIR) के सबसे बड़े तकनीकी और प्रशासनिक झोल को उजागर करता है। कमल ने कैमरे पर 1961, 1975 और 2002 की वोटर लिस्ट दिखाईं, जिनमें उनके परदादा और दादा (पुन्नी राम और कलावती) के नाम दर्ज़ हैं।
कमल ने बताया, "बीएलओ ने आकर लगातार 25 दिन काम किया और 500 से ज़्यादा फॉर्म भरे। लेकिन बाद में एसडीएम (SDM) ने आकर कह दिया कि यह डूब क्षेत्र (Flood Area) है और यहाँ की झुग्गी अस्थायी है, इसलिए यहाँ वोट नहीं रहेगा।" जब मीडिया और चुनाव आयोग के वरिष्ठ स्तर पर दबाव पड़ा, तो प्रशासन ने कमल और उनके जैसे कई दशकों पुराने निवासियों से ज़बरदस्ती 'फॉर्म 6' (जो नए मतदाताओं के लिए होता है) भरवा लिया। कमल की सबसे बड़ी चिंता यह है कि उनका 20-25 साल पुराना पहचान पत्र रद्द कर उन्हें 'नया वोटर' बना दिया गया है, जिससे वे उन सभी सरकारी सुविधाओं से वंचित हो जाएंगे जिनमें 10 या 15 साल पुराने रिहायशी प्रमाण (Proof) की मांग की जाती है।
3. रेखा राजपूत: "729 वोटों में से क्या 728 लोग एक साथ मर गए?"
45 वर्षीय रेखा राजपूत का जन्म और विवाह इसी इलाके में हुआ। रेखा का अपना वोट नहीं कटा है, लेकिन वे बस्ती वालों की आवाज़ बनकर सामने आई हैं। रेखा ने जो आरोप लगाए, वे बेहद सनसनीखेज़ हैं।
रेखा बताती हैं, "ये लोग कोई झुग्गीवासी नहीं, बल्कि वे किसान हैं जिनकी ज़मीनें और पक्के मकान हाईवे और फ्लाईओवर बनाने के लिए छीन लिए गए थे। अब प्रशासन ने इन्हें झुग्गीवासी बना दिया है। वोटर लिस्ट में धांधली का आलम यह है कि इलाके के 729 वोटों में से 728 लोगों को 'मृत' या गायब दिखाकर उनके वोट काट दिए गए हैं।" रेखा ने कहा कि यह पूरी साज़िश लोगों को बेदखल करने की है, क्योंकि अगर इनकी वोटर आईडी ही खत्म हो जाएगी तो सरकार को 'जहाँ झुग्गी वहीं मकान' के तहत इन्हें घर नहीं देना पड़ेगा। रेखा ने बताया कि वे 4 साल से धरने पर बैठी हैं, प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और एलजी तक को खत लिख चुकी हैं, लेकिन सुनवाई तब हुई जब राहुल गांधी इस इलाके में पहुंचे और मीडिया का ध्यान इस ओर गया।
4. शारदा देवी: "एक बार पलट कर देखो, सत्ता ऐसी पलटी कि गर्दन ही काट दी"
60 वर्षीय शारदा देवी 40 साल से यहाँ वोट डाल रही हैं। उनका परिवार खेती करता था और सोसाइटी को बाकायदा लगान भरता था। बाद में वह ज़मीन डीडीए (DDA) के कब्ज़े में चली गई। शारदा देवी का गुस्सा देश और राज्य के सत्ताधीशों पर खुलकर फूटा।
उन्होंने कहा, "हमसे कहा गया था कि एक बार सत्ता पलट कर देखो। हमने मोदी जी को वोट दिया, लेकिन सत्ता ऐसी पलटी कि ग़रीब लोगों का कुछ नहीं छोड़ा। वोट क्या काटा, हमारी तो सीधी गर्दन ही काट दी।" शारदा देवी ने बताया कि उनके इलाके के 799 जीवित लोगों को वोटर लिस्ट में 'मरा हुआ' घोषित कर दिया गया है। महंगाई (सोना, पेट्रोल, चीनी) का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ग़रीब आदमी अपने बच्चों की शादी कैसे करेगा? उन्होंने बीजेपी नेता रेखा गुप्ता के उस वादे की भी याद दिलाई जिसमें महिलाओं को हर महीने ₹2500 देने (लक्ष्मी योजना) की बात कही गई थी, जो आज तक पूरा नहीं हुआ। शारदा देवी ने अंत में कहा कि आज तक कोई नेता उनकी सुध लेने नहीं आया, लेकिन राहुल गांधी के आने से उन्हें थोड़ी उम्मीद बंधी है कि शायद उनके बच्चों का भविष्य और वोट बच सके।
शांति वन के इन चार चेहरों की कहानी सिर्फ एक इलाके की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की कहानी है जहाँ विकास के पहिए के नीचे पहले ग़रीबों के मकान रौंदे जाते हैं और फिर कागज़ों में उन्हें 'मुर्दा' घोषित कर उनके संवैधानिक अधिकार (वोट) भी छीन लिए जाते हैं। चुनाव आयोग और प्रशासन के पास फिलहाल इस बात का कोई ठोस जवाब नहीं है कि 1961 से रह रहे नागरिकों को 'नया वोटर' क्यों बनाया जा रहा है और जीवित लोगों को 'मृत' कैसे दिखाया गया।

