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बंगाल उपचुनाव: EC ने फ्रीज किया TMC का नाम व सिंबल, ममता को झटका

उपचुनाव से पहले EC ने फ्रीज किया TMC का नाम और 'जोड़ा घास फूल' सिंबल; अब नए नाम व चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में उतरेंगे ममता बनर्जी और बागी गुट के उम्मीदवार।


Rajpath: पश्चिम बंगाल की राजनीति में 6 अक्टूबर को होने वाले विधानसभा उपचुनावों से ठीक पहले एक बहुत बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक मोड़ आ गया है। चुनाव आयोग (ECI) ने एक अंतरिम आदेश जारी करते हुए अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और उसके पारंपरिक चुनाव चिन्ह 'जोड़ा घास फूल' के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। पार्टी के भीतर उभरे दो गुटों एक तरफ पार्टी की संस्थापक ममता बनर्जी और दूसरी तरफ बागी खेमे द्वारा खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताए जाने के बाद चुनाव आयोग ने सिंबल ऑर्डर के नियम 15 के तहत दोनों पक्षों के लिए नाम और सिंबल को तत्काल प्रभाव से फ्रीज कर दिया है।

डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के शो राजपथ में एंकर प्रदीप सहगल ने बंगाल के इस सिंबल विवाद, विपक्षी दलों की तीखी प्रतिक्रिया और महाराष्ट्र में शिवसेना व एनसीपी के विभाजन से इसकी समानताओं पर विस्तृत रिपोर्ट पेश की गई।


1998 में बनी पार्टी और पहचान का संकट

ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। दशकों के जमीनी संघर्ष, वाममोर्चा के खिलाफ लंबी लड़ाई और लाठियां खाने के बाद उन्होंने 'जोड़ा घास फूल' को बंगाल के घर-घर की पहचान बनाया था। लेकिन अब उपचुनावों में जब बंगाल का मतदाता वोट डालने जाएगा, तो ईवीएम (EVM) पर यह ऐतिहासिक निशान मौजूद नहीं होगा। अंतिम फैसला आने तक दोनों ही गुटों को नए नाम और नए चुनाव चिन्ह के साथ चुनावी मैदान में उतरना होगा।


महाराष्ट्र मॉडल की पुनरावृत्ति? विपक्ष का साझा हमला

चुनाव आयोग के इस अंतरिम फैसले के बाद विपक्षी दलों ने इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और क्षेत्रीय पार्टियों के अस्तित्व पर सीधा हमला करार दिया है:


राहुल गांधी का बयान: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि यह सिर्फ ममता बनर्जी की लड़ाई नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख का सवाल है। उन्होंने दावा किया कि पहले जून 2022 में महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव ठाकरे बनाम एकनाथ शिंदे) और फिर जुलाई 2023 में एनसीपी (शरद पवार बनाम अजित पवार) के साथ जो हुआ, ठीक वही स्क्रिप्ट अब 2026 में बंगाल में तृणमूल कांग्रेस पर लागू की जा रही है।


संजय राउत और अखिलेश यादव: शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत ने कहा कि जिस प्रकार शिवसेना बालासाहेब ठाकरे की पहचान थी, उसी तरह तृणमूल कांग्रेस ममता बनर्जी की पहचान है। वहीं समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने भी चुनाव आयोग के इस कदम पर गंभीर सवाल उठाए।


विपक्ष का आरोप: गैर-भाजपा दलों का आरोप है कि यह कोई संयोग नहीं बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। पहले क्षेत्रीय दलों में बगावत कराई जाती है, फिर चुनाव आयोग में मामला ले जाकर सिंबल फ्रीज कराया जाता है और अंत में पार्टी के मूल संस्थापक को ही अपनी पार्टी से बेदखल कर दिया जाता है।


भाजपा का रुख और राजनीतिक हमले

दूसरी तरफ, चुनाव आयोग का कहना है कि वह नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं के तहत काम कर रहा है क्योंकि उपचुनाव नजदीक हैं और दोनों गुटों के दावों की विस्तृत जांच के लिए समय चाहिए।

वहीं भाजपा नेताओं ने इसे ममता बनर्जी के राजनीतिक आचरण और सत्ता विरोधी लहर का नतीजा बताया है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी पर तीखा हमला बोलते हुए इसे उनके द्वारा लिए गए विवादित फैसलों और बयानों का परिणाम करार दिया।


मूल सवाल: पार्टी आखिर किसकी होती है?

द फ़ेडरल देश की रिपोर्ट में यह बुनियादी सवाल उठाया गया है कि आज भारत में क्षेत्रीय दलों के नेताओं के सामने सबसे बड़ा संकट चुनाव हारने का नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी को गंवा देने का बन गया है। लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल यह बनकर उभरा है कि पार्टी का वास्तविक अधिकार किसके पास है उस संस्थापक नेता के पास जिसने खून-पसीने से संगठन खड़ा किया, या उन विधायकों-सांसदों के पास जो बगावत कर अलग गुट बना लेते हैं।


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