यूपी में सियासी घमासान: एक तरफ BSP में नंबर-2 की जंग, दूसरी तरफ BJP का नेताओं को 'बूथ पर लौटने' का अल्टीमेटम
उत्तर प्रदेश की राजनीति इस समय एक बड़े संक्रमण काल से गुजर रही है। बसपा के सामने अपनी साख और नेतृत्व के अनुशासन को बनाए रखने की चुनौती है, तो भाजपा के सामने अपने 10 साल के शासन के रिकॉर्ड और जमीनी कार्यकर्ता की नाराजगी से निपटने की चुनौती है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सत्ता के गलियारों से लेकर संगठन के चौपालों तक हलचल तेज है। राज्य के दो सबसे प्रमुख सियासी खेमों बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी में अंदरूनी फेरबदल और रणनीतिक सख्ती का नया दौर शुरू हो गया है। एक तरफ जहाँ बसपा में उत्तराधिकारी के पद पर अनिश्चितता के बादल मँडरा रहे हैं, वहीं सत्ता में 10 साल पूरे कर रही भाजपा अपनी जमीनी पकड़ को दोबारा मजबूत करने के लिए नेताओं पर चाबुक चला रही है।
बसपा में नंबर-2 की कुर्सी का 'अस्थायी' सच
बहुजन समाज पार्टी को समझने के लिए उसके संविधान से ज्यादा उसके मौन और संकेतों को पढ़ना होता है। भारतीय राजनीति में लगभग हर दल में कोई न कोई नंबर-2 घोषित या अघोषित रूप से तय होता है, लेकिन बसपा में यह पद उतना ही अस्थायी है जितनी बरसात के मौसम में धूप।
आकाश आनंद का बदलता प्रोफाइल और सोशल मीडिया का 'अनफॉलो'
पिछले तीन वर्षों में आकाश आनंद को पहले उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाया गया, फिर लोकसभा चुनावों के बीच जिम्मेदारियों से हटाया गया, और बाद में वापसी हुई। लेकिन अब फिर से दूरी के संकेत मिलने लगे हैं। आकाश आनंद ने चार दिनों के भीतर दूसरी बार अपना 'X' (ट्विटर) बायो बदला। 'बसपा नेशनल कोऑर्डिनेटर' लिखने वाले आकाश ने अब खुद को सिर्फ 'बसपा समर्थक' लिखा है।
इसी बीच, पार्टी कार्यालय से जिलाध्यक्षों को संदेश भेजा गया कि वे आकाश आनंद और उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ को सोशल मीडिया पर अनफॉलो कर दें। सूत्रों के मुताबिक, सोशल मीडिया पर चला 'उम्मीदों का आकाश' अभियान और हाथरस रैली में उनका आक्रामक रुख मायावती को नागवार गुजरा।
ईशान आनंद की एंट्री और नया शक्ति-संतुलन
3 सितंबर को हुई बसपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में आकाश आनंद की अनुपस्थिति और उनके छोटे भाई ईशान आनंद की मौजूदगी ने सबको चौंका दिया। मायावती ने ईशान आनंद को यूपी और उत्तराखंड छोड़कर बाकी राज्यों के संगठन की समीक्षा की जिम्मेदारी सौंपी है।
इस पूरी खटपट के पीछे 25 अगस्त को जेवर में आकाश आनंद का वह भाषण भी माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने खुले तौर पर कहा था कि "पुराने पदाधिकारी काम नहीं करने देते और गलत लोग गलत जगह बैठे हैं।" मायावती के बनाए पुराने ढांचे पर सवाल उठाना ही शायद आकाश पर भारी पड़ गया। बसपा का नियम साफ है—चेहरे बदल सकते हैं, लेकिन सत्ता का केंद्र हमेशा मायावती ही रहेंगी।
बीजेपी का मिशन 'ग्राउंड कनेक्ट' — लखनऊ छोड़ो, बूथ पर जाओ
दूसरी तरफ, यूपी में लगातार 10 साल से सत्ता संभाल रही भाजपा के सामने अपनी साख और जमीनी संगठन को बचाए रखने की चुनौती है। राम मंदिर चंदा विवाद, धंसते एक्सप्रेस-वे और जर्जर सरकारी स्कूलों के मुद्दों पर विपक्ष के हमलो के बीच पार्टी आलाकमान हरकत में आया है।
विनोद तावड़े की कड़क चेतावनी
यूपी बीजेपी के नए प्रभारी विनोद तावड़े ने लखनऊ आते ही पार्टी के 46 बड़े पदाधिकारियों की बैठक ली और सीधा फरमान सुनाया—"लखनऊ के एसी कमरे छोड़िए, माला पहनना बंद कीजिए और अपने-अपने क्षेत्रों व बूथों पर जाइए।"
तावड़े ने स्पष्ट किया कि मार्च तक किसी भी नेता को शादी-ब्याह के नाम पर भी छुट्टी नहीं मिलेगी। जिला मुख्यालयों में बैठने के बजाय नेताओं को सीधे विधानसभा क्षेत्रों में जाकर जातीय समीकरण और विपक्ष की तैयारियों को समझना होगा।
57 सीटों का नुकसान और 2027 की चिंता
भाजपा की इस सख्ती के पीछे 2017 से 2022 के आंकड़े हैं। 2017 में भाजपा ने अकेले 312 सीटें जीती थीं, जो 2022 में घटकर 255 रह गईं—यानी 57 सीटों का सीधा नुकसान। पार्टी को अहसास है कि सत्ता में लंबे समय तक रहने से नेताओं और आम कार्यकर्ताओं के बीच दूरी बढ़ी है।
बैठक में जब तावड़े ने पूछा कि कौन चुनाव लड़ना चाहता है, तो सार्वजनिक रूप से किसी ने हाथ नहीं उठाया, जिस पर तावड़े ने चुटकी लेते हुए कहा कि अकेले में कई लोग टिकट मांग चुके हैं। संदेश साफ था—"टिकट बाद में मांगिएगा, पहले अपना रिपोर्ट कार्ड ठीक कीजिए।"
दिल्ली की सीधी निगरानी
अब दिल्ली नेतृत्व ने लखनऊ की सीधी कमान संभाल ली है। 10-11 सितंबर को संगठन महामंत्री बीएल संतोष और उसके बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का लखनऊ दौरा प्रस्तावित है। दिल्ली अब लखनऊ से सीधी रिपोर्ट मांग रही है और नेताओं से कहा जा रहा है कि रिपोर्ट बनानी है तो गांव-देहात की धूल भरी सड़कों पर उतरना पड़ेगा।
2027 की जंग और मतदाता का रिपोर्ट कार्ड
उत्तर प्रदेश की राजनीति इस समय एक बड़े संक्रमण काल से गुजर रही है। बसपा के सामने अपनी साख और नेतृत्व के अनुशासन को बनाए रखने की चुनौती है, तो भाजपा के सामने अपने 10 साल के शासन के रिकॉर्ड और जमीनी कार्यकर्ता की नाराजगी से निपटने की चुनौती है।
नेताओं के पास चाहे जितने बयान हों, लेकिन अंतिम फैसला उस मतदाता के हाथ में है जो बिना किसी शोर-शराब के मतदान के दिन ईवीएम का बटन दबाकर अपना रिपोर्ट कार्ड जारी करता है। अब देखना यह होगा कि 2027 में जनता किसे पास करती है और किसे खारिज।

