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Aaj Ki Taaza Khabar: अहम खबरें एक जगह

दिन भर की अहम खबरें एक साथ पढ़ें जानें देश का हाल।


आज की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल शायद यह नहीं है कि कौन किसके खिलाफ है। बड़ा सवाल यह है कि देश की संस्थाओं, विपक्ष की राजनीति और चुनावी गठबंधनों—तीनों में भरोसा किस दिशा में जा रहा है।

एक तरफ सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग से रिकॉर्ड मांग रहा है। दूसरी तरफ चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। सड़क पर विरोध जारी है। विपक्ष के भीतर भी नए समीकरण बन रहे हैं। छोटे दल अपनी राजनीतिक जगह तलाश रहे हैं। और बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक गठबंधन अपने भीतर की चुनौतियों से जूझ रहे हैं।

यानी आज की खबरें अलग-अलग नहीं हैं। ये एक बड़े राजनीतिक बदलाव की अलग-अलग परतें हैं।

शुरुआत सुप्रीम कोर्ट से।

चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने आज महत्वपूर्ण सुनवाई की। मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल निलंबित करने की मांग पर अदालत ने कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया, लेकिन चुनाव आयोग, केंद्र सरकार और बाकी पक्षों से जवाब मांगा है। अदालत ने चुनाव आयोग के रिकॉर्ड भी तलब किए हैं।

सुनवाई के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा Form-6 को लेकर हुई। अदालत ने साफ कहा कि Form-6 में जो भी संशोधन किए गए, उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी थी। अदालत ने यह भी कहा कि वह रिकॉर्ड देखकर समझना चाहती है कि Form-6 में बदलाव किसने किया। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि आयोग के फैसले नियमानुसार लिए गए और रिकॉर्ड से पूरी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।

यानी मामला अब सिर्फ राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं है। अब अदालत आधिकारिक रिकॉर्ड देखना चाहती है।

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इसी बीच इस बहस को नया आयाम सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस रोहिंटन नरीमन के बयान ने दिया है। उन्होंने SIR प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए और इसे गैर-कानूनी बताया। उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी की और सुप्रीम कोर्ट से इस पूरे विवाद पर जल्द फैसला करने की जरूरत बताई। यह उनका सार्वजनिक बयान है, अदालत का आदेश नहीं।

जब चुनाव आयोग की प्रक्रिया अदालत में हो, पूर्व न्यायाधीश सार्वजनिक सवाल उठा रहे हों और राजनीतिक दल पहले से विरोध कर रहे हों, तो स्वाभाविक है कि यह बहस अदालत से निकलकर सड़क तक पहुंचे।

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दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर राहुल गांधी ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि जो महिला सवाल पूछती है, उसे चुप कराने की कोशिश की जाती है। उन्होंने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के साथ हुई कार्रवाई का मुद्दा उठाया। यह राहुल गांधी का आरोप है।

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इसी विरोध का एक चेहरा कॉकरोच जनता पार्टी भी है।

पार्टी के नेता सौरव दास ने दावा किया है कि सरकार उनके नेताओं को गिरफ्तार करने की तैयारी कर रही है। उन्होंने कहा कि अभिजीत दीपके समेत कई नेताओं पर कार्रवाई की आशंका है। यह उनका दावा है। सरकार की ओर से इसकी पुष्टि नहीं की गई है।

लेकिन विरोध कर रहे समूहों के भीतर भी पूरी सहमति नहीं दिख रही।

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एक रिपोर्ट के मुताबिक अभिजीत दीपके चाहते हैं कि विपक्ष चुनाव के बहिष्कार जैसे कदम पर विचार करे, जबकि अरविंद केजरीवाल चाहते हैं कि आंदोलन का राजनीतिक दायरा और व्यापक हो। रिपोर्ट के अनुसार दोनों एक-दूसरे के समर्थन का इंतजार कर रहे हैं। यानी विरोध साझा है, लेकिन रणनीति अभी भी अलग-अलग है।

यहीं से बात विपक्ष की राजनीति पर आती है।

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उत्तर प्रदेश में 2027 के चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है। लेकिन सबसे दिलचस्प हलचल बड़ी पार्टियों में नहीं, बल्कि छोटी पार्टियों के बीच दिखाई दे रही है।

रिपोर्ट के मुताबिक कई छोटे दल और क्षेत्रीय नेता राहुल गांधी के संपर्क में हैं। वहीं समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर बातचीत जारी है। सवाल सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि विपक्ष के भीतर नेतृत्व और राजनीतिक जगह का भी है।

यानी क्या उत्तर प्रदेश में विपक्ष का केंद्र समाजवादी पार्टी रहेगी, या कांग्रेस अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रही है?

इसी तस्वीर में AIMIM की रणनीति भी जुड़ती है।

रिपोर्ट के अनुसार अगर समाजवादी पार्टी के साथ समझौता नहीं होता, तो AIMIM उत्तर प्रदेश में 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। पार्टी ने यह भी संकेत दिया है कि जिन मुस्लिम नेताओं को समाजवादी पार्टी टिकट नहीं देगी, उन्हें वह मैदान में उतार सकती है। यह AIMIM की राजनीतिक रणनीति है।

इसका मतलब यह है कि विपक्ष की चुनौती सिर्फ भाजपा नहीं है।

उसे अपने भीतर भी राजनीतिक संतुलन बनाना होगा।

और यही तस्वीर बिहार में भी दिखाई दे रही है।

बिहार विधान परिषद चुनाव के बीच उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा में असहमति सामने आई है। पार्टी के तीन विधायक एनडीए समर्थित उम्मीदवार के खिलाफ खड़े हो गए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा है कि वे एनडीए सरकार के साथ हैं।

यानी गठबंधन बना हुआ है, लेकिन उम्मीदवार को लेकर मतभेद सामने आ गए हैं।

इससे एक बड़ा सवाल निकलता है।

क्या आने वाले चुनावों में सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष की एकजुटता होगी, या गठबंधनों के भीतर असहमति को संभालना?

भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए अपने आठ उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और केंद्रीय राज्य मंत्री बीएल वर्मा को इस बार दोबारा मौका नहीं दिया गया। उनकी जगह योगी सरकार में पशुधन मंत्री धर्मपाल सिंह को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया गया है। भाजपा की सूची में धर्मपाल सिंह के अलावा राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार को उम्मीदवार बनाया गया है। सूची पर नजर डालें तो पार्टी ने संगठन और सामाजिक समीकरण—दोनों को साधने की कोशिश की है। उम्मीदवारों में सामान्य, ओबीसी और दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व रखा गया है।

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