कांग्रेस के गढ़ में अखिलेश की एंट्री, 2027 से पहले बढ़ी खींचतान
दो लाइन की समरी अखिलेश यादव की रायबरेली से PDA यात्रा के बाद सपा और कांग्रेस के बीच सियासी खींचतान तेज हो गई है। 2027 चुनाव से पहले सीट शेयरिंग और रायबरेली में राजनीतिक दबदबे को लेकर दोनों सहयोगी दलों के बीच सवाल खड़े हो रहे हैं।
द फेडरल देश का खास कार्यक्रम जनपद। अखिलेश यादव ने 2027 में जो उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं उसके लिए बिगुल फूंक दिया है और यह बिगुल फूंका उन्होंने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की जो संसदीय क्षेत्र है रायबरेली से रायबरेली से पीडीए यात्रा उनकी बस यात्रा निकली है और काफी अच्छा खासा वहां पर भीड़ देखने को मिला और समाजवादी पार्टी का यूं कहें कि वो प्रदर्शन था शक्ति प्रदर्शन लेकिन सवाल कई उठ रहे हैं कि आखिरकार अखिलेश यादव ने अपने पीडीए यात्रा की शुरुआत के लिए रायबरेली को क्यों चुना? क्योंकि वो तो कांग्रेस का गढ़ है।
राहुल गांधी का क्षेत्र है। तो इसको लेकर तमाम तरह के बयान सामने देखने को मिल रहे हैं। अजय राय जो उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अध्यक्ष हैं। उनका भी एक बयान आया कि अगर अखिलेश यादव रायबरेली जा सकते हैं तो हम भी कन्नौज और मैनपुरी जा सकते हैं। तो आज हम इसी पर चर्चा करेंगे कि इंडिया ब्लॉक के दो जो मेन घटक दल है वो आपस में क्यों इस तरीके से एक दूसरे के क्षेत्र में दखल दे रहे हैं। तो इसी पर हम चर्चा करेंगे। हमारे साथ दो बेहद खास मेहमान जुड़ चुके हैं।
हमारे साथ वरिष्ठ पत्रकार नवीन निगम जी जुड़ चुके हैं। और साथ ही साथ हमारे सहयोगी द फेडरल के सिद्धार्थ तिवारी जी पहली बार द फेडरल देश पे हमारे साथ जुड़ रहे हैं। तो आप दोनों का बहुत-बहुत स्वागत। नवीन सर आपका और सिद्धार्थ जी आपका। नवीन सर हम आपके पास आते हैं। सबसे पहले अखिलेश यादव पीडीए यात्रा के लिए रायबरेली को चुने। इसके पीछे आपको क्या उनकी मंशा नजर आती है? देखिए रायबरेली क्यों चुना उसके मुझे मुझे जो लगता है दो तीन कारण एक तो शायद सपा ने को मैं करेक्ट ना हो तो आप मुझे करेक्ट करिएगा रायबरेली में शायद चार सीटें जीती थी पिछले बार विधानसभा में बिल्कुल सही वो चार सीटें जीतने का श्रेय जो है बहुत कुछ श्रेय जो आप कैबिनेट मिनिस्टर है भाजपा सरकार में मनोज पांडे को दिया जाता है और मनोज पांडे क्योंकि भाजपा में है। अभी आप थोड़े दिन पहले आपने खबर देखी होगी कि उनको योगी जी ने बुलाया हेलीकॉप्टर के थ्रू हेलीकॉप्टर भेज के गांव में सब बातें बड़ी चर्चा में रहती है छोटे शहरों में कि भैया पांडे भैया जो है वो तो योगी जी के बड़े खास है उनका बड़ा मानते हैं उससे क्या होता है कि एक माहौल बनता है माहौल ज्यादा ना बने क्योंकि चार सीटें दाव पर है 22 में जीती थी। उन चार सीटों को मजबूत करने के इरादे से भी रायबरेली को एक जैसे सपा की प्राथमिकता में बताया गया।
जबकि सपा की प्राथमिकताओं में रायबरेली कभी नहीं होता जो कि कांग्रेस की वजह से वहां पर अपना एमपी का भी उम्मीदवार नहीं खड़ा करते हैं। तो दूसरा यह था कि कांग्रेस को अब वो क्या कहना चाहते हैं कि आपके गढ़ में एक तरह से कांग्रेस को भी संदेश है कि भले ही सांसद आपका है क्योंकि हम उस सीट पर अपना उम्मीदवार नहीं खुला करते हैं लेकिन गढ़ हमारा है क्योंकि हमने चार सीटें जीती थी तो एक तरह से कांग्रेस को भी संदेश इसीलिए शायद अजय राय ने आज कुछ कहा भी है कि नहीं हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता अब इससे समस्या क्या होती है जी जब आपका प्रदेश अध्यक्ष ये सब बातें कहने लगे कि रायबरेली से कर रहे हैं तो हमको कोई फर्क नहीं पड़ता। हम तो मित्र हैं। तो आप अभी से जो गठबंधन होने वाला है उसमें एक एक एहसास कराने लगते हैं अपने कार्यकर्ताओं को कि हम थोड़ा झुक रहे हैं। राय जी को आज कुछ नहीं बोलना चाहिए था। मैं कहता हूं कि उनको कुछ भी नहीं टिप्पणी करनी चाहिए थी। उसको एक सामान्य सी प्रतिक्रिया समझते और लोगों को यही समझने देते कि मनोज पांडे के प्रभाव को थोड़ा कमतर करने के लिए अखिलेश यादव ने रायबरेली को चुना।
लेकिन अजय राय ने जो कमेंट आज कर दिया है जो मैंने थोड़ा सा देखा ज्यादा उसको पढ़ा भी नहीं है उससे लगता है कि कांग्रेस अभी से एक डिफेंसिव मुद्रा में आ रही है और गठबंधन में आप अगर पहले से ही डिफेंसिव मुद्रा में आने लगेंगे जी तो आपके लिए आगे चलके बड़ा घातक होगा जब आप सीटों के तालमेल की बात करेंगे तो मुझे जो एहसास हुआ वो ये था कि अखिलेश गए मनोज पांडे की वजह से लेकिन अजय राय ने जो कमेंट किया उससे अखिलेश को थोड़ा फायदा ही हो जी तो बिल्कुल और अजय राय ने अपने बयान में ये भी नवीन जी कहा कि अगर अखिलेश यादव रायबरेली आ सकते हैं तो हम लोग भी कन्नौज और मैनपुरी जा सकते हैं। हालांकि इसको लेकर सिद्धार्थ जी से समझते हैं।
सिद्धार्थ जी आपको क्या लग रहा अजय राय क्या कांग्रेस इस बात को लेकर नाराज है उत्तर प्रदेश में जिस तरीके से अखिलेश यादव ने अपनी यात्रा रायबरेली से की या इसको सामान्य तरीके से कांग्रेस ले रही और ये किस तरीके का टैक्टिस आपको नजर आ रहा बिल्कुल सही बात है ये एक्चुअली आज जो अजय राय जी का जो कमेंट आया जो थोड़ा बहुत इस पे लेके शायद डाउट भी था वो एक तरीके से क्लियर हो गया क्योंकि अभी तक का जो समा उनका जो पार्टी वर्कर्स है हालांकि वो कह रहे थे कि अखिलेश जी की यात्रा वहां पर इसलिए है क्योंकि वहां पे जो छात्र सभा और एबीवीपी के बीच में 17 सितंबर को जो क्लशेस हुए थे उसकी वजह से वहां पे अपने पार्टी वर्कर्स को सपोर्ट करने के लिए ये दिखाने के लिए कि पार्टी आज वहां पर खड़ी है तो उसके लिए जा रही है। हालांकि ये चीज एक नॉर्मल सामान बैठक के थ्रू भी की जा सकती थी। तो सवाल उठ रहे थे तो एक कि जो यात्रा अक्टूबर में होनी थी वो करीबन हफ्ता भर या 10 दिन पहले सीट शेयरिंग को लेके जो मीटिंग है उसके पहले क्यों करी गई? हालांकि पार्टी ओपनली इसको एक्सेप्ट नहीं कर रही थी लेकिन यह बिल्कुल चर्चा में था कि ये कहीं ना कहीं जो उनके पार्टी वर्कर्स भी हैं ग्राउंड पे उनका था कि हम ये दिखाना चाहते हैं कि ठीक है आप 2024 में राहुल गांधी वहां से जीते लेकिन दबदबा हमारा आज भी रायबरेली में सपा का ही है और वो एक तरीके से दिखाने का था क्योंकि ये भी सुनने में आ रहा है कि जो 125 या 35 सीट जो कांग्रेस माने मांगने के लिए रखने का कोशिश कर रही है वो पांचों की छह कुछ ही सीट इनफ रायबरेली की चाह रही हैं अपने लिए। तो एक ये था कि इसीलिए रायबरेली क्या चुना गया कि जो कांग्रेस का जो नेगोशिएशन है जिसमें कि रायबरेली की सारी सीट वो शायद चाहते हैं तो वहां पे ये जाना।
तो ये एक तरीके से अफवाहें थी और चर्चाएं थी। आज अजय राय जी का जो कमेंट आया उसने एक तरीके से क्लियर कर दिया कि शायद ये मतलब दबदबे का ही खेल है इस समय और मैं तो इसको इसी से समझ रहा हूं और ग्राउंड में जो उन्होंने कोई बात की उसमें भी यही निकल के आ रहा है कि सपा वहां पे अपना ज्यादा रिप्रेजेंटेशन चाहती और कम से कम रायबरेली में तो वो पूरी की पूरी सीट कांग्रेस को देने के लिए बिल्कुल भी राजी नहीं है। तो पूरा जो आपने देखा होगा कि जाके बुलडोजर से मैला माला पहनाया गया और जो पूरा पार्टी वर्कर लाल टोपी पहन के वो लखनऊ आगरा प्रयागराज एक्सप्रेसवे पूरा एक तरीके से लाल हो गया था तो वो एक तरीके से वो एक ग्रैंड स्पेक्टिकल बनाया गया था दिखाने के लिए कि कार्डर हमारा आज भी यहां स्ट्रांग है तो हमारी जरूरत आपको ज्यादा है गठबंधन को जीतने के लिए तो बिल्कुल तो सिद्धार्थ जी समाजवादी पार्टी अजय राय के इस बयान को कैसे ले रही है कि अगर वो वो रायबरेली आ सकते हैं तो हम कन्नौज, मैनपुरी से भी जा सकते हैं क्योंकि आपको पता है सेई बहुत दिल के करीब है समाजवादी पार्टी के मैनपुरी और इटावा और कन्नौज तो वो किस तरीके से ले रही है किसी से आपकी बात हुई हो तो जी बात हुई है देखिए सर खुले में अभी तो कोई वो नहीं बताना चाह रहे हैं लेकिन जहां तक कि एक बैक डोर टॉक्स या ऑल द रिकॉर्ड टॉक्स है उसमें ये जरूर है कि वो उसको मतलब इस चीज को कर रहे हैं कि इसमें जो
कांग्रेस अजय राय का रिमांड आया वो उसको एक तरीके से नकार रहे हैं। वो ये कह रहे हैं कि वहां पे हमारा वो हमारा एक तरीके से गढ़ है। वहां पे हम कभी भी वहां पे इनफ मुलायम सिंह यादव नेता जी का नाम चलता है। तो उनका वो कहना है कि वो चीज हमारे लिए एक सेफ सीट है और वहां की जनता में कांग्रेस कर ले, बीजेपी कर ले या कोई भी कर ले वो सीट उनको ही आनी है। तो हालांकि ये चीज बोल रहे हैं लेकिन एक तरीके से उनका यही कहना है कि ये जो कांग्रेस जिस तरह से देख रही है वो ये एडमिट करे कि जो सपा है लोकसभा इलेक्शंस अलग थे और ये जो असेंबली इलेक्शंस है ये अलग है और यहां पे सपा को ज्यादा ही सीट मिलना चाहिए। एक दूसरा उनका कहना यह है कि 2017 में सिमिलर बातें हुई थी गठबंधन के लिए और तब तब भी सपा उनको कम सीट देना चाह रही थी लेकिन खैर बातचीत के थ्रू 105 सीट गई और उसके बाद वो गठबंधन इतना ज्यादा कुछ अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई तो एक वो भी पॉइंट वो सामने रख रहे हैं कि अगर कांग्रेस इसी पॉइंट को ले आगे बढ़ना चाहती है तो हमारे पास 2017 का भी रिजल्ट है दिखाने के लिए कि हम क्यों यहां पे ज्यादा सीट मांगने का कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि ओपन में ये लोग को बोलने में अभी आई थिंक वो हाई कमांड या अखिलेश जी का जो कमेंट आएगा उसी को उसी के बेसिस पर पार्टी के बाकी स्पोक पर्सन बोलना शुरू करेंगे सर। बिल्कुल तो नवीन जी क्योंकि एक बात दिलचस्प है चाहे हम इमरान मसूद की बात करें अजय राय की बात करें और आप देखिए रिटालिएशन में जिस तरीके से पिछले दो दिन पहले इकड़ा हसन का बयान आया समाजवादी पार्टी की कैराना से सांसद ऊपर में अखिलेश यादव और राहुल गांधी जब आप और प्रियंका गांधी जब साथ होते हैं तो एक अलग इक्वेशन नजर आता है। लेकिन नीचे के जो नेता है ये बयान बहादुर इस तरीके से क्यों बनते हैं? क्योंकि नेगोशिएशन जो भी करना सीटों का समझौता होना और रायबरेली में कितनी सीटें किसको क्या मिलेंग जाहिर तौर पर कांग्रेस छह सीटें अगर मांग भी लेती है तो क्या छह सीटों के लिए उसके पास लोकल कैंडिडेट है क्योंकि अदिति सिंह भी जो एक समय कांग्रेस में थी वो बीजेपी में जा चुकी है और इस तरीके से क्या कांग्रेस ठीक है राहुल गांधी वहां से सांसद है लेकिन इतना मजबूत है रायबरेली से कि इतनी विधानसभा सीटें वो निकाल सके देखिए कांग्रेस की एक समस्या है बड़ी उत्तर प्रदेश में बड़ी भयंकर है चाहे लू प्रसाद अध्यक्ष हो चाहे अजय राय हो चाहे भगवान जोशी हो समस्या ये है कि प्रदेश में लड़ाई होती है कशमकश होती है समाजवादी पार्टी से या कभी बात चलती है बहुजन समाज पार्टी की तो उनके नेता तो क्योंकि सुप्रीम है वो डिसीजन ले लेते हैं अब कांग्रेस के अध्यक्ष को क्या पता प्रदेश अध्यक्ष को कि हम क्या बोले और क्या हो जाए कई बार आप देख चुके हैं कि नौकरियां चली गई इसी चक्कर में तो अब समस्या क्या है कि अजय राय मान लीजिए बोल दे कोई ऐसी बात बोल दे जिससे अखिलेश नाराज हो और कल को राहुल गांधी से अड़ गए कि भाई ये तो बोला हमारे पिताजी के बारे में ऐसा बोल दिया वो अध्यक्ष रहेंगे तब तक हम कोई समझौता नहीं तो नौकरी चली जाएगी अध्यक्ष की तुरंत पूरा अध्यक्ष बदला जाएगा समस्या
क्या अब रायबरेली से अखिलेश जा रहे थे इसकी सूचना तीन चार दिन से तो सभी को हो गई थी लगभग लगभग वैसे हफ्तों से प्रोग्राम बना हुआ कांग्रेस हाई कमांड का ये काम था या के वेणु गोपाल जो वहां संभालते हैं मेन सारा काम ये जो भी लोग हाई कमांड में कांग्रेस करते हैं हम छोड़ दीजिए राहुल गांधी सोनिया गांधी प्रियंका गांधी को उनको एक गाइडलाइन दे देनी चाहिए थी अजय राय को कि आपको क्या बोलना है और वो राहुल गांधी को कम्युनिकेट कर देनी चाहिए थी कि आपको क्या क्या बुलवाने वाले हैं वहां इस बात को? अच्छा वहां ये सब कुछ होता ही नहीं है। अचानक से कुछ हो जाएगा। अच्छा प्रदेश अध्यक्ष बेचारा क्या करेगा? प्रदेश अध्यक्ष क्या करेगा? प्रदेश अध्यक्ष यही तो करेगा कि वो अब कुछ तो बोलेगा कि कल को वो कुछ ना बोले अजय रायबरेली से यात्रा निकल रही है कांग्रेस के गढ़ से और वो कुछ ना बोले स्वागत कर दे तो कल जो और कांग्रेसी होंगे नीचे या प्रदेश के वो जाके शिकायत करेंगे साहब वो तो अखिलेश के ही चरणों में लेट गए। अभी से वो लेटे जा रहे हैं। ये जो समस्या है कांग्रेस की वो ही सारी समस्या कम्युनिकेशन की। अब बीजेपी में ऐसा नहीं होता। देखिए अभी यही बात आप देखिए बीजेपी में कहीं कुछ होना होगा तो प्रदेश अध्यक्ष को ऊपर से तुरंत गाइडलाइन दे दी जाएगी कि आपको क्या कहना है। अगर अगर कांग्रेस पार्टी का आंदोलन हो रहा है तो उत्तर प्रदेश के नेताओं को बोलना है नहीं बोलना है। ये गाइडलाइन आ जाएगी।
गाइडलाइन आ जाएगी कि आप नहीं बोलेंगे जो बोलना है अमित शाह बोलेंगे या जो बोलना योगी बोलेंगे केशव मौर्य बोलेंगे आप लोग कुछ नहीं बोलेंगे आप कभी प्रदेश अध्यक्ष भाजपा के कमेंट का सुनते हैं वो जब तक गाइडलाइन आते हो जाए कुछ नहीं बोलते ये कांग्रेस की अपनी समस्या जो मैं आपको बता रहा था अभी देखिए हो सकता है अजय राय जी की कुर्सी इसी में चली जाए तो बेचारे कुछ ज्यादा शायद मान अभी जो कमेंट किया उन्होंने कि हम भी सफेद से करेंगे हम भी कन्नौज से करेंगे अब मान लीजिए अभी कोई बात ना हो अखिलेश नाराज ना हो राहुल गांधी कोई ध्यान ना दे अजय राज जी का लगेगा जोश बढ़ जाएगा वो जोश में आगे कुछ और भी कह देंगे चुनाव आ ही रहा है तब उनका सीना पत्ता कर जाएगा ये समस्या कांग्रेस की है ये तो मैं कांग्रेस की बात कर रहा जो बात हो रही थी कन्नौज से जाएंगे मेन समस्या क्या है कि चुनाव की कमान है अखिलेश के पास उत्तर प्रदेश में भाजपा को रोकने का जिम्मा है अखिलेश के पास अखिलेश इस बात को साबित करना चाहते हैं कि जो कोई देखिए जो वोट है ना वो वोट दो भागों में बटा हुआ है उत्तर प्रदेश एक वो है जो भाजपा समर्थक है या नहीं भी है और एक वो है जो कट्टर भाजपा विरोधी है इसमें आप एक बड़े समुदाय को शामिल कर लीजिए और शामिल कर लीजिए वो वो कट्टर है वो भाजपा को हराने के लिए वोट देंगे तो उनकी नजर में कौन कौन आगे? उनकी नजर में अगर अखिलेश ही वो सारा काम कर रहे होंगे तो वो कांग्रेस को नहीं भी अगर साथ लेते या किसी ऐसी मुकाम पर कि कांग्रेस में खचखच हो जाती है और कांग्रेस अलग चिटक के लड़ती है चुनाव तो कांग्रेस को वोट मिलना मुश्किल हो जाएगा। वो ऐसी स्थितियां अखिलेश लाना चाहते हैं। इसीलिए उनके गढ़ से गए। अब गढ़ से जा के भी अगर देंगे वो कहेंगे चार सीटें हमारी है वो तीन सीटें दे देंगे जो पिछले बार भाजपा ने जीती थी दे देंगे मुझे लगता है शायद छ या सात सीटें हैं वहां वो वहां दे देंगे कि भाई आप लड़ लो उनको तो मालूम है कि वो भाजपा फिर जीत लेगी वो अपनी सीटें एक तो जीती हुई सीट कभी भी समझौते में कोई पार्टी दूसरी पार्टी को नहीं देती ये आपको मैं बता दूं भले उसके चारों आदमी भाग ये कभी नहीं होता तालमेल सीट तालमेल में कि जिस पार्टी ने वो सीट जीत रखी की है वो अदला बदली हो जाए अलग बात है लेकिन वो देती नहीं कभी तो अखिलेश के पास बहुत सारी चुनौतियां है उनसे जा चुकी है इस वर्ष भाजपा राजभर भी नहीं है पिछले विधानसभा के हिसाब से तो भाजपा का जो गुट है वो एंटी इनकंबेंसी से तो जूझेगा उसके विधायकों की उपयोगिता से जूझेगा लेकिन वो अपने को इंटैक्ट रख पा रहे हैं इस बात से अखिलेश परेशान भी है थोड़ा कि उनके कोई झगड़ा नहीं हो रहा। ओम प्रकाश राजभर भाजपा के समर्थन में बोल रहे हैं। निषाद जी भाजपा के समर्थन में बोल रहे हैं। जयंत चौधरी भाजपा के समर्थन में बोल रहे हैं। उनका कोई गुट टूटने के कगार पर नहीं है। तो अखिलेश ने समझ लिया है ये जान लिया है कि अब ये लड़ाई हमको अकेले ही लड़नी है।
कांग्रेस साथ रहे तो अच्छा है। अगर वो ज्यादा बात देखिए अगर मैं आप सपोज मान लीजिए कांग्रेस 105 सीट मांग रही है। कांग्रेस को मान लीजिए पिछली बार इतनी सीट दे दी गई तो वो जो 105 सीट दी गई है कांग्रेस में सिर्फ 10 सीट नहीं निकाल पाए यानी कि आप पूरे पूरे 95 सीट छोड़ दे रहे हैं भाजपा को जीतने के लिए मतलब वो 95 से शुरू करेंगे जैसे ममता बनर्जी के बारे में नहीं कहती 78 से शुरू करेंगे तो वो यहां 95 से शुरू करेंगे अखिलेश उस बात को समझते हैं लेकिन वो कांग्रेस को समझा नहीं सकते यही सारी दुविधा लेकर रायबरेली से जाना मनोज पांडे का फैक्टर
कांग्रेस का फैक्टर ये सब लेकर के अखिलेश निकले और बहुत समझदारी भरा कदम इस अखिलेश यादव की राजनीतिक चतुराई का कायल हुआ लेकिन सर एक ये तो आप मानेंगे कि जिस तरीके से ठीक है अखिलेश यादव ज्यादा सीटें जाहिर तौर पर अपने पास लड़ना चाहेंगे क्योंकि बड़ी ताकत उत्तर प्रदेश में लेकिन जिस तरीके से एक अल्पसंख्यक वोट है चाहे दलितों का वोट है जो जो कांग्रेस के पीछे अब लामबंद होता हुआ नजर आ रहा। तो क्या अखिलेश के लिए आसान है कांग्रेस को भी इग्नोर कर पाना? देखिए अल्पसंख्यों का वोट कांग्रेस के पीछे लामबंद नहीं हो रहा है। अल्पसंखों का वोट उसी के पीछे लामबंद होगा जो भाजपा को हराएगा। ये सीधी बात है। इसमें कोई लांग लपेट के नहीं है। अगर सक्षम पार्टी सपा है तो सारे अल्पसंखों का वोट सपा की तरफ जाएगा। इसमें कोई ना कोई अगर इसमें कोई भी अतिशक्ति समझ रहा हो तो मैं उसको मानता नहीं हूं। यादव समुदाय का वोट और अल्पसंख्यक सीधे सीधे कहिए मुस्लिम उनका पूरा वोट अखिलेश के पास जाएगा। अगर कांग्रेस को अपनी इज्जत बचानी होगी, नाक बचानी होगी तो वो अखिलेश का साथ नहीं छोड़ेंगे क्योंकि उसके जरिए उनको थोड़ा जो सीटें मिलेगी उस अल्पसंख्यक वोट भी मिलेगा। उससे उनका परसेंटेज बढ़ जाएगा।
जैसे कहते है ना परसेंटेज बढ़ गया। 24 में उनका परसेंटेज क्यों बढ़ गया? क्योंकि अखिलेश के साथ उन्होंने सीटें भी जीती और जो मुस्लिम वोट उनको मिला उससे उनका परसेंटेज बढ़ गया कि उनको अधिक मतदान हुआ। अगर अलग लड़ेंगे जैसे प्रियंका गांधी के समय में लड़े थे तो आप समझ बुरा हश्र होगा कांग्रेस का जैसा बसपा का हो रहा है तो इसलिए मुझे नहीं लगता कि अल्टीमेटली जो कांग्रेस जो है वो मानेगी किसी तरीके से भी क्योंकि अकेले लड़ना उसके लिए उत्तर प्रदेश में बहुत ही घातक साबित है। बिल्कुल और जो मौजूदा स्थिति है इस समय जिस तरीके से कल दो दिन से आपने चुनाव
आयोग वाला एपिसोड देख ही रहे हैं और राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस अब सारे विपक्षी दल अब का बयान आ रहा है ज्ञानेश कुमार को जाना चाहिए और जब विपक्षी एकता ही अगर नहीं रहेगी तो फिर तो ये लड़ाई वैसे ही बीजेपी के लिए और सेफ हो जाएगी। वही तो मैं कह रहा हूं ना कि देखिए अखिलेश को एक चुनौती समझ लीजिए मिली कि इस बार बीजेपी के गढ़ में कोई टूटन नहीं हो रही है अभी तो तो नहीं लग रही है वो संभाले हुए हैं ना संजय निषाद इधर जा रहे हैं ना इधर उधर जा रहे हैं ना उम्र प्रकाश राजभर इधर उधर जा रहे हैं ना अनुप्रिया पटेल जा रही है ना जयंत चौधरी हिल रहे हैं सब इमैक्ट है इन सब बातों के बावजूद कि इस तरह के आरोप लग रहे कि मस्जिद गिराई इस तरह के आरोप लग रहे हैं कि अत्याचार हुआ दलित बेटी के साथ। ये सब होने के बावजूद भी वो नहीं जा रहे। इसका मतलब जमीनी धरातल पे इन छोटी छोटी पार्टियों को ये लगता है कि भाजपा के साथ रहने पे उनका वोट भी उनके साथ है। ये देखिए अब ये जब समस्या ये है कि संजय निषाद को भी लगता है कि निषाद वोट मेरे पास है और भाजपा का प्लस वोट करके हम बहुत अच्छी सफलता निकाली जाएंगे। तो उनको फायदा मिल रहा है वो इंटैक्ट है तो अखिलेश अब अखिलेश जी तो कर नहीं सकते एकदम से जाके वो क्या प्रलोभन प्रलोभन दे तो सकते हैं जितना सत्ता पार्टी तो प्रलोभन दे भी सकती है जो विपक्ष में वो क्या प्रलोभन देगा सत्ता पार्टी से तभी लोग भागते हैं जब उसके हारने का खतरा लोगों को दिखाई पड़ रहा होता है छोटी पार्टियों को हारने वाले तब वो भागते हैं यदि वो नहीं भाग रहे हैं तो इसका मतलब है कि अभी उनको मजबूती दिखाई पड़ रही है। अब अखिलेश के पास दूसरा टारगेट ये है कि कम से कम सीटें कांग्रेस को दी जाए जिससे कि बीजेपी का शुरुआती खाता ज्यादा लंबा ना खुल जाए।
आप मेरी बात समझिए इस बात बहुत बड़ी इंपॉर्टेंट बात है कि अगर मान लीजिए कांग्रेस को 90 सीट भी दे दे या कांग्रेस को 100 सीट भी दे दे तो 100 सीट में से कांग्रेस सिर्फ 10 सीटों पर अपना वर्चस्व दिखा पाएगी और वो जो 90 सीटें होंगी या 85 सीट आप मान लीजिए उनमें भाजपा का खाता सीधे वहीं से खुलेगा। क्योंकि वो 85 वो जीत लेगी सपा की नाम मौजूदगी से। तो इसके कारण जो है अखिलेश इस बात को भी दिखाना चाहते हैं कि हम बड़े खिलाड़ी है और मुझे लगता है जो मेरा कयास है वो मेरा कयास ही हो सकता है कि अखिलेश कांग्रेस से गठबंधन करने में इच्छुक तो दिखाई पड़ेंगे। अंतिम समय तक दिखाई पड़ेंगे। लेकिन अगर किसी वजह से गठबंधन नहीं हो पाया तो अखिलेश इसका दोष कांग्रेस पे ही मंगेंगे। जिससे कि अल्पसंख्यक वोट पूरी तरह से उनके पीछे रहे यादव वोट उनके पीछे अंट रहे तो कांग्रेस के पास बचा ही क्या वोट के लिए अब ये बताइए ना वो बचा ही गया उनके पास वोट वो एक दो बहुत ही बुरी हालत में हो जाएंगे तो कांग्रेस की हालत सबसे खराब है इस समय मैं आपको उत्तर प्रदेश में बता दूं आप रहमो करम पे अगर मैं इस शब्द का सही इस्तेमाल समझता हूं तो मैं ये कह रहा हूं कि कांग्रेस सपा के रहमो करम पर है अगर सपा वाले उनको ठीकठाक न्याय उचित सम्मानजनक सीटें दे दे तो यही उनके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है।
बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। तो जाहिर तौर पर आपने सुना सिद्धार्थ जी आपने थोड़ा जाइन किया। नवीन जी साफ तौर पे कह रहे हैं कि कहीं ना कहीं कांग्रेस एक एक तरह से बैकफुट पर है और एज तो अखिलेश यादव जाहिर तौर पर बड़ी सबसे बड़ी ताकत वो बीजेपी के सामने वही है तो उनके पास होगा और यह संभव भी नहीं है कि वो इतनी ज्यादा सीटें दे दे कि जहां से बीजेपी की शुरुआत हो उतने सीटों से तो क्या लग रहा है आपको नेगोशिएशन जो दोनों दलों के बीच अब तो बहुत कम समय रह गया सितंबर का महीना खत्म है मुझे लगता है कि शायद जनवरी आखिर तक मॉडल ऑफ कोड ऑफ कंडक्ट शायद लागू भी हो जाए फरवरी और मार्च में तो क्या समझ में आ रहा है सीटों का नेगोशिएशन को लेकर क्या आपको सुनाई दे रहा है वहां पे नहीं ये बिल्कुल बात सही है कि कांग्रेस कांग्रेस का यूपी में जो प्रेजेंस है वो एकदम डिक्लाइन पे तो बिल्कुल है लेकिन एक चीज और समझने वाली बात ये होगी कि अ समाजवादी पार्टी का जो एक कोर वोटर बेस रहा है मुस्लिम और यादव उसके बियोंड जाने की कोशिश है जो कि 2024 में जिसका रिजल्ट भी मिला उनको जो कि उनकी पीडीए है। अब पीडीए में जो डी है यानी दलित वोट है वो एक्चुअली बहुत ही बड़ा गेम चेंजिंग चीज है यहां पे।
उसमें अगर देखा जाए जो ट्रेडिशनली जो दलित है वो यादव के साथ नहीं जाता है। इंडिपेंडेंटली जब भी एसपी अगर जीती है तो खास रिजर्व सीट्स में वहां पे और खास करके जाट वोट्स जो है वो तो यादव के साथ जाना महिला की बिल्कुल की एक तरीके से वो ब्राह्मण के साथ चले जाएंगे ठाकुर के साथ चले जाएंगे। इसी वजह से हमने देखा कि जो मायावती बीएसपी का डिक्लाइन है जो होलसेल वोट ट्रांसफर सोचा गया था कि गठबंधन या सपा की तरफ आएगा वो ना होके वो डिवाइड हुआ है और बीजेपी को भी उसका एडवांटेज मिला है और कहीं ना कहीं जो सीट शेयरिंग को लेके अगर कंसेंसिस नहीं स्ट्राइक कर पाए तो वो बीजेपी को ही फेवर
करेगा बिकॉज़ वही वो चीज एक्सजेक्टली चाह रहे हैं कि दलित जो वोट है वो और डिवाइड हो और उसका फायदा बीजेपी को मिले। तो अगर सपा और अखिलेश यादव खास करके दलित वोट चाहते हैं तो उसके लिए उनको कांग्रेस की कुछ तो डिमांड्स के साथ आई थिंक एक कंसेंस बनाना पड़ेगा। हालांकि कांग्रेस को भी समझना पड़ेगा कि कार्डर जो है वो एसपी का ज्यादा स्ट्रांग है। कांग्रेस का कार्डर जो है वो एक तरीके से बिल्कुल विजनलेस है। लीडरलेस है क्योंकि एक स्टेट लीडरशिप बिल्कुल यहां पर दिखती नहीं है। जो कुछ है वो हाई कमांड दिल्ली से आता है। तो यहां पे एक तरीके से लैक ऑफ कम्युनिकेशन है। तो ये एक बहुत इंपॉर्टेंट पॉइंट है जिसको आई थिंक अखिलेश यादव सपा को देखना चाहिए कि जो जाट ऑफ वोट है जो आज भी मायावती 44% जाटव वोट्स हालांकि वो सीट एक भी नहीं जीती लेकिन 204 में 44% जाटव वोट्स जो है वो मायावती को ही है। 2022 में भी अगर देख 58% जाटव वोट्स मायावती के पास आज भी है। हालांकि जब मायावती और बीएसपी आज अपने फ्यूचर को लेके अपने भविष्य को लेके संकट में है तो वह वोटर कहीं ना कहीं देखना चाह रहे हैं कि अब मेरा अगला घर कहां है और वो घर अखिलेश यादव दिखाना चाह रहे हैं और वो कांग्रेस के साथ कांग्रेस अकेले अपने आप यूपी में एक तरीके से नॉन एक्सिस्टेंट हम कह सकते हैं लेकिन जब वो एक कोलेशन में आती है जब वो एक गठबंधन में आती है तो वो एक कॉन्फिडेंस स्ट्राइक करती है दलितों में भी और मुस्लिम वोट में भी और ये भी हमको देखने वाली बात है कि एक प्रॉपर मुस्लिम वोट वोट कंसोलिडेशन जो है उसके लिए भी सपा को कांग्रेस का साथ जरूरी होगा। क्योंकि अभी भी 79% के आसपास जो वोट जाते हैं सपा को जाते हैं लेकिन 11% 15 से 11 से 15% वोट कट जाते हैं। उसमें छोटे-छोटे प्लेयर्स ही है ओसी है लेकिन वो कहीं ना कहीं हर्ट करते हैं। तो यहां पे जो बात है एक एक सीट और एक एक परसेंटेज इसको कैलकुलेट करके वो बीजेपी का जो स्ट्रांग सोशल कोशन है उसको काउंटर किया जा सकता है। तो आपकी बात बिल्कुल सही है कि ग्राउंड कैंपेनिंग भी जरूरी है। मुश्किल से दो तीन महीने बचे हैं जहां पर मोरल कोड ऑफ कंडक्ट लग जाएगा। तो इस इस कंसेंससेस पे जितनी जल्दी वो आएंगे उतना जल्दी गठबंधन के लिए सही होगा। ये हालांकि मेरा एनालिसिस कहता है। बिल्कुल बिल्कुल सही फरमा रहे हैं आप और मुझे भी लगता है सर आप लोग भी दोनों सहमत होंगे कि ऐसा समाजवादी पार्टी बड़ी ताकत है। वैसे ही आरजेडी भी बिहार में एक बड़ी ताकत थी। तृणमूल कांग्रेस भी बड़ी ताकत थी।
लेकिन शायद कांग्रेस एक एक फैक्टर का काम करती है। वो जो एडेड एडवांटेज जो होता है और वो शायद एडेड एडवांटेज का काम करे समाजवादी पार्टी के लिए अगर बीजेपी जैसी एक बड़ी चुनावी मशीनरी को हराना है। अगर जी सर आप कुछ कहना चाह रहे हैं। आप जोड़िए सर अपनी बात मैं ये कह रहा था कि देखिए समस्या ये है कि हम लोग कई बार राजनीतिक व्यवस्थाओं को पुराने तरीके से समझने की कोशिश करते हैं। व्यवस्थाएं बदल रही है और मतदाता का कम्युनिकेशन बहुत ज्यादा बढ़ चुका है आज के टाइम में। आप आप ये नहीं कह सकते कि जो नेता कहेगा मतदाता वो समझेगा। मतदाता अपनी
तरह से भी बहुत कुछ समझता है। तो अब आप ये देखिए यूपी में जैसे 10 साल का इनका मतलब सत्ता विरोधी वोट हो चुका है। वो वोट एक मु है। भले ही पार्टियां आपस में गठबंधन ना करे। मान लीजिए कांग्रेस और सपा गठबंधन ना भी करे लेकिन वोट ने गठबंधन कर लिया है। जिसको भाजपा के खिलाफ वोट देना है उसको सत्ता से बाहर करना है वो एक ही तरफ वोट करेगा। वो अगर तीन पार्टियां भाजपा का विरोध कर रही होंगी तो उनमें वो डिवाइड नहीं करेगा। ये आप समझ लीजिए ये नया नया फार्मूले शुरू हो गए। हम अगर भाजपा विरोधी है। मैं अगर योगी विरोधी हूं। मैं अगर मोदी विरोधी हूं तो मैं लास्ट मूवमेंट पे ये देखूंगा कि कौन सी पार्टी उसको हराने में सक्षम है। भले ही मेरा कुछ वैचारिक मतभेद हो लेकिन मेरा मतभेद क्योंकि सत्ता बदलने में ज्यादा है। तो मैं उस पार्टी के लिए भी तैयार हो जाऊंगा जिसको मैं नंबर टू की पसंद रखता हूं। तो ये जो अब एक नया मतदाता क्योंकि मोबाइल आने के बाद कम्युनिकेशन के इतने सारे माध्यम आने के बाद लोग अपनी राय अलग-अलग बड़ी तेजी से बनाते हैं। तो उसको भी आपको ध्यान में रखना चाहिए। कोई ये जरूरी नहीं है कि अगर एक एक ही राय पे मतलब ये वोट बटने वाले में हो सकता है जाटव वोट में बट रहाव हो या लेकिन एक अगर मान लीजिए कोई ब्राह्मण समाज ने मान लीजिए ठान लिया। सपोज मानिकल बात कहता हूं मान लिया हम भाजपा को एक बार सबक सिखाएंगे ये हमारी अनदेखी करते हैं सोच के कि हम इनको वोट दे ही देते हैं तो वो ये नहीं देखेगा कि उसको वोट किसे देना है आप ये देख चुके हैं वो बसपा को भी एक बार वोट दे चुका है तो अब वो ये देखेगा कि इनको हराना लेकिन जैसे 24 में हुआ ना बहुत सारे लोगों ने कहा कि राजपूत ने वोट नहीं दिया उनको कुछ बात की शिकायत थी कुछ भी वो जो बाद में आई तो बाद में विश्लेषण हुए उन्होंने क्या किया वो वोट देने नहीं गए इससे भी तो आपको लॉस हो जाता है ना कभी
कभी कि भाई हमारा मतदाता नाराज हो गया वोट देने नहीं गया वो नोटा पे चला गया या उसने आपके विरोध में भी वोट डाल दिया ये नहीं देखा कि उसके वोट से होने क्या जा रहा है कि सत्ता किसको मिलने जा रही है तो अब हमारा मैंने इसलिए इंटरसेप्ट किया कि अब ये नई नया सिस्टम भी आ गया है कि हम इस बात को भी समझे कि मतदाता गठबंधन कर लेता है। मतदाता आपस में गठबंधन कर लेता है। पार्टी करे चाइना बिल्कुल बड़ी बात आप कह रहे हैं। तो जाहिर तौर पर अगर एंटी इनकंबेंसी अगर फैक्टर होगा तो जाहिर तौर पर जनता का रुख साफ तौर पर होगा। उसने मन में बना भी लिया होगा और जो फ्लोटिंग जो परसेंटेज होता है वो थोड़ा बहुत फैक्टर होता है जो कि एक काम करता है। तो आप दोनों का बहुत-बहुत शुक्रिया। आपने उत्तर प्रदेश में जो राजनीति चल रही है और खासतौर से अखिलेश यादव और कांग्रेस के बीच जो स्थिति है उस पर विस्तार से आप दोनों ने बात रखी। नवीन निगम जी और सिद्धार्थ तिवारी जी बहुत-बहुत शुक्रिया आप इस चर्चा में जुड़े और फिर किसी अन्य विषय पे हम उत्तर प्रदेश से जुड़े राजनीतिक मुद्दों पर आपसे जुड़ेंगे। बहुत-बहुत धन्यवाद इस चर्चा में आप दोनों का जुड़ने के लिए। तो दर्शकों आपने देखा हमने चर्चा की।
जिस तरीके से अखिलेश यादव ने रायबरेली से अपनी पीडीए यात्रा की शुरुआत की है और उसको लेकर बयानबाजी भी हो गई है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने थोड़ा तंज भी कसा है और लेकिन देखना होगा इसको किस तरीके से दोनों अखिलेश यादव और कांग्रेस में भी जो निर्णय लेता है वह हाई कमांड लेता है और दोनों के बीच किस तरीके का समन्वय होता है। अगले विधानसभा चुनाव के लिए सीट शेयरिंग को लेकर कहा जा रहा है कि पर्दे के पीछे बातचीत शुरू हो चुकी है। लेकिन इन सब का नतीजा क्या निकलता है? लेकिन कांग्रेस के गढ़ में जाकर अखिलेश यादव ने अपनी पीडीए यात्रा निकाली है। इसको लेकर एक तरह से यूपी में जरूर विवाद शुरू हो चुका है और विपक्ष को भी भारतीय जनता पार्टी को इस पर तंज कसने का मौका मिल गया है। तो आज आपको हमारी ये चर्चा कैसी लगी कमेंट बॉक्स में जाकर जरूर कमेंट करिए और द फेडरल देश के YouTube चैनल को आपने अभी तक सब्सक्राइब नहीं किया है तो उसे जरूर सब्सक्राइब करें।

