BoB का ₹35,715 करोड़ का लोन राइट-ऑफ, रिकवरी सिर्फ 28%; नाम गुप्त क्यों?
'सियासत' में मनीष कुमार का विश्लेषण: BoB ने 6 साल में 35,715 करोड़ का लोन राइट-ऑफ किया, रिकवरी सिर्फ 28%। बड़े कर्जदारों के नाम छिपाने पर खड़े हुए सवाल।
Siyasat: द फ़ेडरल देश के विशेष शो सियासत में एंकर मनीष कुमार ने देश के सरकारी बैंकों में बड़े कर्जदारों और लोन डिफ़ॉल्ट से जुड़ी खबरों का विस्तृत विश्लेषण किया है। यह विश्लेषण बैंकिंग सिस्टम में राइट-ऑफ, हेयरकट और रिकवरी के खेल पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ताजा मामला सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ऑफ बड़ौदा (Bank of Baroda) का है। पुणे के आरटीआई (RTI) कार्यकर्ता विवेक वेलणकर द्वारा मांगी गई जानकारी के जवाब में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि बैंक ने पिछले 6 सालों में ₹100 करोड़ या उससे अधिक बकाया वाले बड़े कर्जदारों के ₹35,715 करोड़ रुपये के कर्ज बट्टे खाते (राइट-ऑफ) में डाल दिए हैं। लेकिन इतनी बड़ी रकम राइट-ऑफ करने के बाद भी बैंक इन खातों से महज ₹9,946 करोड़ रुपये (लगभग 28 फीसदी) ही वसूल कर पाया है।
गोपनीयता का पर्दा: बैंक ने नाम सार्वजनिक करने से किया इनकार
हजारों करोड़ रुपये का कर्ज डूबने के बावजूद बैंक ऑफ बड़ौदा ने उन बड़े कॉरपोरेट डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक करने से साफ इनकार कर दिया है। बैंक ने इसके लिए सूचना के अधिकार (RTI Act) कानून की निजता और 'थर्ड पार्टी' से जुड़ी धाराओं का हवाला दिया है।
हजारों करोड़ का हेयरकट: इसी 6 साल की अवधि के दौरान 100 करोड़ रुपये से अधिक बकाया वाले मामलों में सेटलमेंट के वक्त बैंक ने कुल ₹7,817 करोड़ रुपये का हेयरकट (कर्ज माफी या छूट) लिया।
कब हुआ सबसे ज्यादा राइट-ऑफ: आंकड़े बताते हैं कि सबसे ज्यादा राइट-ऑफ वित्त वर्ष 2020-21 में (₹11,916 करोड़) और वित्त वर्ष 2021-22 में (₹11,261 करोड़) किए गए।
जब बैंक किसी खराब कर्ज को अपनी बैलेंस शीट को साफ करने के लिए बट्टे खाते में डालते हैं, तो इसे 'टेक्निकल राइट-ऑफ' कहा जाता है। नियमतः इसके बाद भी बैंक को कर्जदार से पैसा वसूलने की कोशिशें जारी रखनी चाहिए, लेकिन हकीकत में रिकवरी की दर बेहद निराशाजनक रहती है।
₹4.84 लाख करोड़ का एनपीए राइट-ऑफ: सरकारी आंकड़े
यह समस्या सिर्फ एक बैंक तक सीमित नहीं है। सरकार द्वारा राज्यसभा में पेश किए गए आरबीआई (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2021-22 से सितंबर 2025 तक देश के सरकारी बैंकों ने कुल ₹4.84 लाख करोड़ रुपये के एनपीए राइट-ऑफ किए हैं। इसमें वित्त वर्ष 2021-22 में ₹1.15 लाख करोड़, 2022-23 में ₹1.27 लाख करोड़, 2023-24 में ₹1.15 लाख करोड़, 2024-25 में ₹91,261 करोड़ और चालू वित्त वर्ष में सितंबर 2025 तक ही ₹35,096 करोड़ रुपये राइट-ऑफ किए जा चुके हैं।
99.97% तक हेयरकट: सुभाष चंद्रा और वीडियोकॉन का उदाहरण
एनसीएलटी (NCLT) और कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी प्रक्रियाओं के दौरान बैंकों द्वारा दिए जा रहे भारी-भरकम हेयरकट पर उद्योगपति हर्ष गोयंका ने भी सोशल मीडिया पर सवाल उठाए हैं। हाल ही में जी ग्रुप (Zee Group) के संस्थापक सुभाष चंद्रा के पर्सनल इनसॉल्वेंसी केस में एनसीएलटी ने एक रिपेमेंट प्लान को मंजूरी दी। इस मामले में देनदारों के कुल स्वीकृत दावे ₹22,006.57 करोड़ थे, लेकिन मंजूर योजना के तहत उन्हें केवल ₹6.5 करोड़ मिलेंगे—यानी बैंकों ने करीब 99.97% का हेयरकट झेला।
हर्ष गोयंका द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, वीडियोकॉन और उसके प्रमोटर्स के मामले में बैंकों ने 95.85% हेयरकट लिया, शिवा इंडस्ट्रीज के केस में 93.5%, संदेसरा ग्रुप के मामले में 73.6%, भूषण स्टील में 37% और एस्सार स्टील के मामले में 14% का हेयरकट लिया गया। इसके विपरीत केवल विजय माल्या के मामले में बैंकों ने दिए गए कर्ज से 128% अधिक रकम वसूल की।
बड़ा सवाल: बड़े डिफॉल्टरों पर मेहरबानी, छोटे कर्जदारों पर सख्ती क्यों?
बैंकिंग प्रणाली के इस दोहरे रवैये पर कई बुनियादी सवाल उठते हैं:
आम जनता की बचत: बैंकों में जमा पैसा किसी बैंक का निजी पैसा नहीं होता, बल्कि उसमें देश के करोड़ों आम जमाकर्ताओं की गाढ़ी कमाई और बचत शामिल होती है।
छोटे कर्जदारों पर शिकंजा: होम लोन या पर्सनल लोन की ईएमआई (EMI) चूकते ही छोटे कर्जदारों को रिकवरी नोटिस भेजे जाते हैं, उनकी संपत्ति नीलाम की जाती है और नाम तक सार्वजनिक कर दिए जाते हैं।
किसानों पर दबाव: कृषि कर्ज में डिफ़ॉल्ट होने पर वसूली की सख्त कार्रवाई शुरू हो जाती है, जिसके दबाव में आकर हर साल हजारों किसान आत्महत्या करने को मजबूर होते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब हजारों करोड़ रुपये का कर्ज राइट-ऑफ हो जाता है और बड़े कर्जदारों के नाम छिपाए जाते हैं, तो बड़े कर्ज मंजूर करने वाले बैंक अधिकारियों और बोर्ड की जवाबदेही कैसे तय होगी?
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