बिहार SC आरक्षण पर रार: चिराग vs मांझी, 20% दलित वोट पर सियासी जंग
SC आरक्षण में उप-वर्गीकरण पर केंद्र के दो मंत्री आमने-सामने। 'सियासत' में वरिष्ठ पत्रकार मनीष कुमार से समझिए बिहार जातीय सर्वे के आंकड़े और चिराग-मांझी का टकराव।
Siyasat: बिहार की राजनीति में अनुसूचित जाति (SC) आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण (Sub-categorization) और क्रीमी लेयर के मुद्दे पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में शामिल दो प्रमुख दलित सहयोगी दल आमने-सामने आ गए हैं। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान (अध्यक्ष, लोक जनशक्ति पार्टी - रामविलास) और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी (संस्थापक, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) के बीच जुबानी जंग इस कदर बढ़ गई है कि दोनों नेताओं ने एक-दूसरे से मंत्री पद से इस्तीफा देने तक की मांग कर डाली है।
डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के खास राजनीतिक विश्लेषण शो 'सियासत' में वरिष्ठ पत्रकार मनीष कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले, एससी आरक्षण के उप-वर्गीकरण, बिहार के जातीय सर्वे के आंकड़ों और 20 प्रतिशत दलित वोट बैंक पर वर्चस्व की इस जंग का विस्तृत विश्लेषण पेश किया।
विवाद की शुरुआत और दोनों खेमों का रुख
विवाद की शुरुआत तब हुई जब बिहार सरकार में मंत्री और जीतन राम मांझी के बेटे डॉ. संतोष कुमार सुमन ने एससी आरक्षण की समीक्षा और उप-वर्गीकरण का समर्थन करते हुए कहा कि आजादी के आठ दशक बाद यह देखना जरूरी है कि आरक्षण का लाभ किन जातियों तक पहुंचा और कौन अब भी हाशिए पर हैं।
चिराग पासवान का विरोध:
चिराग पासवान ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि एससी-एसटी आरक्षण गरीबी उन्मूलन योजना नहीं है, बल्कि इसका आधार सदियों से चला आ रहा सामाजिक भेदभाव और छुआछूत है। संपन्न हो जाने से जातिगत भेदभाव समाप्त नहीं हो जाता। चिराग ने तंज कसते हुए कहा कि यदि जीतन राम मांझी और उनके बेटे को क्रीमी लेयर की व्यवस्था इतनी ही उचित लगती है, तो वे पहले खुद आरक्षण का लाभ छोड़ें और मंत्री पद से इस्तीफा दें।
जीतन राम मांझी का पलटवार:
चिराग के बयान पर जीतन राम मांझी ने कड़ा पलटवार करते हुए कहा कि जो लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नहीं मानते, उन्हें संवैधानिक पद पर रहने का कोई हक नहीं है। उन्होंने कहा कि जो चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं, उन्हें गरीबों के दर्द का अहसास नहीं है। इस्तीफा देना है तो पहले चिराग पासवान अपनी मंत्रिपरिषद की कुर्सी छोड़ें।
बिहार जातीय सर्वे के आंकड़े: क्यों उलझी है दलित राजनीति?
शो 'सियासत' में वरिष्ठ पत्रकार मनीष कुमार ने बिहार के हालिया जातीय गणना के आंकड़ों के जरिए इस विवाद की जमीनी हकीकत को रेखांकित किया:
आबादी का अनुपात: बिहार में अनुसूचित जातियों की कुल आबादी लगभग 19.65 प्रतिशत है। इसमें पासवान समुदाय लगभग 5.31 प्रतिशत, रविदास/मोची समुदाय करीब 5.25 प्रतिशत और मुसहर समुदाय (जिससे मांझी आते हैं) करीब 3.08 प्रतिशत है।
सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी का अंतर: आंकड़ों के अनुसार, पासवान समुदाय के लगभग 99,230 लोग सरकारी नौकरियों में हैं (आबादी के अनुपात में लगभग 1.44 प्रतिशत), जबकि मुसहर समुदाय के केवल 10,261 लोग ही सरकारी सेवा में हैं (आबादी के अनुपात में मात्र 0.26 प्रतिशत)।
मांझी का तर्क: मांझी खेमे का कहना है कि आरक्षण का बड़ा लाभ कुछ सशक्त दलित जातियों तक सिमट कर रह गया है, इसलिए मुसहर जैसे अत्यंत पिछड़े और वंचित समुदायों को अलग से उप-वर्गीकरण के जरिए संरक्षण मिलना चाहिए।
चिराग की आशंका: चिराग पासवान का तर्क है कि दलित समाज को छोटे-छोटे जातीय खांचों में बांटने से उनकी सामूहिक राजनीतिक और सामाजिक ताकत कमजोर होगी।
संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान और तेजस्वी यादव का हमला
चर्चा के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत के हालिया बयान का भी उल्लेख किया गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि आरक्षण कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है और जो वर्ग इसके जरिए आगे बढ़ चुके हैं, उन्हें खुद आगे आकर दूसरों के लिए लाभ छोड़ने पर विचार करना चाहिए।
वहीं, बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस पूरे विवाद को भाजपा और आरएसएस की सोची-समझी रणनीति करार दिया। तेजस्वी ने आरोप लगाया कि भाजपा आरक्षण को खत्म करना चाहती है और इसके लिए चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे नेताओं का इस्तेमाल करके दलितों में फूट डलवा रही है।
नीतीश कुमार का 'महादलित' फॉर्मूला और 2027 की लड़ाई
विश्लेषण में बताया गया कि यह लड़ाई सिर्फ आरक्षण की तकनीकी समीक्षा की नहीं, बल्कि बिहार के दलित नेतृत्व की है:
नीतीश का पुराना प्रयोग: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने शुरुआती शासनकाल में रामविलास पासवान के प्रभाव को संतुलित करने के लिए 'महादलित' की अलग राजनीतिक पहचान बनाई थी, जिससे जीतन राम मांझी एक बड़े नेता के रूप में उभरे।
दलित बनाम महादलित की वापसी: आज वही लड़ाई नए चेहरों के साथ चिराग पासवान बनाम जीतन राम मांझी के रूप में एनडीए के भीतर ही दोहराई जा रही है।
भाजपा के लिए धर्मसंकट: केंद्र की एनडीए सरकार के लिए यह सिरदर्द बन गया है, क्योंकि दोनों नेता सरकार के अहम सहयोगी हैं। एक तरफ दलित एकजुटता का सवाल है, तो दूसरी तरफ सबसे वंचित जातियों की हिस्सेदारी का।
निष्कर्ष
शो 'सियासत' के निष्कर्ष के अनुसार, बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति अब केवल 'अगड़ा बनाम पिछड़ा' तक सीमित नहीं रह गई है। दलित राजनीति के भीतर भी अब यह सवाल मुखर हो चुका है कि आजादी के इतने वर्षों बाद किसे कितना हिस्सा मिला और कौन पीछे छूट गया। आने वाले चुनावों में 20 प्रतिशत दलित वोट बैंक पर पकड़ बनाने की यह जंग और तेज होने के आसार हैं।
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