संविधान, संसद और मिशन 360: 41 सांसदों पर क्यों टिकी है बीजेपी की नजर?
क्या बीजेपी 2029 तक मिशन 360 का लक्ष्य हासिल कर पाएगी? दो-तिहाई बहुमत के लिए जरूरी संख्या, 41 सांसदों का गणित, विपक्ष की रणनीति और संसद के बदलते राजनीतिक समीकरणों का पूरा विश्लेषण इस वीडियो में जानिए।
360 सीटें, यह लक्ष्य कम और माहौल ज्यादा बनाने जैसा लगता है. सवाल यह है कि क्या बीजेपी सचमुच 360 सीटों तक पहुंचेगी या इस आंकड़े का इस्तेमाल चुनाव से पहले ही विपक्ष और मतदाता- दोनों पर मानसिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है?दो-तिहाई बहुमत सिर्फ सरकार बनाने के लिए नहीं चाहिए. संविधान में बड़े बदलावों के लिए चाहिए. इसलिए यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि अगर बीजेपी के पास अपनी संख्या पूरी नहीं हुई तो क्या संसद के भीतर संख्या पूरी करने के दूसरे रास्ते तलाशे जाएंगे?
क्या विपक्ष सदन में मौजूद रहेगा?
क्या उसे बोलने दिया जाएगा?
क्या सांसद निलंबित होंगे?
क्या वॉकआउट होगा?
क्या फिर कहा जाएगा कि देखिए, सदन ने बहुमत से फैसला कर दिया? सवाल केवल इतना नहीं है कि बीजेपी 360 सीटें लाएगी या नहीं।सवाल यह भी है कि अगर जनता ने 360 नहीं दिया, तो क्या संसदीय प्रक्रिया के भीतर कोई ऐसा रास्ता बनाया जाएगा, जिससे नतीजा फिर भी 360 जैसा दिखाई दे?
सबसे पहले समझते हैं कि दो-तिहाई बहुमत इतना अहम क्यों है। लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 543 है। अगर सभी सांसद सदन में मौजूद हों, तो किसी भी संवैधानिक संशोधन को पास कराने के लिए कम से कम 362 सांसदों का समर्थन चाहिए। इसे ही आम बोलचाल में सुपर मेजोरिटी कहा जाता है। यही वजह है कि पिछले कुछ समय से बीजेपी की ओर से पहले 400 पार और अब मिशन 360 जैसे लक्ष्य सामने आते रहे हैं। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अकेले 240 सीटें मिलीं। एनडीए के पास करीब 293 सांसद हैं। अगर टीएमसी के बागी सांसदों और शिवसेना के शिंदे गुट के सांसदों को जोड़ दिया जाए, तो यह संख्या करीब 313 तक पहुंचती है। यानी सुपर मेजोरिटी से अब भी करीब 41 सांसद कम हैं।
कहा जा रहा है कि अगर एनडीए को 41 और सांसदों का समर्थन मिल जाए, तो संवैधानिक संशोधन का रास्ता आसान हो सकता है। हालांकि, यह कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। यह सिर्फ संसदीय गणित और संभावित समर्थन के आधार पर किया गया राजनीतिक आकलन है।लेकिन क्या वाकई 41 सांसद टूट जाएंगे? यही सबसे बड़ा सवाल है।संविधान में दल-बदल विरोधी कानून मौजूद है। दसवीं अनुसूची के तहत कोई सांसद अपनी पार्टी छोड़कर सीधे दूसरी पार्टी में नहीं जा सकता। ऐसा करने पर उसकी सदस्यता भी जा सकती है।यानी आज के दौर में खुलेआम दल-बदल पहले जितना आसान नहीं रहा। लेकिन राजनीति में हर रास्ता सीधा नहीं होता। समर्थन देना अलग बात है, मतदान के समय गैरहाजिर रहना अलग। कई बार व्हिप की स्थिति अलग होती है और कुछ संवैधानिक मामलों में नियम भी अलग होते हैं।
जिन दलों के नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं, उनमें समाजवादी पार्टी, डीएमके, एनसीपी (शरद पवार), कुछ निर्दलीय सांसद और छोटे क्षेत्रीय दल शामिल हैं।लेकिन इन दलों की अपनी राजनीतिक मजबूरियां भी हैं। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी है। डीएमके तमिलनाडु में बीजेपी के खिलाफ सबसे मजबूत दल है। वहीं, शरद पवार की पार्टी महाराष्ट्र में कांग्रेस गठबंधन का अहम हिस्सा है।ऐसे में इन दलों के सांसदों का खुलकर बीजेपी के साथ आना फिलहाल आसान नहीं दिखता।
फिर दूसरा रास्ता क्या हो सकता है? यही सबसे अहम सवाल है। अगर विपक्ष के कुछ सांसद मतदान के समय सदन में मौजूद ही न रहें, तो क्या होगा? मान लीजिए, लोकसभा की प्रभावी सदस्य संख्या 543 की बजाय 500 रह जाए। ऐसी स्थिति में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा भी कम हो जाएगा। यानी जरूरी समर्थन की संख्या घट सकती है। संसदीय प्रक्रिया में कई बार ऐसा हुआ है कि सांसदों की गैरमौजूदगी ने नतीजों को प्रभावित किया है। हालांकि, हर संवैधानिक संशोधन के अपने नियम और अलग तरह का बहुमत तय होता है। इसलिए यह फार्मूला हर मामले में लागू नहीं होता। क्या पहले भी ऐसा हुआ है?संसद में कई अहम विधेयक विपक्ष की गैरमौजूदगी में पास हुए हैं। धारा 370 हटाने का फैसला, तीन तलाक कानून, जीएसटी और कई आर्थिक सुधारों के दौरान अलग-अलग हालात रहे।कई बार विपक्ष ने वॉकआउट किया, कई बार मतदान का बहिष्कार किया और कई बार संख्या कम पड़ गई।यानी संसद में सिर्फ मौजूद रहना ही नहीं, सही समय पर मौजूद रहना भी राजनीति का अहम हिस्सा है।अगर कोई यह सोच रहा है कि मिशन 360 सिर्फ सांसद जोड़ने का अभियान है, तो तस्वीर पूरी नहीं है। इसका असली लक्ष्य 2029 का आम चुनाव भी माना जा रहा है।
महिला आरक्षण कानून संसद से पास हो चुका है। लेकिन इसे लागू करने का रास्ता जनगणना और परिसीमन से होकर गुजरता है।परिसीमन के बाद कई राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या बदल सकती है।दक्षिण भारत लंबे समय से इस मुद्दे पर चिंता जता रहा है। वहां आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण का फायदा मिलने की बजाय उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी कम हो सकती है। दूसरी ओर, उत्तर भारत में सीटें बढ़ने की संभावना जताई जाती है।यही वजह है कि परिसीमन सिर्फ चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि संघीय व्यवस्था से जुड़ा बड़ा राजनीतिक सवाल भी है।उधर, सरकार लंबे समय से वन नेशन, वन इलेक्शन की बात कर रही है। इसके लिए भी कई संवैधानिक संशोधनों की जरूरत पड़ सकती है। यही कारण है कि सुपर मेजोरिटी का महत्व और बढ़ जाता है। अगर सरकार के पास पर्याप्त संख्या नहीं होगी, तो उसे विपक्ष के सहयोग की जरूरत पड़ेगी।
विपक्ष अच्छी तरह जानता है कि उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी संख्या है। इसलिए किसी भी अहम मतदान में वह अपने सभी सांसदों की मौजूदगी सुनिश्चित करने की कोशिश करेगा। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, टीएमसी, डीएमके, आरजेडी, शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (शरद पवार) जैसे दल अपने सांसदों को व्हिप जारी कर सकते हैं। यानी विपक्ष की एकजुटता सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।क्या बीजेपी के लिए यह रास्ता आसान है? बिल्कुल नहीं।क्योंकि उसके सहयोगी दलों की भी अपनी-अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं।टीडीपी, जेडीयू और एलजेपी जैसे सहयोगी हर मुद्दे पर एक जैसी राय रखें, यह जरूरी नहीं है। इसलिए सरकार को सिर्फ विपक्ष ही नहीं, अपने सहयोगियों को भी साथ रखना होगा।
अगर बात 2026 की करें, तो चुनौती बड़ी है। लेकिन अगर नजर 2029 के आम चुनाव पर है, तो मिशन 360 एक बड़ा राजनीतिक लक्ष्य है। बीजेपी देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है और उसका संगठन भी मजबूत है। वहीं, विपक्ष भी पहले के मुकाबले ज्यादा संगठित नजर आ रहा है। ऐसे में मुकाबला आसान नहीं होगा।मिशन 360 सिर्फ सीटों का आंकड़ा नहीं है। यह आने वाले वर्षों के बड़े राजनीतिक और संवैधानिक एजेंडे की तैयारी भी है।दूसरी ओर, विपक्ष की कोशिश होगी कि वह अपनी संख्या, एकजुटता और सदन में पूरी मौजूदगी के दम पर सरकार को सुपर मेजोरिटी हासिल करने से रोके।अब सबकी नजर संसद के आने वाले सत्रों पर होगी। कौन मौजूद रहेगा, कौन गैरहाजिर रहेगा, कौन सरकार के साथ जाएगा और कौन विरोध करेगा। यही तय करेगा कि मिशन 360 सिर्फ एक राजनीतिक नारा बनकर रह जाता है या सियासत का नया अध्याय लिखेगा।

