सियासत: राहुल के मुद्दे पर CJP का आंदोलन, कांग्रेस के लिए चुनौती?
राहुल गांधी लंबे समय से चुनाव आयोग और कथित “वोट चोरी” का मुद्दा उठा रहे हैं, लेकिन अब CJP ने इसी मुद्दे पर 48 घंटे का अल्टीमेटम देकर आंदोलन की घोषणा कर दी है। The Indian Express सवाल है कि CJP केवल एक दबाव समूह के रूप में अपना दायरा बढ़ा रही है या कांग्रेस समेत स्थापित विपक्ष के राजनीतिक और नैरेटिव स्पेस में भी जगह बना रही है?
क्या कॉक्रोच जनता पार्टी भारतीय राष्ट्रीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राजनीतिक जमीन में सेंध लगा रही है?.. आपने कई बार ऐसी सामाजिक रवायत देखी होगी ... जिसमें लोग अदब के साथ ...पहले आप पहले आप कहा करते थे.....लेकिन इन दिनों सत्ता की नई रवायत है ...पहले आप’ नहीं, ‘पहले मैं’? इन दिनों भारत की राजनीति में यही देखने को मिल रहा है. और इसका शिकार हो रही कांग्रेस... ये सवाल हम इसलिए उठा रहे क्योंकि बुधवार को जैसे ही ये सनसनीखेज खबर सामने आई कि चुनाव आयोग में कैसे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपने दोनों चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी को नजरअंदाज कर एक के बाद एक मनमाने फैसले ले रहे हैं जिसपर दोनों चुनाव आयुक्त ने 10 महीने 14 बार आपत्ति दर्ज कराई.
पूरा विपक्ष ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और गिरफ्तारी की मांग करने लगा. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ..पिछले डेढ़ सालों में ना जाने कितनी बार प्रेस कॉंफ्रेस कर चुनाव आयोग पर बीजेपी के लिए काम करने का आरोप लगा चुके थे और उनके रडार पर थे ज्ञानेश कुमार. ऐसे में पूरी उम्मीद थी चुनाव आयोग में मनमुटाव, SIR में वोटरों के नाम काटे जाने की खबरों को लेकर राहुल गांधी कभी भी प्रेस कॉंफ्रेस कर सकते हैं. लेकिन राहुल गांधी के प्रेस कॉंफ्रेस से ठीक पहले कॉक्रोच जनता पार्टी के तीन चेहरे अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका ने प्रेस कॉंफ्रेस कर दिया और 48 घंटे में ज्ञानेश कुमार के इस्ताफे की मांग करते हुए ये चेतावनी दी कि ऐसा नहीं हुआ तो जंतर मंतर 2.0 होगा. ये पहला मौका नहीं है कि कॉक्रोच जनता पार्टी ने काली बिल्ली के समान कांग्रेस और राहुल गांधी का रास्ता काटा हो. सीजेपी आँदोलन करेगी लेकिन कांग्रेस आज से देशभर में अलग अलग राज्यों में सड़कों पर उतर चुकी है.... तो आज सियासत में राजनीति के इस नए रवायत की बात करेंगे।
कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP ने अपने आंदोलन की शुरुआत देश की शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी, पेपर लीक और युवाओं के सवालों को लेकर शुरू की. जंतर-मंतर के आंदोलन ने उसे राष्ट्रीय पहचान दी. आंदोलन खत्म करने की शर्तों को लेकर सरकार के मंत्रियों को सीजेपी के प्रतिनिधियों के साथ कई राउंड की बातचीत करनी पड़ी. सीजेपी के बैनर तले आंदोलन का असर था कि शिक्षा मंत्री धमेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा. मोदी सरकार के 12 साल में पहली बार किसी मंत्री की जवाबदेही तय हुई और उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ा. जंतर मंतर पर आंदोलन खत्म हुआ तो कॉकरोच जनता पार्टी ने सरकारी स्कूलों में अव्यवस्था को लेकर “स्कूल ठीक करे” अभियान छेड़ दिया. इन दिनों हर बड़े राजनीतिक विवाद या मुद्दे पर सीजेपी की कमेंट्री आपको सुनने को मिलेगी.
लेकिन जैसे ही चुनाव आयोग में चुनाव आयुक्तों के बीच मनमुटाव और ज्ञानेश कुमार की तानाशाही की खबर इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुई CJP ने अपनी राजनीतिक सक्रियता का दायरा अचानक चुनाव आयोग, SIR और कथित “वोट चोरी” तक बढ़ा दिया है. 24 सितंबर को उसने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफे के लिए 48 घंटे का अल्टीमेटम दे दिया और ऐसा नहीं होने पर जंतर मंतर पार्ट 2.0 होगा और अभिजीत दीपके ने इस आंदोलन के तारीख की भी घोषणा कर दी है. ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा नहीं हुआ तो 2 अक्तूबर से सीजेपी देशव्यापी आंदोलन करेगी. कॉकरोच जनता पार्टी का फिलहाल चुनावी राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है. और ना ही एडीआर के समान वो चुनावों पर कोई कार्य करती है. लेकिन ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के मुद्दे पर CJP की राजनीति को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा होता है. क्या CJP अब सिर्फ युवाओं और शिक्षा के मुद्दों को लेकर दबाव बनाने वाला समूह है, या फिर वो विपक्षी दलों के राजनीतिक जमीन में भी अपनी जगह तलाश रही है जिस पर कांग्रेस और राहुल गांधी पहले से दावा कर रहे हैं?
क्या राहुल से पहले CJP की प्रेस कॉन्फ्रेंस संयोग है?
24 सितंबर की घटनाक्रम दिलचस्प है. चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेदों पर इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट आने के बाद विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर हमला तेज कर दिया. कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल पहले ही इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दे चुके थे और राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस भी होनी थी. राहुल गांधी चुनाव आयोग पर कथित “वोट चोरी” को लेकर पहले से लगातार आरोप लगाते रहे हैं. बिहार विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने तेजस्वी यादव के साथ वोट चोरी के आरोपों को लेकर यात्रा पर भी निकले थे. लेकिन राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले CJP मैदान में उतर गई. CJP संस्थापक अभिजीत दीपके ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ज्ञानेश कुमार से 48 घंटे में इस्तीफा मांगा और ऐसा नहीं होने पर “जंतर-मंतर 2.0” तथा देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी. क्या यह केवल मुद्दे की गंभीरता थी, या फिर कांग्रेस और देश के सबसे बड़ी विपक्षी दल के मुद्दे को राजनीतिक तौर पर हथियाने की कोशिश थी?
बाद में राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग की और चुनावी प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप भी लगाए. सीजेपी की प्रेस कॉंफ्रेस की यह टाइमिंग अपने आप में किसी राजनीतिक मिलीभगत या कांग्रेस-विरोधी रणनीति का प्रमाण नहीं है. लेकिन इसका राजनीतिक विश्लेषण जरूर हो गया. और इस विश्लेषण की दरकार की जरूरत पड़ी प्रेस कॉंफ्रेस के दौरान अभिजीत दीपके द्वारा दिए गए बयानों के चलते. क्योंकि अभिजीत दीपके के बयानों में सारे क्षेत्रीय दलों के नेता के नाम थे लेकिन कांग्रेस गायब थी? अभिजीत दीपके ने आरोप लगाया कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को लगा कि क्षेत्रीय दलों के चलते अपने दम पर उसे बहुमत नहीं मिला तो उसने मजबूत क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों को निशाना बनाया शुरू कर दिया. अभिजीत दीपके ने कहा बीजेपी ने महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और शरद पवार की NCP के साथ ममता बनर्जी, एमके स्टालिन, पिनराई विजयन और अरविंद केजरीवाल को निशाना बनाया. दीपके ने कहा कि ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और स्टालिन अपने विधानसभा में वोट काटे जाने के चलते हार गए. लेकिन इस हार में दीपके ने पिनराई विजयन का नाम भी जोड़ दिया. दीपके ने कहा कि वोट काटे जाने के चलते पिनराई विजयन के नेतृत्व वाली एलडीएफ की सरकार केरल में नहीं बनी.
तो ऐसे में सवाल उठता है क्या अभिजीत दीपके को ये पता नहीं कि केरल विधानसभा चुनाव में आमने सामने एलडीएफ और कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ के बीच मुकाबला था. पिनराई विजयन को बीजेपी ने नहीं वहां कांग्रेस ने शिकस्त दी है. तो क्या अभिजीत दीपके कांग्रेस पर चुनावी धांधली का आरोप लगा रहे? बड़ा सवाल ये है कि CJP ने अपनी कहानी में क्षेत्रीय विपक्ष के इतने नेताओं का नाम लिया, लेकिन कांग्रेस के उन नेताओं और उम्मीदवारों का क्या, जो चुनावी अनियमितताओं को लेकर खुद लगातार हार का आरोप लगाते रहे हैं? जबकि 2024 के लोकसबा चुनाव के बाद से लगातार राहुल गांधी वोट चोरी को अपनी राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बनाए हुए हैं. जबकि पहले ममता बनर्जी हों या कोई और कोई उनके साथ खड़ा नहीं था. जब खुद पर आई तो सब आज राहुल गांधी के साथ खड़े हैं? तो सवाल उठता है CJP के नैरेटिव में कांग्रेस उसी प्रमुखता से क्यों दिखाई नहीं देती है? सीजेपी का ये बयान किसी छिपे गठजोड़ का सबूत नहीं है. लेकिन CJP से यह पूछना तो बनता है कि उसने जितने उदाहरण गिनाये उसमें कांग्रेस कहा है?
अब ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर सीजेपी ने फिर से आंदोलन की धमकी दी है. यहीं से राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए असली राजनीतिक चुनौती शुरू होती है. राहुल गांधी महीनों से चुनाव आयोग को लेकर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन सड़क पर उसी मुद्दे का ज्यादा आक्रामक चेहरा CJP बन जाती है, तो कांग्रेस के लिए जरूर राजनीतिक समस्या खड़ी हो सकती है. अभिजीत दीपके ने आज सोशल मीडिया पोस्ट डाला जिसे पढ़कर साफ लग रहा है कि दीपके के निशाने पर कांग्रेस है. अभिजीत दीपके ने विपक्ष के लिए लिखा, हां, आप कह रहे हैं कि चुनावों में धांधली हो रही है. लेकिन अगर आप चुनावों में लगातार हिस्सा लेते रहे तो इससे चुनावों को मान्यता मिलेगी. लोगों के बीच संदेश जाएगा कि चुनाव सामान्य और निष्पक्ष तरीके से हो रहे हैं. शायद विपक्ष को डर है कि अगर वह चुनाव नहीं लड़ेगा, तो उसका राजनीतिक अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगी. लेकिन सवाल है कि आप किस अस्तित्व को बचा रहे हैं? जब आपके मुताबिक वोट चोरी हो रहे हैं, आपके विधायक और सांसद दूसरी पार्टियों में जा रहे हैं और आपकी पार्टियां टूट रही हैं, तो आप इस व्यवस्था में कब तक टिक पाएंगे?
अगर चुनाव में धांधली का मुद्दा गंभीर है, तो इसे सिर्फ उन्हीं राज्यों में नहीं उठाया जाना चाहिए जहां आपका राजनीतिक फायदा या नुकसान जुड़ा हो. किसी भी राज्य में, किसी भी पार्टी के साथ ऐसा हो, विपक्ष को एक जैसा रुख रखना चाहिए. एक तरफ आप कहते हैं कि चुनाव में धांधली हो रही है और दूसरी तरफ उन्हीं चुनावों में हिस्सा भी लेते हैं. इससे आपके अपने आरोप पर ही सवाल खड़ा होता है. इसलिए विपक्ष को तय करना होगा कि उसकी प्राथमिकता क्या है. केवल अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाना या देश की चुनावी व्यवस्था और लोकतंत्र के सवाल पर एक साफ रुख अपनाना. अगर विपक्ष सच में मानता है कि चुनावों में धांधली हो रही है, तो उसे इस मुद्दे पर स्पष्ट फैसला लेना होगा और ऐसे चुनावों में हिस्सा लेने या न लेने पर गंभीरता से विचार करना होगा.
अभिजीत दीपके के इस पोस्ट से साफ है कि उनके निशाने पर कौन है. लेकिन सवाल है कि CJP का एजेंडा इतनी तेजी से शिक्षा से राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति तक क्यों फैल रहा है? अगर शिक्षा व्यवस्था सुधारना उसका मुख्य एजेंडा था तो अब चुनाव आयोग उसकी प्राथमिक लड़ाई कैसे बन गया? और अगर CJP स्वयं को व्यापक राष्ट्रीय दबाव समूह में बदल रही है, तो फिर उसका कांग्रेस, SP, AAP, TMC और दूसरे विपक्षी दलों के साथ रिश्ता क्या होगा?
CJP के राजनीतिक रिश्तों को देखें तो तस्वीर और दिलचस्प हो जाती है. AAP नेताओं ने जंतर मंतर उसके आंदोलनों को समर्थन दिया. अरविंद केजरीवाल CJP के जंतर-मंतर आंदोलन में भी दिखाई दिए थे. दूसरी ओर CJP नेताओं का समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के साथ संवाद भी सामने आया. और हालिया DUSU चुनाव के बाद CJP ने विपक्षी वोटों के बिखराव पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI के प्रबंधन और विपक्षी रणनीति की आलोचना की.
यानी CJP एक तरफ विपक्ष के नेताओं के साथ संवाद करती है, दूसरी तरफ स्थापित विपक्ष की कमजोरियों पर हमला भी करती है. सीजेपी भले कोई राजनीतिक दल ना हो जिससे वो कांग्रेस की जमीन या वोट ताटे. लेकिन राजनीतिक जमीन केवल वोट नहीं होती. राजनीतिक जमीन मुद्दों की भी होती है. नैरेटिव की भी होती है. जनता के भरोसे और उस भरोसे को जीतने की भी जोती है. सड़क पर लड़ने की क्षमता की भी होती है. इस पैमाने पर CJP निश्चित रूप से उस स्पेस में प्रवेश कर चुकी है जहां कांग्रेस भी अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है.
हालांकि कमजोरी कांग्रेस की भी है उसे ये सोचना होगा कि उसके मुद्दे किसी दूसरे संगठन के आंदोलन में क्यों बदल रहे हैं?
राहुल गांधी जिस कथित “वोट चोरी” को महीनों से उठा रहे हैं, उसी पर 48 घंटे का अल्टीमेटम देने का राजनीतिक स्पेस CJP को कैसे मिल गया? 2 अक्टूबर से सीजेपी सड़कों पर होगी. राहुल गांधी ... छात्रों की गूंज कर रहे लेकिन युवाओं के असंतोष का नेतृत्व कांग्रेस के छात्र और युवा संगठन क्यों नहीं कर पा रहे? इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि CJP कांग्रेस की राजनीतिक जमीन में सेंध क्यों लगा रही है बड़ा सवाल है कि कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन पर इतनी जगह खाली क्यों छोड़ रही है कि कोई नया आंदोलन वहां इतनी तेजी से अपनी पहचान बना सके?

