पंजाब कांग्रेस विवाद, क्या 2022 की गलती फिर दोहरा रही है पार्टी?
पंजाब कांग्रेस में अध्यक्ष पद को लेकर विवाद ने हाईकमान की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं। क्या पार्टी फिर गुटबाजी और पुराने नेतृत्व संकट की राह पर है?
क्या कांग्रेस को अपनी सबसे पुरानी राजनीतिक बीमारी—गुटबाजी—का इलाज सचमुच नहीं मिलता, या फिर पार्टी के भीतर कुछ लोगों को यही बीमारी अपनी राजनीति का सबसे भरोसेमंद साधन लगती है?क्या हर चुनाव से पहले कांग्रेस अपने विरोधियों से लड़ने से पहले खुद से लड़ना शुरू कर देती है?क्या पार्टी के नेता यह मान चुके हैं कि टिकट से पहले विवाद, उम्मीदवार से पहले खेमेबंदी और चुनाव से पहले सार्वजनिक बयानबाजी एक जरूरी रस्म बन चुकी है?क्या 2022 की हार से पार्टी ने यह सीखा कि आपसी संघर्ष ने उसे सत्ता से बाहर किया था, या यह सीखा कि अगली बार संघर्ष को और अधिक सार्वजनिक तरीके से किया जाए?और सबसे बड़ा सवाल—कांग्रेस की लड़ाई आखिर बीजेपी और आम आदमी पार्टी से है, या उसकी सबसे कठिन लड़ाई अब भी कांग्रेस के भीतर ही चल रही है?
पंजाब कांग्रेस में एक बार फिर हलचल है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार विवाद मुख्यमंत्री की कुर्सी का नहीं, बल्कि प्रदेश अध्यक्ष पद का है। पर्यवेक्षक भेजे गए, नेताओं से राय ली गई, रिपोर्ट तैयार हुई। लेकिन आरोप वही पुराने हैं—सिफारिशें कुछ और थीं, फैसला कुछ और हुआ।यह कहानी नई नहीं है। सिर्फ चेहरे बदले हैं, पटकथा वही है और डर भी वही कि कहीं अंत भी 2022 जैसा न हो जाए। कांग्रेस की तीन सदस्यीय पर्यवेक्षक समिति ने पंजाब के लगभग 67 नेताओं से बातचीत की। अधिकांश नेताओं ने पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का समर्थन किया। लेकिन अंतिम फैसला आया तो अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को ही पद पर बनाए रखा गया।
मुद्दा यह नहीं है कि अध्यक्ष कौन होना चाहिए था। किसी भी लोकतांत्रिक दल में अंतिम निर्णय नेतृत्व का ही होता है। लेकिन सवाल यह जरूर है कि अगर नेताओं की राय पर विचार ही नहीं करना था, तो सलाह मांगी क्यों गई? अगर पर्यवेक्षक की रिपोर्ट निर्णायक नहीं थी, तो फिर इतने बड़े स्तर पर रायशुमारी का मकसद क्या था?
यही सवाल आज पंजाब कांग्रेस के भीतर गूंज रहा है और यही सवाल पिछले कई वर्षों से कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति का भी स्थायी हिस्सा बन चुका है। अगर कांग्रेस ने अपने इतिहास से सबक लिया होता, तो शायद पंजाब में 2022 जैसी राजनीतिक आत्मघाती स्थिति कभी पैदा नहीं होती।
2021 का साल याद कीजिए।कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री थे। कांग्रेस की सरकार बहुमत में थी, लेकिन पार्टी के भीतर सत्ता का एक समानांतर केंद्र बन चुका था। नवजोत सिंह सिद्धू लगातार कैप्टन अमरिंदर सिंह पर हमलावर थे। दिल्ली में बैठकों का दौर चलता रहा। पर्यवेक्षक आते रहे, रिपोर्ट बनती रही और बयानबाजी भी होती रही। लेकिन स्पष्ट और समय पर फैसला नहीं हुआ।धीरे-धीरे सरकार से ज्यादा कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई सुर्खियां बनने लगी। जनता विकास और शासन से कम, कांग्रेस की गुटबाजी से ज्यादा परिचित हो गई।आखिरकार कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाया गया। फिर मुख्यमंत्री के नाम पर सुनील जाखड़ और सुखजिंदर सिंह रंधावा जैसे नाम चर्चा में आए, लेकिन अंतिम क्षणों में चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया। यह फैसला ऐतिहासिक था। पंजाब को पहली बार दलित मुख्यमंत्री मिला।लेकिन क्या इससे कांग्रेस एकजुट हो गई?बिल्कुल नहीं।
कैप्टन अमरिंदर सिंह अलग हो गए। सिद्धू नाराज रहे। पुराने नेता अपने-अपने गुटों में बंटे रहे। चुनाव से पहले सरकार के पास मुश्किल से कुछ महीने थे, लेकिन जनता तक सरकार के काम कम और नेताओं की बयानबाजी ज्यादा पहुंची।नतीजा सबके सामने है। 2017 में 77 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2022 में सिर्फ 18 सीटों पर सिमट गई और आज तक उस झटके से पूरी तरह उबर नहीं पाई।
क्या कांग्रेस यह मान बैठी है कि जनता को इन झगड़ों से कोई फर्क नहीं पड़ता?राजनीति का अनुभव ठीक उल्टा कहता है। मतदाता सिर्फ सरकार का प्रदर्शन नहीं देखता, बल्कि विपक्ष की एकजुटता भी देखता है। जो पार्टी खुद को नहीं संभाल सकती, उस पर राज्य संभालने का भरोसा भी कमजोर पड़ जाता है। यही धारणा आखिरकार वोट में बदल जाती है।
कांग्रेस पर सबसे बड़ा आरोप सिर्फ गुटबाजी का नहीं, बल्कि उसकी निर्णय प्रक्रिया का भी है। पार्टी लोकतांत्रिक रायशुमारी करती हुई जरूर दिखाई देती है, लेकिन अंतिम फैसला अक्सर कुछ चुनिंदा नेताओं तक सीमित नजर आता है। पर्यवेक्षक भेजे जाते हैं, राय ली जाती है, रिपोर्ट तैयार होती है, लेकिन जब फैसले और रिपोर्ट के बीच अंतर दिखाई देता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
अगर आपको लगता है कि यह सिर्फ पंजाब की कहानी है, तो कांग्रेस के पिछले एक दशक के इतिहास पर नजर डालना जरूरी है।राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच शक्ति संघर्ष वर्षों तक चलता रहा। 2020 की बगावत ने सरकार को संकट में डाल दिया और 2022 में राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनाव के दौरान पार्टी अपने ही फैसलों को लागू कराने में असहज नजर आई।
छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और टी.एस. सिंह देव के बीच कथित ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले की चर्चा वर्षों तक बनी रही। आधिकारिक पुष्टि कभी नहीं हुई, लेकिन नेतृत्व को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं रही और संगठन लगातार प्रभावित होता रहा।हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी शैलजा के बीच नेतृत्व को लेकर समय-समय पर चर्चा होती रही। वहीं, कर्नाटक में सरकार बनने के बाद सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर कई दौर की बातचीत करनी पड़ी।
इन सभी राज्यों में एक बात समान दिखाई देती है। पहले पर्यवेक्षक भेजे जाते हैं। फिर नेताओं से राय ली जाती है। रिपोर्ट तैयार होती है। लेकिन अंतिम फैसला आने के बाद भी विवाद पूरी तरह खत्म नहीं होता।यहीं से कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती सामने आती है—हाईकमान संस्कृति। अंतिम निर्णय का अधिकार नेतृत्व के पास होना स्वाभाविक है। लेकिन जब राज्यों के नेताओं को यह महसूस होने लगे कि उनकी राय सिर्फ सुनी जाती है, मानी नहीं जाती, तब असंतोष धीरे-धीरे गुटबाजी में बदल जाता है। और जब संगठन चुनाव से पहले ही गुटों में बंट जाए, तो उसका असर चुनावी प्रदर्शन पर भी पड़ता है।
पंजाब का मौजूदा विवाद सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति का विवाद नहीं है। यह कांग्रेस की निर्णय प्रक्रिया की भी परीक्षा है।सवाल सिर्फ पंजाब का नहीं है।मुद्दा यह है कि क्या कांग्रेस हर चुनाव से पहले अपने भीतर ही एक नया विपक्ष खड़ा कर लेती है? क्या पार्टी अपने इतिहास से सीखकर अपनी निर्णय प्रक्रिया में बदलाव करेगी?या फिर हर राज्य में वही पुरानी पटकथा नए चेहरों के साथ दोहराती रहेगी?

