दिल्ली में DTC बस हड़ताल: घंटों इंतज़ार, महंगे ऑटो और जनता बेहाल
दिल्ली में डीटीसी कॉन्ट्रैक्चुअल ड्राइवरों की हड़ताल से 80% बसें ठप। जानिए क्या है ज़मीनी हकीकत, महंगे ऑटो और मेट्रो के बीच कैसे पिस रहा है आम आदमी।
Zamini Hakikat: राजधानी दिल्ली में पिछले तीन दिनों से डीटीसी (DTC) के कॉन्ट्रैक्चुअल (अनुबंधित) बस ड्राइवरों की हड़ताल के कारण सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। वेतन वृद्धि, इंश्योरेंस और मेडिक्लेम जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर चल रही इस हड़ताल की वजह से लगभग 80 प्रतिशत बसें सड़कों से नदारद हैं। ड्राइवरों का दावा है कि सरकार की ओर से अभी तक बातचीत या समाधान की कोई ठोस पहल नहीं की गई है।
'द फ़ेडरल देश' की टीम ने कश्मीरी गेट बस अड्डे सहित दिल्ली की सड़कों पर उतरकर 'ज़मीनी हकीकत' जानी, जहां हज़ारों यात्री अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए जद्दोजहद करते नज़र आए।
DTC का विशाल नेटवर्क और प्रभावित आंकड़े:
इस हड़ताल का असर दिल्ली की एक बड़ी आबादी पर पड़ रहा है। डीटीसी के आधिकारिक आंकड़ों पर नज़र डालें तो स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है:
25 लाख यात्री: दिल्ली में प्रतिदिन लगभग 25 लाख लोग डीटीसी बसों में सफर करते हैं, जो आज बस स्टैंड्स पर खड़े रहने को मजबूर हैं।
7,680 बसें: डीटीसी के बेड़े में इलेक्ट्रिक और सीएनजी (CNG) को मिलाकर कुल 7,680 बसें हैं, जिनमें से 80% डिपो से बाहर ही नहीं निकली हैं।
52 डिपो और 13,000 कर्मचारी: पूरी दिल्ली में 52 डिपो के ज़रिए बसों का संचालन होता है, जिसके लिए लगभग 13,000 ड्राइवर और कंडक्टर काम करते हैं।
'ज़मीनी हकीकत': आम जनता की बेबसी और मजबूरी
जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे मेट्रो या शेयरिंग कैब का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन दिहाड़ी मज़दूरों, फील्ड वर्कर्स और आम तबके के लिए यह हड़ताल एक बड़ा आर्थिक और मानसिक संकट बन गई है।
घंटों का इंतज़ार: कश्मीरी गेट पर खड़े यात्रियों ने बताया कि उन्हें 1 से 3 घंटे तक का इंतज़ार करना पड़ रहा है। एक बुजुर्ग, जो दवाई लेने आए थे, लक्ष्मीनगर जाने के लिए 3 घंटे से बस स्टैंड पर खड़े थे। सिलाई का काम करने वाले रेहान और खोया मंडी में काम करने वाले संदीप भी घंटों से बस की राह देख रहे थे।
ऑटो वालों की खुली लूट: हड़ताल का फायदा उठाकर ऑटो और ईको-वैन चालकों ने किराया दोगुना कर दिया है। 10 रुपये की जगह 20 से 30 रुपये वसूले जा रहे हैं। संगम विहार जाने वाले एक यात्री ने बताया कि ऑटो वाले सीधे 400 से 500 रुपये की मांग कर रहे हैं।
मेट्रो का महंगा विकल्प: एसी (AC) रिपेयरिंग का काम करने वाले सूरज ने अपनी मजबूरी जताते हुए कहा कि मेट्रो का किराया बहुत ज़्यादा है और प्राइवेट कंपनियां पूरा ट्रैवल अलाउंस (Travel Allowance) नहीं देतीं, इसलिए बस का इंतज़ार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
बसों की मनमानी: कुछ इक्का-दुक्का बसें जो चल भी रही हैं, वे यात्रियों को उनके गंतव्य से पहले ही (जैसे मोरी गेट गोल चक्कर पर) उतार दे रही हैं या बस स्टैंड पर बिना रुके खाली ही आगे निकल रही हैं।
दिल्ली सरकार पर फूट रहा जनता का गुस्सा
घंटों सड़क पर पसीना बहा रही जनता का धैर्य अब जवाब दे रहा है। लोगों में वर्तमान दिल्ली सरकार और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को लेकर भारी आक्रोश देखने को मिला। कश्मीरी गेट पर मौजूद यात्रियों ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि "दिल्ली सरकार सो रही है, इन्हें सिर्फ वोट के समय जनता की याद आती है।" कुछ लोगों ने पिछली सरकार (केजरीवाल) का ज़िक्र करते हुए कहा कि दिल्ली को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक 'जगे हुए' नेतृत्व की सख़्त ज़रूरत है।
जब तक सरकार और कॉन्ट्रैक्चुअल ड्राइवरों के बीच यह गतिरोध खत्म नहीं होता, तब तक दिल्ली की सड़कों पर आम आदमी का यह सफर ऐसे ही मुश्किलों भरा रहने वाला है।

