ज़मीनी हकीकत: निर्भया कांड के 14 साल बाद बसों में कितनी सुरक्षित महिलाएं?
नोएडा-दिल्ली चलती बस गैंगरेप के बाद 'द फ़ेडरल देश' का ग्राउंड रियलिटी चेक। देखें कैसे निर्भया गाइडलाइंस को धता बताकर एक्सप्रेसवे पर दौड़ रहीं अवैध पर्दों वाली बसें।
जमीनी हकीकत: 16 दिसंबर 2012 के वीभत्स 'निर्भया कांड' ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। उस वक्त राजधानी की सड़कों से लेकर संसद तक महिला सुरक्षा को लेकर कड़े कानून बनाने, सार्वजनिक और वाणिज्यिक वाहनों में सुरक्षा उपकरण लगाने और पारदर्शी व्यवस्था लागू करने की कसमें खाई गई थीं। लेकिन 14 साल बीत जाने के बाद भी ज़मीनी हकीकत में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। 4 अगस्त की देर रात ग्रेटर नोएडा के परी चौक से दिल्ली के कश्मीरी गेट के बीच 43 किलोमीटर के सफर में 16 वर्षीय किशोरी के साथ चलती लग्जरी स्लीपर बस में हुए बर्बर गैंगरेप ने इस पूरे प्रशासनिक तंत्र की पोल खोल दी है।
इस रोंगटे खड़े कर देने वाली वारदात के बाद 'द फ़ेडरल देश' के खास शो 'जमीनी हकीकत' की इनवेस्टिगेटिव टीम ने उसी 43 किलोमीटर लंबे रूट परी चौक (ग्रेटर नोएडा), नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे, मयूर विहार बॉर्डर और कश्मीरी गेट पर ग्राउंड रियलिटी चेक किया। इस पड़ताल में जो खुलासे हुए, वे यह साबित करने के लिए काफी हैं कि दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर आज भी कानून की नहीं, बल्कि मनमानी और लापरवाही की हुकूमत चलती है।
1. 4 अगस्त की वह खौफनाक रात: 43 किलोमीटर का सफर और बेबस किशोरी
वारदात की शिकार 16 वर्षीय किशोरी मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मैनपुरी की रहने वाली है, जो पारिवारिक विवाद के बाद नोएडा पहुंची थी। 4 अगस्त की रात करीब 11:30 बजे उसे परी चौक से सेक्टर 63 जाना था। उसे झांसा देकर एक प्राइवेट लग्जरी स्लीपर बस में बैठाया गया।
रूट डायवर्जन और दरिंदगी: बस को सेक्टर 63 की तरफ ले जाने के बजाय चालक और परिचालक उसे नोएडा एक्सप्रेसवे के रास्ते दिल्ली की ओर ले गए।
चलती बस में गैंगरेप: बस की खिड़कियों पर गहरे और अपारदर्शी पर्दे टंगे होने के कारण बाहर किसी को अंदर चल रही हैवानियत का भान तक नहीं हुआ। लगभग 43 किलोमीटर तक सड़क पर दौड़ती बस के अंदर चालक और कंडक्टर ने बारी-बारी से किशोरी के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया और तड़के उसे कश्मीरी गेट के पास लावारिस फेंककर फरार हो गए।
पुलिस की चूक: यह पूरी वारदात उस समय हुई जब दिल्ली और नोएडा में सावन और कांवड़ यात्रा को लेकर जगह-जगह भारी पुलिस बल की तैनाती और हाई अलर्ट के दावे किए जा रहे थे। साथ ही उस रात मूसलाधार बारिश का बहाना बनाकर चौकियों पर पुलिस की मुस्तैदी सवालों के घेरे में आ गई।
2. ग्राउंड रियलिटी चेक: नोएडा एक्सप्रेसवे पर नियमों की धज्जियां
'द फ़ेडरल देश' की टीम जब नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे पर ग्राउंड कवरेज के लिए उतरी, तो स्थिति बेहद चौंकाने वाली मिली।
पर्दों के पीछे छिपी व्यवस्था: एक्सप्रेसवे पर दौड़ रही अधिकांश निजी टूरिस्ट और स्लीपर बसों की खिड़कियों पर मोटे कपड़े के पर्दे लगे पाए गए। यहां तक कि उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (UPSRTC) की सरकारी बस में भी पर्दे टंगे दिखे।
ट्रैफिक पुलिस नदारद: दलित प्रेरणा स्थल और महामाया फ्लाईओवर जैसे भारी ट्रैफिक और संवेदनशील चौराहों पर भी नोएडा ट्रैफिक पुलिस की तैनात निम्न नजर आई। कई किलोमीटर तक पड़ताल करने के बावजूद चेकिंग पिकेट सक्रिय नहीं मिली।
3. कैमरे पर पकड़ा गया बस चालक: बहानेबाजी और सिफारिश की कोशिश
दिल्ली बॉर्डर में दाखिल होते ही दिल्ली पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए एक संदिग्ध स्लीपर बस को रुकवाया। 'द फ़ेडरल देश' के कैमरे पर पूरी प्रक्रिया कैद हुई:
लक्ष्मी नगर से गोरखपुर जा रही बस: यह बस दिल्ली से गोरखपुर, उत्तर प्रदेश रूट पर चलती थी। इसके ऊपरी स्लीपर डेक पर सभी खिड़कियों पर गहरे पर्दे लगे हुए थे।
कैमरा देखते ही पर्दे उतारे: पुलिस द्वारा रोके जाने और मीडिया के कैमरे को देखकर बस का हेल्पर हड़बड़ाहट में अंदर जाकर पर्दे उतारने लगा।
ड्राइवर की दलीलें: जब ड्राइवर से निर्भया गाइडलाइंस के उल्लंघन पर सवाल किया गया, तो उसने पहले अनजान बनने का नाटक किया और फिर फोन पर किसी से बात कराकर चालान रुकवाने की कोशिश की। हालांकि, दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने कड़ा रुख अपनाते हुए मोटर वाहन अधिनियम के तहत उसका चालान काटा।
4. निर्भया गाइडलाइंस की 14 साल बाद क्या स्थिति है?
वर्ष 2012 के निर्भया कांड के बाद सुप्रीम कोर्ट और सड़क परिवहन मंत्रालय ने वाणिज्यिक यात्री बसों के लिए जो कड़े सुरक्षा नियम तय किए थे, आज सड़कों पर उनकी खुलेआम अनदेखी हो रही है:
पारदर्शी शीशों का नियम बनाम डार्क ग्लास: नियमों के तहत बसों के आगे-पीछे के शीशे 70% और साइड की खिड़कियां 50% से अधिक पारदर्शी होनी चाहिए। लेकिन ज़मीनी पड़ताल में अधिकतर निजी स्लीपर बसों में पर्दे और गहरे विनाइल स्टिकर लगे पाए गए।
पर्दों पर पूर्ण प्रतिबंध बनाम भारी पर्दे: गाइडलाइंस में किसी भी प्रकार के मोटे या अंदर की दृश्यता रोकने वाले पर्दों के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाई गई थी। इसके उलट, आज भी स्लीपर केबिनों और पैसेंजर सीटों पर मोटे पर्दे धड़ल्ले से लगाए जा रहे हैं।
हाईवे पेट्रोलिंग बनाम नदारद पुलिस: संवेदनशील हाईवे और एक्सप्रेसवे पर नियमित चेकिंग पिकेट और निरंतर गश्त का प्रावधान था। लेकिन पड़ताल में दिल्ली बॉर्डर पर सीमित चेकिंग के अलावा नोएडा एक्सप्रेसवे और अन्य मार्गों पर पुलिस की प्रभावी निगरानी देखने को नहीं मिली।
5. बड़ा सवाल: सिस्टम कब जागेगा?
यह घटना महज़ एक कानूनी उल्लंघन नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी के उस बुनियादी अधिकार पर सीधा हमला है, जो उन्हें संविधान सुरक्षित आवाजाही के लिए देता है। जब तक नियमों का उल्लंघन करने वाले ऑपरेटरों के परमिट रद्द नहीं होंगे, वाहनों को सीज नहीं किया जाएगा और लापरवाही बरतने वाले पुलिस व परिवहन अधिकारियों पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसी दरिंदगी की पुनरावृत्ति को रोकना असंभव होगा।

