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सत्य निकेतन हादसा: मौत के साये में जी रहे DU के छात्र, पीजी का काला सच

दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस और सत्य निकेतन में छात्रों की जान से खिलवाड़। महंगे रेंट, खराब खाना, करंट वाला पानी और अवैध पीजी इमारतों की ग्राउंड रिपोर्ट।


Satyaniketan PG Collapse: देश की राजधानी दिल्ली, जहाँ पूरे देश से युवा अपनी आँखों में सुनहरे भविष्य के सपने लेकर आते हैं। माता-पिता अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई सिर्फ इसलिए दांव पर लगा देते हैं ताकि उनका बच्चा एक अच्छी शिक्षा पा सके और उनका बुढ़ापा संवर जाए। लेकिन शिक्षा के इस मक्का (दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ और नॉर्थ कैंपस) की हकीकत बेहद डरावनी है। सत्य निकेतन की तंग गलियों में छात्र जान जोखिम में डालकर 'माचिस की डिब्बियों' जैसे कमरों में रहने को मजबूर हैं। लाखों रुपये रेंट देने के बाद भी इन्हें सड़ा हुआ खाना, करंट मारता पानी और हर पल मौत का खौफ नसीब हो रहा है। हाल ही में हुए इमारत हादसे ने इस खौफ को चीख-चीख कर बयां कर दिया है।


ग्राउंड ज़ीरो से जो सच्चाई सामने आई है, वह सिस्टम, पीजी मालिकों और बिल्डर माफियाओं के मुंह पर एक करारा तमाचा है। यहाँ पढ़ें खुद भुक्तभोगी छात्रों और एक्सपर्ट की ज़ुबानी:

"माचिस की डिब्बी जैसे कमरे और 45 हज़ार की लूट"
सत्य निकेतन में एक कमरे के लिए छात्रों को लूटा जा रहा है। लॉ सेंटर-2 के छात्र और पूर्व छात्र प्रतिनिधि अंकित (बिहार) बताते हैं कि यहाँ लूट का खुला खेल है।

अंकित की बाइट: "यहाँ तो रेंट ही 15-16 हज़ार से शुरू होता है। वो भी शेयरिंग में। माचिस के डिब्बों जैसे 4x4 के रूम होते हैं, बस गेट जितना बड़ा कमरा। एक बेड कोने में लगा देते हैं, एक टेबल और एक ड्रावर में आधा साइड हमारा, आधा रूममेट का। सिंगल बेड का तो कांसेप्ट ही नहीं है। बिना एमसीडी अप्रूवल के 5-5 फ्लोर की बिल्डिंग तान दी गई है।"

एक अन्य छात्र ने बताया कि लूट इस कदर है कि 15 हज़ार रेंट वाले कमरे के लिए पहली बार आने वाले छात्र से एडवांस और सिक्योरिटी के नाम पर पहले ही दिन 45,000 रुपये ऐंठ लिए जाते हैं।

"बदबूदार खाना जिससे अपेंडिक्स हो गया और करंट मारता पानी"
यहाँ रहने वाले छात्र सिर्फ छत गिरने के डर से नहीं, बल्कि बीमारियों से भी जूझ रहे हैं। आर्यभट्ट कॉलेज की सेकंड ईयर की छात्रा निर्जरा (छत्तीसगढ़) ने अपनी आपबीती सुनाते हुए रोंगटे खड़े कर देने वाला सच बताया।

निर्जरा: "महीने का 26 हज़ार रेंट देते हैं हम। पीजी में फूड क्वालिटी लिटरली बहुत खराब है। कुछ महीने पहले मुझे यहाँ के खाने की वजह से अपेंडिक्स हो गया था। पानी का हाल ये है कि बिल्डिंग की छत खुली है, बारिश का पानी दीवारों से टपकता हुआ वॉशरूम के गीजर तक आता है। नल खोलो तो करंट लगता है। कंप्लेंट करो तो महीने भर सुनवाई नहीं होती।"

आर्यभट्ट कॉलेज के ही एक अन्य छात्र (जो अब मोची गांव शिफ्ट हो गए हैं) ने बताया:

"मैं 4 महीने पहले सत्य निकेतन छोड़कर गया क्योंकि वहाँ पीने का पानी नहीं था। आरओ (RO) मशीन लगाई थी, वो भी गंदे पानी की वजह से हर महीने खराब हो जाती थी। सीवेज का पानी उबल कर सड़कों पर आ जाता है।"

"आवाज़ उठाने पर झूठे इल्ज़ाम और दलालों का जाल"
छात्रों की मजबूरी यह है कि अगर वे खराब सुविधाओं के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं, तो पीजी मालिक उनके माता-पिता के सामने उनका चरित्र हनन करते हैं। अंकित ने बताया:

अंकित: "अगर बच्चे ओनर को कंप्लेंट करते हैं, तो कोई सुनवाई नहीं होती। लास्ट ईयर बच्चों ने इलेक्ट्रिसिटी को लेकर आवाज़ उठाई, तो ओनर्स ने सीधा घर पर फोन कर दिया कि 'आपके बच्चे गलत हरकतें कर रहे हैं।' ये फर्जी नरेटिव बनाया गया ताकि पेरेंट्स बच्चों को ही गलत समझें।"

आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज के पूर्व छात्र रोहित (कैमूर, बिहार) बताते हैं कि बिना दलाल के कमरा मिलना नामुमकिन है:

रोहित: "बिना दलाल के यहाँ रूम मिलेगा ही नहीं। अगर ओनर का रूम खाली भी है और आप सीधे जाओगे, तो वो नहीं देगा। 6500 के रूम के लिए तीन-चार हज़ार रुपये तो ब्रोकर को देने पड़ते हैं। मजबूरी में बच्चे आते हैं, ना सिक्योरिटी चेक होती है, ना फायर एनओसी (NOC), बस रहना है और पढ़ाई करनी है।"

"इमारत के नीचे बिना परमिशन बेसमेंट खोद दिया, मौत के ज़िम्मेदार कौन?"
सत्य निकेतन में हुए ताज़ा हादसे (जिसमें छात्रों की जान गई) की असली वजह बिल्डरों का लालच है। असम से आई छात्रा (मैत्रेयी कॉलेज), जो हादसे वाली बिल्डिंग के ठीक सामने रहती थी, ने आंखों देखा हाल बताया:

असम की छात्रा: "सामने एक नया बॉयज़ पीजी ओपन हुआ था, जिसमें 40-50 बच्चे रह रहे थे। एक हफ्ते से वो लोग नीचे बेसमेंट खोद रहे थे। उसी के कारण वो बिल्डिंग दो सेकंड में पूरी सीधी नीचे गिर गई। उस बिल्डिंग में कोई पिलर भी नहीं था।"

इस तकनीकी और कानूनी लापरवाही पर डीडीए के पूर्व टाउन प्लानर ए.के. जैन ने मुहर लगाई है:

ए.के. जैन, टाउन प्लानर: "बायलॉज के हिसाब से दिल्ली में 15 मीटर (4 फ्लोर या स्टिल्ट पार्किंग + 4 फ्लोर) अलाउड हैं। बेसमेंट भी अलाउड है, लेकिन हादसे वाली जगह पर लोग 'बनी हुई बिल्डिंग' के नीचे बेसमेंट खोद रहे थे। इससे फाउंडेशन (नींव) का सपोर्ट खत्म हो गया और बिल्डिंग गिर गई। बिल्डर माफिया पावर ऑफ अटॉर्नी पर काम करता है, घूस देता है और कोई बिल्डिंग प्लान पास नहीं कराता।"

एक छात्र का रुला देने वाला सवाल
हादसे के बाद पीजी मालिक इतने डरे हुए हैं कि उन्होंने अपने कर्मचारियों को झूठ बोलने की ट्रेनिंग दे दी है। वीडियो में साफ दिखा कि बिल्डिंग में बेड्स और पीजी का बोर्ड लगा है, लेकिन कुक सत्यनारायण कैमरे पर खौफ के मारे कहता है कि "यहाँ पीजी नहीं चलता, बच्चे नहीं रहते, बस हम 4-5 कर्मचारी रहते हैं।"

लेकिन इस पूरी क्रूर व्यवस्था के बीच एक यूपीएससी की तैयारी कर रहे छात्र का वह दर्दनाक सवाल सिस्टम को आईना दिखाता है, जिसने हादसे में अपने दोस्तों को खो दिया:

छात्र की बाइट: "आप मुझे इमोशनल फूल कह लीजिए, बेवकूफ कह लीजिए... मेरी सिर्फ एक मांग है, जो 6-7 बच्चे मर गए, उनकी ज़िन्दगी मुझे लौटा दो। जन्माष्टमी के दिन वो लोग सामने वाली बिल्डिंग से 'जय श्री कृष्णा' कर हाथ हिला रहे थे, अब वो दोबारा हाथ हिला पाएंगे कभी? ये नेग्लिजेंस नहीं, सीधा-सीधा मर्डर है। अगर दिल्ली यूनिवर्सिटी हॉस्टल नहीं दे सकती, तो इन पीजी ओनर्स पर मर्डर का चार्ज लगाओ।"

एके जैन ने ये भी बताया कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में लगभग 10 लाख छात्र हैं, लेकिन 90% के लिए हॉस्टल नहीं हैं। इसी मजबूरी का फायदा उठाकर सत्य निकेतन जैसे इलाकों में 100 से ज़्यादा अवैध पीजी चल रहे हैं। जब तक सरकार 9 लाख नए हॉस्टल नहीं बनाती और एमसीडी के भ्रष्ट अधिकारियों पर लगाम नहीं कसती, तब तक देश का भविष्य यूं ही चंद रुपयों के लालच में कंक्रीट के मलबे में दबता रहेगा।


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