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DUSU चुनाव: 10 में से 9 छात्र बेघर, क्या 'मनी पावर' तय करेगी नतीजा?

डूसू चुनाव में 'मनी और मसल पावर' का बोलबाला। 'ज़मीनी हकीकत' शो में जानिए क्यों 90% डीयू छात्रों को नहीं मिलता हॉस्टल और सत्य निकेतन हादसे पर क्या बोले छात्र।


Zamini Hakikat: दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव की तारीख नज़दीक आते ही नॉर्थ कैंपस में चुनावी सरगर्मी तेज़ हो चुकी है। आमतौर पर गाड़ियों के काफिले, शक्ति प्रदर्शन और विज्ञापनों के शोर में दब जाने वाले इस चुनाव के बीच 'द फ़ेडरल देश' की टीम पहुँची सीधे छात्रों के बीच। हमारे खास शो 'ज़मीनी हकीकत' में जानिए कि क्या 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुआ बड़ा छात्र प्रदर्शन और सत्य निकेतन में पीजी हॉस्टल ढहने का हादसा इस बार चुनावी मुद्दा बन पाया है या छात्र राजनीति आज भी सिर्फ 'मनी और मसल पावर' के इर्द-गिर्द सिमटी है।


ग्राउंड रिपोर्ट:

1. '10 में से सिर्फ 1 छात्र को हॉस्टल, बाकी प्राइवेट पीजी के भरोसे'

कैंपस में मिले छात्रों के मुताबिक, विश्वविद्यालय में सबसे बड़ा संकट सुरक्षित और किफायती आवास का है। स्टैटिस्टिक्स डिपार्टमेंट के छात्र गुरबख्श सिंह बताते हैं कि यूनिवर्सिटी में 10 में से बमुश्किल एक छात्र को हॉस्टल मिल पाता है। बाकी 90 फीसदी छात्रों को प्राइवेट पीजी या फ्लैट्स पर निर्भर रहना पड़ता है। मुखर्जी नगर, सत्य निकेतन और विजयनगर जैसी जगहों पर बिना फायर एनओसी और बिना मानकों के माचिस की डिब्बी जैसे कमरों में दो-दो छात्रों को रखा जाता है और उनसे मनमाना किराया वसूला जाता है।

2. 'सीट देने की हैसियत है, तो बेड देने की क्यों नहीं?'

डीयू एसओएल से साइकोलॉजी के छात्र प्रकाश ने यूनिवर्सिटी प्रशासन और छात्र संगठनों की प्राथमिकताओं पर तीखा सवाल उठाया। उनका कहना था कि जब यूनिवर्सिटी हज़ारों छात्रों का एडमिशन लेती है, तो उनके रहने का इंतज़ाम क्यों नहीं करती? वहीं मुज़फ़्फ़रनगर से आकर एमए इंग्लिश कर रहीं छात्रा श्रेया ने बताया कि हॉस्टल न मिलने की वजह से उन्हें साउथ एक्सटेंशन और लाजपत नगर से रोज़ाना डेढ़-दो घंटे का सफर करके कैंपस आना पड़ता है। उनका आरोप है कि छात्र संगठन ऐसे गंभीर मुद्दों को दरकिनार कर केवल सतही वादों तक सीमित रहते हैं।

3. मनी लॉन्ड्रिंग और चुनावी बजट पर उठे सवाल

मास्टर्स की छात्रा रितिका ने आरोप लगाया कि डूसू अब छात्र हितों की जगह राजनीतिक सीढ़ी और पैसे के खेल का केंद्र बन चुका है। जीत के बाद लाखों रुपये की फिजूलखर्ची की खबरें आती हैं, लेकिन कैंपस में वाई-फाई, बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर, अटेंडेंस और मार्कशीट से जुड़ी साधारण समस्याएं भी अनसुलझी रह जाती हैं। एबीवीपी और एनएसयूआई के भारी-भरकम बजट के सामने कोई स्वतंत्र उम्मीदवार टिक नहीं पाता।

4. कैम्पेन में जुटे छात्र नेताओं का तर्क

कैंपस लॉ सेंटर के छात्र सुनील, जो अध्यक्ष पद के प्रत्याशी विजय शंकर मीणा के समर्थन में प्रचार कर रहे थे, ने स्वीकार किया कि चुनाव में संसाधनों का प्रभाव रहता है। हालांकि उनका तर्क था कि वादे हवा-हवाई करने के बजाय व्यावहारिक मुद्दों—जैसे पीजी में ली जाने वाली भारी सिक्योरिटी डिपॉजिट पर रोक, हॉस्टल्स का समय पर रिनोवेशन और री-एग्जामिनेशन नियमों में सुधार—पर फोकस होना चाहिए। वहीं कुछ छात्रों का यह भी मानना था कि सत्य निकेतन जैसे हादसों के लिए सीधे छात्रसंघ को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि यह एमसीडी और मकान मालिकों की लापरवाही का नतीजा है।

'ज़मीनी हकीकत' की पड़ताल साफ करती है कि नॉर्थ कैंपस की सड़कों पर पोस्टर भले ही चमक रहे हों, लेकिन हॉस्टलों की कमी, असुरक्षित प्राइवेट पीजी, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और छात्रों की रोज़मर्रा की परेशानियां अब भी जस की तस हैं। क्या डीयू का आम छात्र इस बार इन ज़मीनी सवालों को जेहन में रखकर ईवीएम का बटन दबाएगा, यही इस चुनाव का सबसे बड़ा सवाल है।


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