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E20 पेट्रोल पर छिड़ा घमासान: पूरे देश में लागू E20 पेट्रोल पर क्यों बढ़ा विवाद?

देश में 20% एथेनॉल पेट्रोल अनिवार्य होने से मचा बवाल। ₹1.44 लाख करोड़ की बचत का दावा, लेकिन 3.5% घटा गाड़ियों का माइलेज।


Siyasat: एक मिडिल क्लास परिवार के लिए गाड़ी खरीदना महज चार पहियों का इंतजाम नहीं, बल्कि जीवनभर की बचत, जरूरतों में कटौती और बैंक लोन के तानबाने से बुना हुआ एक सपना होता है। लेकिन देश में 1 अप्रैल 2026 से पूरे भारत में अनिवार्य रूप से लागू हुए E20 (20 फीसदी एथेनॉल मिश्रित) पेट्रोल को लेकर छिड़ा विवाद अब तकनीकी कम और एक आम आदमी के बजट की कहानी ज्यादा बन चुका है।

एक तरफ सरकार और ऑटोमोबाइल कंपनियां इसके बड़े-बड़े फायदे गिना रही हैं, तो दूसरी तरफ हर महीने EMI चुकाने वाला आम वाहन मालिक कैलकुलेटर लेकर अपनी जेब पर पड़ रही दोहरी मार का हिसाब लगा रहा है।

वाजपेयी से मोदी सरकार तक: कैसे तय हुआ E20 का सफर

भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने (Ethanol Blending) की कहानी नई नहीं है, लेकिन इसकी रफ्तार पिछले कुछ सालों में बेहद तेज हुई है:

शुरुआत (2002): पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 2002 में देश में एथेनॉल ब्लेंडिंग की शुरुआत की थी। बाद में यूपीए (UPA) सरकार ने भी इसे आगे बढ़ाया।

मोदी सरकार में रफ्तार (2014-2022): साल 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता में आए, तब पेट्रोल में केवल 1.5 फीसदी एथेनॉल मिलाया जाता था। सरकार के प्रयासों से साल 2022 तक यह मात्रा बढ़कर 10 फीसदी (E10) हो गई।

लक्ष्य से 5 साल पहले कामयाबी: सरकार ने पहले पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य 2030 तय किया था, लेकिन इसे 5 साल पहले यानी 2025 में ही हासिल कर लिया गया। 6 फरवरी 2023 को पीएम मोदी ने 11 राज्यों में E20 ईंधन को रोलआउट किया था, जिसे 1 अप्रैल 2026 से पूरे देश में अनिवार्य कर दिया गया है।

सरकार का दावा: ₹1.44 लाख करोड़ की बचत और किसानों को लाभ

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एथेनॉल ब्लेंडिंग भारत के लिए एक गेम-चेंजर साबित हुई है। सरकार का दावा है कि इस नीति से देश को त्रिकोणीय फायदा हुआ है:

विदेशी मुद्रा की बचत: साल 2014-15 से लेकर जुलाई 2025 तक भारत ने एथेनॉल ब्लेंडिंग के जरिए 1.44 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की विदेशी मुद्रा (Foreign Exchange) बचाई है, जिससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम हुई है।

किसानों की आय में वृद्धि: एथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने और अनाज से होता है, जिससे सीधे तौर पर देश के किसानों की जेब में पैसा पहुंच रहा है।

प्रदूषण में कमी: एथेनॉल मिश्रित ईंधन पारंपरिक पेट्रोल के मुकाबले कम कार्बन उत्सर्जन करता है, जिससे पर्यावरण को फायदा हो रहा है।

विवाद बढ़ा तो सरकार ने ऑटो कंपनियों को उतारा आगे?

इस नीति के बड़े फायदों के बावजूद जब जमीन पर वाहन मालिकों ने माइलेज और इंजन को लेकर शिकायतें शुरू कीं, तो विवाद गहरा गया। राजनीतिक और बाजार विश्लेषकों ने सवाल उठाया कि अगर सब कुछ पूरी तैयारी के साथ हुआ था, तो सरकार को बार-बार सफाई क्यों देनी पड़ रही है?

इस विवाद के बीच सरकार ने खुद सीधे मोर्चा संभालने के बजाय देश की दिग्गज ऑटो कंपनियों के अधिकारियों को आगे कर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कराई। इसमें मारुति सुजुकी, टोयोटा, हीरो और टीवीएस जैसी कंपनियों के अधिकारियों ने E20 को पूरी तरह सुरक्षित बताया।

मारुति सुजुकी का दावा: कंपनी ने बताया कि साल 2025-26 में उन्होंने करीब 2.84 करोड़ गाड़ियों की सर्विस की। इनमें से करीब 1.5 करोड़ गाड़ियां तीन साल से ज्यादा पुरानी थीं, लेकिन किसी भी पुरानी गाड़ी में E20 ईंधन की वजह से इंजन खराब होने या अत्यधिक घिसाव (Wear and Tear) की कोई बड़ी शिकायत सामने नहीं आई है।


जेब पर दोहरी मार: 3.5% तक कम हुआ माइलेज

भले ही ऑटो कंपनियां E20 को इंजन के लिए सुरक्षित बता रही हैं, लेकिन उन्होंने एक कड़वी सच्चाई को स्वीकार किया है जिसने मिडिल क्लास के बजट को हिलाकर रख दिया है। कंपनियों के मुताबिक, E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से गाड़ियों का माइलेज करीब 3 से 3.5 फीसदी तक कम हो सकता है।

गणित समझिए: अगर आपकी कार पहले 20 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज देती थी, तो E20 पेट्रोल डालने पर वह घटकर करीब 19.4 किलोमीटर प्रति लीटर रह जाएगा।

दिक्कत: माइलेज घटने के कारण गाड़ियों की टंकी जल्दी खाली हो रही है, जिससे वाहन चालकों को बार-बार पेट्रोल पंप के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

अभिभावकों और मिडिल क्लास का दर्द यह है कि सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने पहले दावा किया था कि एथेनॉल ब्लेंडिंग के बाद देश में पेट्रोल सस्ता होगा। लेकिन हकीकत में पेट्रोल के दाम कम नहीं हुए। ऐसे में जनता पर दोहरी मार पड़ रही है, एक तरफ पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही हैं और दूसरी तरफ E20 के चलते माइलेज कम होने से गाड़ी चलाने का मासिक खर्च और बढ़ गया है।

देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा और किसानों की आय बढ़ाना निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन उस आम आदमी की चिंता भी जायज है जो महीने की सैलरी आने से पहले ही कैलकुलेटर लेकर पूरे घर का बजट सेट करता है।


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