एथेनॉल विवाद: E25 पर बैकफुट पर सरकार? 'सियासत' में केजरीवाल की एंट्री
20 पेट्रोल विवाद में कूदे अरविंद केजरीवाल, 29 ऑटो कंपनियों को खत लिखकर पूछा- क्या करेंगे नुकसान की भरपाई? गुरुवार से पेट्रोल पंपों पर खुद उतरने का एलान।
Siyasat: क्या केंद्र सरकार ने देश में पेट्रोल के भीतर 20 फीसदी एथेनॉल (E20) मिलाने का फैसला बिना पूरी तैयारी के लिया था? अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चल रहा था, तो फिर E25 को लेकर अब सरकार को सफाई क्यों देनी पड़ रही है? 'द फ़ेडरल देश' के लोकप्रिय और तीखे राजनीतिक शो 'सियासत' में वरिष्ठ पत्रकार और एंकर मनीष कुमार ने इसी मुद्दे पर सरकार की नीति और मिडिल क्लास की जेब पर पड़ रहे असर को लेकर तीखे सवाल खड़े किए हैं। दरअसल, बाजार में 25 फीसदी एथेनॉल मिक्स पेट्रोल (E25) लाने की खबरों पर मचे घमासान के बाद अब सरकार बैकफुट पर नजर आ रही है। सरकार को आधिकारिक तौर पर सफाई देनी पड़ी है कि फिलहाल E25 पेट्रोल को बाजार में उतारने का कोई विचार नहीं है और इसकी अभी केवल वैज्ञानिक टेस्टिंग चल रही है।
E20 के झटके के बाद क्यों उखड़ा मिडिल क्लास?
शो 'सियासत' में विश्लेषण करते हुए मनीष कुमार ने देश के करोड़ों वाहन मालिकों की उस चिंता को आवाज दी, जिससे आज हर आम आदमी परेशान है। देश में अप्रैल 2023 से चरणबद्ध तरीके से एथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ाया गया और अप्रैल 2025 तक इसे 20 फीसदी (E20) कर दिया गया, जिसके बाद सरकार ने दावा किया कि देश में करीब 20 करोड़ से ज्यादा दोपहिया और 20 लाख फोर-व्हीलर्स इस ईंधन का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि E20 पेट्रोल के आने के बाद से ही सोशल मीडिया और सर्विस सेंटर्स पर वाहन मालिकों की शिकायतें बाढ़ की तरह आ गईं। लोगों का दावा है कि उनकी गाड़ियों का माइलेज अचानक गिर गया है और इंजन के मेंटेनेंस का खर्च बढ़ गया है। इसी बहस के बीच जब E25 के आने की सुगबुगाहट हुई, तो उपभोक्ताओं का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया, जिसके बाद सरकार को इस पर स्पष्टीकरण देने के लिए मजबूर होना पड़ा।
करोड़ों पुरानी गाड़ियों के भविष्य पर क्यों है सस्पेंस?
ऑटोमोबाइल जानकारों के मुताबिक, एथेनॉल में पेट्रोल के मुकाबले कम ऊर्जा होती है, जिसका सीधा मतलब है कि समान दूरी तय करने के लिए गाड़ी को ज्यादा ईंधन की जरूरत होगी। इसके अलावा, अधिक एथेनॉल वाले ईंधन से पुरानी गाड़ियों के रबर पाइप, फ्यूल सील और फ्यूल पंप जल्दी खराब होने का खतरा रहता है। सबसे बड़ा संकट उन गाड़ियों पर है जो अप्रैल 2023 से पहले की बनी हैं और सिर्फ E10 के हिसाब से डिजाइन थीं। यही वजह है कि ऑटो एक्सपर्ट्स लगातार यह सुझाव दे रहे हैं कि सरकार को पेट्रोल पंपों पर E20 के साथ-साथ सामान्य पेट्रोल का विकल्प भी देना चाहिए, ताकि लोग अपनी गाड़ी के अनुसार ईंधन चुन सकें।
सियासी मैदान में केजरीवाल की एंट्री और कंपनियों को अल्टीमेटम
इस पूरे विवाद ने अब एक बड़ा राजनीतिक मोड़ भी ले लिया है। आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सीधे केंद्र सरकार और ऑटोमोबाइल कंपनियों पर मोर्चा खोलते हुए दो दिनों में बैक-टू-बैक दो प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं। उन्होंने मारुति सुजुकी, टोयोटा और हीरो मोटोकॉर्प सहित 29 दिग्गज ऑटो कंपनियों को पत्र लिखकर सार्वजनिक रूप से सच सामने रखने को कहा है। केजरीवाल ने कंपनियों से सीधा सवाल पूछा है कि अगर पुरानी गाड़ियों में E20 एथेनॉल के इस्तेमाल से कंपनियों के वादे से ज्यादा माइलेज गिरता है, तो क्या वे उपभोक्ताओं को हो रहे इस आर्थिक नुकसान की भरपाई करेंगी? इसके साथ ही केजरीवाल ने एलान किया है कि वे गुरुवार (9 जुलाई) से खुद पेट्रोल पंपों, ऑटो शोरूम और सर्विस सेंटरों पर जाकर जनता और मैकेनिकों से सीधे बात करेंगे। उनका आरोप है कि सरकार ने बिना व्यापक परीक्षण के इस नीति को लागू कर आम आदमी की जेब पर डाका डाला है।
साजिश का दावा या नीतिगत खामी?
दूसरी तरफ, चौतरफा घिरी सरकार ने एक और बड़ा दावा किया है कि एथेनॉल नीति के खिलाफ सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा नैरेटिव भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने से रोकने की एक 'विदेशी साजिश' है, हालांकि सरकार ने इस दावे के समर्थन में अब तक कोई ठोस सार्वजनिक प्रमाण पेश नहीं किया है। जैसा कि शो 'सियासत' में मनीष कुमार ने रेखांकित किया कि इसमें कोई शक नहीं कि एथेनॉल ब्लेंडिंग से देश का कच्चा तेल आयात घटेगा, विदेशी मुद्रा बचेगी और गन्ना किसानों को फायदा होगा। लेकिन किसी भी बड़ी नीति की सफलता उसकी नीयत से ज्यादा उसके जमीनी क्रियान्वयन से मापी जाती है। E20 के अनुभव ने साफ कर दिया है कि भविष्य में E25 या किसी भी नए ईंधन को थोपने से पहले सरकार को उपभोक्ताओं के भरोसे, तकनीकी तैयारियों और करोड़ों वाहन मालिकों की व्यावहारिक समस्याओं का जवाब देना ही होगा।

