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DU छात्रों की मजबूरी: गांधी विहार की झुकी हुई इमारतों की ग्राउंड रिपोर्ट

सत्य निकेतन हादसे के बाद गांधी विहार में जर्जर और झुकी हुई इमारतों पर चला MCD का हथौड़ा। कूड़े के ढेर पर बसी कॉलोनी और सस्ते किराये की मजबूरी में DU छात्र।


Zamini Hakikat: राजधानी दिल्ली के सत्य निकेतन में हुए दर्दनाक इमारत हादसे (जिसमें सात लोगों की मौत हो गई) के बाद, प्रशासन की नींद आखिरकार टूट गई है। नगर निगम (MCD) अब दिल्ली भर में जर्जर और खतरनाक इमारतों को चिन्हित कर उन पर कार्रवाई कर रहा है। इसी कड़ी में 'द फ़ेडरल देश' की टीम उत्तरी दिल्ली के तिमारपुर विधानसभा क्षेत्र के गांधी विहार (एफ ब्लॉक) पहुंची।


यहां की 'जमीनी हकीकत' रोंगटे खड़े कर देने वाली है। यहां लगभग हर तीसरी इमारत खतरनाक तरीके से झुकी हुई है। दो इमारतों के बीच स्पष्ट गैप (दूरी) आ चुका है। जो लोग यहां रह रहे हैं, उन्होंने हमारे कैमरे पर जो खुलासे किए, वो प्रशासन की घोर लापरवाही और छात्रों की मजबूरी की पूरी कहानी बयां करते हैं।

आइए विस्तार से जानते हैं कि गांधी विहार के इस 'मौत के कुएं' को लेकर यहां काम करने वाले मजदूरों, स्थानीय निवासियों और छात्रों ने क्या कहा:

1. कूड़े के पहाड़ पर खड़ी कर दी गई पूरी कॉलोनी?
गांधी विहार की सबसे बड़ी समस्या इसकी कमजोर नींव है। स्थानीय लोगों का स्पष्ट कहना है कि यह पूरी कॉलोनी एक पुराने कूड़ा खत्ते (डंपिंग यार्ड) पर बसाई गई है।

सुरेश (पेंटर/मजदूर): "ये कोठियां सीलन और कूड़े की जमीन की वजह से झुकी हुई हैं। पहले यहां मुखर्जी नगर का सारा कूड़ा डलता था। जैसे मुकरबा चौक पर कूड़े के पहाड़ हैं, वैसे ही यहां भी कूड़े के पहाड़ थे। उसी कूड़े को दबाकर 25 और 50 गज के प्लॉट काट दिए गए।"

नितीश कुमार कमती (गैस गोदाम कर्मचारी और 5 साल से किरायेदार): "10-15 साल पहले यह कूड़े का ढेर था, उसी पर ये मकान बने हैं। मैं 4500 रुपये किराया देता हूं। सीलन और डैमेज के चक्कर में 2-3 बार रूम बदल चुका हूं। यहां हर एक मकान के बाद दूसरा मकान झुका हुआ ही मिलेगा। मकान मालिक यहां नहीं रहते, सब प्रॉपर्टी डीलरों के भरोसे चल रहा है।"

नितिन चौधरी (10 साल से निवासी - अलग राय): "कूड़े वाली बात लोग कहते हैं, लेकिन अगर मकान में नीचे से लोहे के एंगल लगाकर मजबूती दी गई हो, तो बिल्डिंग नहीं गिरती। सीलन की मुख्य वजह यमुना नदी के पास होना है। यह अशोक मल्होत्रा द्वारा काटी गई DDA की सरकारी कॉलोनी है।"

2. जर्जर इमारतें: छतों से नंगे दिखते हैं सरिये
जिन इमारतों को MCD अब तोड़ रही है, उनकी हालत पहले से ही बेहद खौफनाक थी। ठेकेदार तक यहां काम करने से डरते हैं।

देव कुमार (ठेकेदार/मिस्त्री): "मैं यहां 115 नंबर मकान के फर्स्ट फ्लोर पर प्लास्टर का काम कर रहा था। हालत इतनी जर्जर है कि सीढ़ियों से चढ़ते ही छतों के सरिये (लोहा) नंगे नजर आते हैं। मैंने खुद आगे काम करने से मना कर दिया और अपना सामान लेकर जा रहा हूं क्योंकि बिल्डिंग कभी भी गिर सकती है।"

3. RWA ने 8 महीने पहले दी थी शिकायत, DDA की है असल लापरवाही
MCD अब भले ही कार्रवाई कर रही हो, लेकिन स्थानीय लोगों ने कई महीने पहले ही खतरे का अंदेशा जता दिया था।

अनिल पाठक (स्थानीय RWA कार्यकर्ता): "जो इमारतें MCD तोड़ रही है, वो 12-13 साल पुरानी हैं और पिछले डेढ़-दो साल से टेढ़ी खड़ी थीं। हमने 8-9 महीने पहले ही MCD को इसकी शिकायत दी थी, लेकिन किसी ने नहीं सुना। सत्य निकेतन हादसे के बाद कल ये लोग आए हैं और अब पूरी बिल्डिंग ढहा रहे हैं। असल लापरवाही DDA की है। 2002-03 में जब ये कॉलोनी कटी, तो पानी निकासी (नाली) की कोई जगह नहीं छोड़ी गई। सप्लाई की पाइपें डैमेज हैं और सारा पानी सीधे मकानों की बुनियाद (नींव) में रिस रहा है, जिससे इमारतें झुक रही हैं।"

4. छात्रों का दर्द: सस्ता किराया और जान का जोखिम
गांधी विहार, दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और मुखर्जी नगर (कोचिंग हब) के बहुत नजदीक है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वाले छात्र बजट कम होने के कारण मजबूरी में इन झुकी हुई और सीलन भरी इमारतों में रहते हैं।

सुमन कुमार यादव (सहरसा, बिहार से आए छात्र): "यहां 70-80% मकान ऐसे ही झुके हुए हैं। मैं जिस 1BHK में रहता हूं उसका किराया 5500 रुपये है, वो भी झुका हुआ है। इससे पहले वाली बिल्डिंग में सीलन इतनी थी कि खाना बनाते समय ऊपर से प्लास्टर गिर जाता था। रेंट कम है, इसलिए मजबूरी में यहीं रहना पड़ता है।"

रोहित तिवारी (रीवा, MP से आए SSC CGL के छात्र): "मैं 2BHK में रहता हूं, जिसका किराया 10,000 है (हम तीन लोग रहते हैं)। मेरी पुरानी बिल्डिंग (मकान नंबर 56) झुकी हुई थी। यहां सीलन इतनी है कि आप सो रहे होते हैं और अचानक छत से सीमेंट के टुकड़े गिर जाते हैं। यहां ये सब अब नॉर्मल हो चुका है।"

ऋषभ सिंह (गोरखपुर, UP से आए DU के छात्र): "मैं जिस बिल्डिंग में रहता हूं, वो भी झुकी (टिल्टेड) है। जब तेज हवा चलती है तो बिल्डिंग हिलती भी है। मुखर्जी नगर बहुत महंगा है, इसलिए बच्चे बजट के कारण यहां रहने आते हैं। सत्य निकेतन हादसे के बाद डर तो बना हुआ है, पैरेंट्स भी डरे हुए हैं, लेकिन हमारे पास कोई और ऑप्शन नहीं है।"

गांधी विहार की इन गलियों में मौत सरेआम मंडरा रही है। छात्रों और मजदूरों की मजबूरी, बिल्डरों का लालच, DDA की खराब प्लानिंग और MCD की अनदेखी ने इस पूरी कॉलोनी को एक 'टाइम बम' बना दिया है। बड़ा सवाल यही है कि प्रशासन क्या हमेशा किसी बड़े हादसे (जैसे सत्य निकेतन) के होने का इंतजार करेगा, या वक्त रहते इन मौत की इमारतों से मासूमों को सुरक्षित निकालेगा?


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