महाराष्ट्र की लाडकी बहन योजना में बड़ा खेल, 92 लाख लाभार्थी सूची से बाहर
'सियासत' में मनीष कुमार ने बताया कि कैसे चुनाव बाद महाराष्ट्र की 'लाडकी बहन' योजना से 92 लाख लाभार्थी बाहर कर दिए गए; सरकारी खजाने को 14,000 करोड़ की चपत, सीएजी ने उठाए सवाल।
Siyasat: क्या चुनाव जीतने के लिए सरकारी खजाने का अंधाधुंध इस्तेमाल किया जा रहा है? क्या सरकारें वोट बैंक पक्का करने के लिए बिना जांचे-परखे जनता का पैसा लुटा रही हैं? 'द फेडरल देश' के शो 'सियासत' में एंकर मनीष कुमार ने इन तीखे सवालों के साथ देश के अलग-अलग राज्यों में महिलाओं के नाम पर चल रही नगद ट्रांसफर योजनाओं में हो रही राजनितिक गड़बड़ियों का पर्दाफाश किया है।
शो में यह गंभीर मुद्दा उठाया गया कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में पहले तो बिना पर्याप्त सत्यापन (Verification) के हजारों करोड़ रुपए बांटे गए, और जब चुनाव संपन्न हो गए, तो बाद में करोड़ों लाभार्थियों को 'अपात्र' घोषित कर सूची से बाहर किया जा रहा है।
1. महाराष्ट्र: 'लाडकी बहन' योजना में 92 लाख लाभार्थियों पर गिरी गाज
एंकर मनीष कुमार ने रिपोर्ट में बताया कि साल 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ठीक पहले महायुति सरकार ने राजनीतिक लाभ के लिए 'मुख्यमंत्री लाडकी बहन योजना' शुरू की थी। इसके तहत महिलाओं को हर महीने ₹1500 देने का प्रावधान था। इस योजना के दम पर महायुति ने चुनाव में प्रचंड बहुमत तो हासिल कर लिया, लेकिन सरकार बनने के डेढ़ साल बाद सरकारी सत्यापन में एक चौंकाने वाला सच सामने आया है।
योजना के कुल 2 करोड़ 47 लाख लाभार्थियों में से करीब 92 लाख लाभार्थियों को बाहर कर दिया गया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि करीब 38% एनरोलमेंट अवैध थे और अपात्र लोगों के खातों में औसतन 10 महीने तक पैसा जाता रहा, जिससे सरकारी खजाने को लगभग 14,000 करोड़ रुपए का भारी वित्तीय नुकसान हुआ है।
अपात्र होने की मुख्य वजहें:
लाखों आवेदकों का ई-केवाईसी (e-KYC) न होना।
आय सीमा से अधिक होना या सरकारी कर्मचारी परिवारों से जुड़ा होना।
एक ही परिवार से कई सदस्यों द्वारा अवैध रूप से लाभ उठाना।
हजारों पुरुषों के खातों में भी अवैध रूप से पैसे ट्रांसफर होना।
हालांकि, सत्ता पक्ष के दावों के अनुसार, इन महिलाओं के नाम स्थायी रूप से काटे नहीं गए हैं, बल्कि अगस्त 2025 से चल रही ई-केवाईसी प्रक्रिया पूरी न होने के कारण इन्हें फिलहाल होल्ड पर रखा गया है।
सीएजी (CAG) ने जताई गंभीर चिंता
इस वित्तीय कुप्रबंधन पर भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने भी महाराष्ट्र सरकार को कड़ी चेतावनी दी है। सीएजी ने कहा कि इतनी बड़ी प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) योजना को लागू करने से पहले लाभार्थियों की सही पहचान, बजट का सटीक आकलन और दीर्घकालिक वित्तीय व्यवस्था बेहद जरूरी थी, जिसकी अनदेखी की गई।
2. मध्य प्रदेश: 'लाडली बहना' योजना में भी छंटनी जारी
महाराष्ट्र की तरह मध्य प्रदेश में भी चुनावी वैतरणी पार करने के लिए साल 2023 में 'मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना' लाई गई थी। चुनाव बीतने के बाद वहां भी नियमों और पात्रता की समीक्षा के नाम पर लगातार लाखों महिलाओं के नाम काटे जा रहे हैं। मनीष कुमार ने शो में सवाल उठाया कि अगर शुरुआत में ही सही स्क्रूटनी (जांच) की जाती, तो बाद में लाखों नाम हटाने और जनता को भ्रमित करने की नौबत ही क्यों आती?
3. बिहार: महिलाओं की जगह पुरुषों के खाते में पहुंच गया पैसा
सत्यापन की लचर तकनीक का सबसे अनोखा उदाहरण बिहार में देखने को मिला। साल 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना' के तहत करीब 1.80 करोड़ महिलाओं के खातों में ₹100-₹100 ट्रांसफर किए जा रहे थे।
लेकिन तकनीकी और प्रशासनिक लापरवाही के कारण भारी संख्या में महिलाओं की जगह पुरुषों के बैंक खातों में सरकारी पैसा पहुंच गया। अब सरकार इन पुरुषों को नोटिस भेजकर पैसा वापस मांग रही है, लेकिन उन्होंने राशि लौटाने से साफ इनकार कर दिया है।
पहले रेवड़ी बांटो, बाद में जांचो?
एंकर मनीष कुमार ने शो 'सियासत' के अंत में यह स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र में चुनाव जीतना किसी भी दल का लक्ष्य हो सकता है, लेकिन जनता के टैक्स के पैसे का इस्तेमाल बिना नियमों और सत्यापन के चुनावी रिश्वत के तौर पर नहीं किया जाना चाहिए। कल्याणकारी योजनाओं की असली कसौटी सही लाभार्थी की पहचान और वित्तीय पारदर्शिता है, न कि जल्दबाजी में वोट बटोरने की रणनीति।
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